August 8, 2026

दक्षिण अफ्रीका के खास पौधे रूइबोस की दुनिया भर में बढ़ी मांग, कैफीन-फ्री चाय बनी पहली पसंद।

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नई दिल्ली ।दक्षिण अफ्रीका की सेडरबर्ग पहाड़ियों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला विशेष पौधा रूइबोस इन दिनों अपनी विशिष्टताओं के कारण वैश्विक स्तर पर आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। ‘लाल झाड़ी’ के नाम से मशहूर यह पौधा केवल दक्षिण अफ्रीका के लगभग साठ हजार हेक्टेयर के सीमित भौगोलिक क्षेत्र में ही पैदा होता है। इसकी पत्तियों से तैयार की जाने वाली लाल चाय की मांग दुनिया के पचास से अधिक देशों में तेजी से बढ़ रही है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, इसके अंतरराष्ट्रीय निर्यात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे यह हर्बल पेय पदार्थों के बाजार में एक प्रमुख स्थान हासिल कर रहा है।

इस पौधे की सबसे बड़ी खासियत इसका पूरी तरह से कैफीन-मुक्त होना है। इसके अलावा इसमें एंटीऑक्सीडेंट और पॉलीफेनॉल जैसे प्राकृतिक पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। जो लोग सामान्य चाय या कॉफी में मौजूद कैफीन के सेवन से बचना चाहते हैं, उनके लिए यह एक बेहतरीन और स्वास्थ्यवर्धक विकल्प बनकर उभरा है। अब इस पौधे का उपयोग केवल पारंपरिक चाय बनाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के हर्बल पेय पदार्थों और स्किन केयर उत्पादों में भी बड़े पैमाने पर किया जाने लगा है।

भौगोलिक दृष्टि से यह पौधा अत्यंत संवेदनशील है और इसे पनपने के लिए विशिष्ट प्रकार की मिट्टी, कम बारिश और शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। इन्हीं कठोर प्राकृतिक शर्तों के कारण दुनिया के अन्य हिस्सों में इसकी व्यावसायिक खेती कर पाना लगभग असंभव रहा है। एशियाई और यूरोपीय बाजारों में इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अकेले जापान इसके कुल वैश्विक निर्यात का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसके अतिरिक्त अमरीका और यूरोपीय देशों में भी इसकी खपत में निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है।

हालांकि, वैश्विक बाजार में बढ़ती मांग के बावजूद जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित मौसम इस अनोखे पौधे की खेती के लिए गंभीर खतरे पैदा कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान क्षेत्र में हुई कम बारिश और बढ़ते तापमान के कारण इसके कुल वार्षिक उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौसम का यही रुख बना रहा, तो आने वाले समय में इस सीमित प्राकृतिक संसाधन की आपूर्ति को बनाए रखना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाएगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

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