कर्मचारियों के पूरे वेतन पर बढ़ा कानूनी पेच हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सरकार ने SC में लगाई याचिका
राज्य सरकार ने अपनी याचिका में कई आधार रखते हुए कहा है कि सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा शर्तों से जुड़े नियम निर्धारित करने का अधिकार राज्य सरकार के पास है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 309 का हवाला दिया गया है। सरकार का कहना है कि प्रोबेशन के दौरान चरणबद्ध वेतन की व्यवस्था किसी मनमाने फैसले के तहत लागू नहीं की गई थी बल्कि वित्त विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग में प्रक्रिया और विचार विमर्श के बाद सक्षम स्तर की मंजूरी से इसे लागू किया गया था।
सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि प्रोबेशन की अवधि केवल नौकरी की शुरुआती अवधि नहीं बल्कि प्रशिक्षण और कर्मचारी की दक्षता के आकलन से जुड़ी प्रक्रिया है। राज्य ने 1966 के सेवा नियमों और वित्तीय नियमों का उल्लेख करते हुए कहा है कि नियुक्ति के शुरुआती दौर में कर्मचारियों को निर्धारित प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। इसी व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए चरणबद्ध भुगतान का प्रावधान किया गया था। सरकार का कहना है कि नीतिगत और सेवा शर्तों से जुड़े मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा सीमित होना चाहिए जब तक किसी स्पष्ट कानूनी प्रावधान का उल्लंघन सामने न आए।
मामले का एक अहम पहलू वित्तीय भार भी है। सरकार के मुताबिक यदि 2019 से अब तक प्रोबेशन पर रहे कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से 100 प्रतिशत वेतन के आधार पर अंतर की राशि का भुगतान करना पड़ा तो राज्य के खजाने पर बड़ा अतिरिक्त वित्तीय भार आएगा। इसके अलावा पुराने कर्मचारियों के एरियर के भुगतान के बाद बढ़े हुए वेतन का असर भविष्य में होने वाली सरकारी भर्तियों के बजट प्रबंधन पर भी पड़ सकता है।
सरकार ने अपनी याचिका में पुलिस पटवारी और शिक्षक जैसी बड़ी भर्तियों का भी उल्लेख किया है। राज्य का तर्क है कि पुराने एरियर और वेतन संबंधी अतिरिक्त वित्तीय दायित्व का प्रभाव पूंजीगत कार्यों और विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए निर्धारित बजट पर पड़ सकता है। सरकार ने दूसरे राज्यों की व्यवस्था का उदाहरण भी दिया है। इसमें छत्तीसगढ़ में प्रोबेशन के दौरान स्टाइपेंड या कम वेतन की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। हालांकि वहां 2023 में यह व्यवस्था समाप्त कर 100 प्रतिशत वेतन लागू किया गया था लेकिन पुराने समय का एरियर नहीं दिया गया।
इस विवाद में हाईकोर्ट पहले भी कर्मचारियों के पक्ष में फैसला दे चुका है। 6 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट ने सीधी भर्ती से नियुक्त कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से पूरा वेतन देने और बकाया राशि का 6 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ भुगतान करने का निर्देश दिया था। इसके बाद डबल बेंच ने 12 दिसंबर 2019 से लागू 70 80 और 90 प्रतिशत वेतन की व्यवस्था को निरस्त करते हुए नियुक्ति की तारीख से 100 प्रतिशत वेतन देने का निर्देश दिया।
अब राज्य सरकार ने इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। ऐसे में आगे की स्थिति सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आदेश पर निर्भर करेगी। फिलहाल मामला न्यायिक विचाराधीन है और कर्मचारियों के पूरे वेतन तथा पुराने एरियर को लेकर अंतिम स्थिति शीर्ष अदालत के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।
