#कालाढूंगी की चुनावी चौसर: टिकट की होड़ में ‘त्रिकोणीय मुकाबला’
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बंसीधर भगत, मनोज पाठक और गुंजन तिवारी के बीच दिलचस्प हुआ ‘सर्वे का खेल’
हल्द्वानी / कालाढूंगी। आगामी विधानसभा चुनाव की आधिकारिक घोषणा से पहले ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर कालाढूंगी विधानसभा सीट को लेकर अंदरूनी घमासान और दावेदारी का खेल चरम पर पहुँच चुका है।
पार्टी आलाकमान के गुप्त सर्वेक्षण और ज़मीनी फीडबैक के इस दौर में, इस समय कालाढूंगी की राजनीति में एक बेहद दिलचस्प ‘त्रिकोणीय मुकाबला’ (Triangular Contest) आकार लेता दिख रहा है। यह मुकाबला सिर्फ तीन बड़े चेहरों की होड़ नहीं है, बल्कि ”राजनीतिक साख, कैडर राजनीति और कॉर्पोरेट-आत्मनिर्भर जनसेवा मॉडल” के बीच तीन बिल्कुल अलग सोच का मुकाबला है।
तीन प्रमुख दावेदार: ताकत और चुनौतियाँ
1. बंसीधर भगत: ‘वरिष्ठता, स्थापित जनाधार और राजनीतिक साख’
कालाढूंगी क्षेत्र में दशकों का राजनीतिक अनुभव और पार्टी संगठन पर गहरा प्रभाव रखने वाला सबसे स्थापित चेहरा।
प्लस पॉइंट्स (ताकत):
:मजबूत कैडर व व्यापक पहुँच: क्षेत्र के कोने-कोने में पुराना और स्थापित कार्यकर्ता नेटवर्क तथा पारम्परिक वोट बैंक।
: सांगठनिक व राजनीतिक पकड़: पार्टी संगठन के बड़े वर्ग में सीधा दखल और वरिष्ठता का सीधा लाभ।
नेगेटिव पॉइंट्स (चुनौतियाँ):
: बदलाव की माँग व एँटी-इन्कम्बेंसी: मतदाताओं के एक बड़े हिस्से (विशेषकर युवाओं) में नए, पढ़े-लिखे और विज़नरी विकल्प (जैसे गुंजन तिवारी) की ओर झुकाव की चुनौती। कुछ समय पहले ही विकास न होने से नाराज कालाढूंगी की जनता कई जगह खुले में इनका (बंसीधर भगत का) विरोध कर चुकी है यहां तक की काले झंडे भी दिखा चुकी है!
: मुझे नहीं तो मेरे बेटे को टिकट की बात कर उन्होंने क्षेत्र की जनता को और नाराज कर लिया है। ऐसे में क्षेत्र जनता उनकी नीति को कांग्रेस के परिवारवाद से जुड़ा मान रही है।
: पारंपरिक ढर्रे बनाम आधुनिक प्रबंधन के विमर्श का सामना करना।
2. गुंजन तिवारी: ‘प्रोफेशनल सोच और आत्मनिर्भर सेवा का नया विकल्प’
25 साल का कॉर्पोरेट अनुभव (पूर्व CHRO) छोड़कर अपनी जन्मभूमि लौटे गुंजन तिवारी का मॉडल पारंपरिक राजनीति से बिल्कुल अलग है।
प्लस पॉइंट्स (ताकत):
: 100% सेल्फ-फंडेड मॉडल: ‘पुष्पा मेमोरियल फाउंडेशन’ के ज़रिए बिना किसी सरकारी बजट या एनजीओ चंदे के, निजी कमाई से स्वरोजगार के लिए ब्याज-मुक्त ऋण और स्वास्थ्य व शिक्षा के क्षेत्र में 365 दिन धरातल पर उपस्थिति।
: बेदाग छवि और सीधा समाधान: किसी भी तरह के राजनीतिक विवाद या गुटबाज़ी से पूरी तरह दूर। युवाओं और निष्पक्ष मतदाताओं के बीच ‘समस्या बताने वाले नहीं, बल्कि समाधान निकालने वाले’ (Solution-Oriented) नेता की पहचान।
:‘कमाने नहीं, समाज को लौटाने आए हैं’: जनता के बीच यह संदेश बहुत मजबूती से स्थापित है कि वे करोड़ों का पैकेज छोड़कर समाज को ‘गिव-बैक’ (Give-Back) करने आए हैं।
नेगेटिव पॉइंट्स (चुनौतियां):
: पारंपरिक चुनावी राजनीति का पहला अनुभव होने के कारण पार्टी के भीतर लंबे समय से चली आ रही पुरानी गुटबाज़ी और अंदरूनी जोड़-तोड़ से मुकाबला करना।
गुंजन तिवारी का रिपोर्ट कार्ड : Report Card Of Gunjan Tiwari
3. मनोज पाठक: ‘जमीनी कैडर और आक्रामक उपस्थिति’
लंबे समय से धरातल पर सक्रिय रहकर कार्यकर्ताओं के बीच अपनी जगह बनाने में जुटे मनोज पाठक।
प्लस पॉइंट्स (ताकत):
: स्थानीय संपर्क: कार्यकर्ताओं और आम जनता के साथ सीधा संवाद और स्थानीय मुद्दों पर लगातार आक्रामक रुख।
: सक्रियता: क्षेत्र के राजनीतिक घटनाक्रमों में अपनी मौजूदगी बनाए रखने की क्षमता।
नेगेटिव पॉइंट्स (चुनौतियाँ):
:विरोधी खेमे का दबाव: पार्टी के भीतर और बाहर प्रतिद्वंद्वी गुटों द्वारा लगातार घेराबंदी।
: पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण गुटीय असंतोष का जोखिम।
: इसके अलावा उनकी पुरानी सेहत को देखते हुए भी कई क्षेत्रवासी उनके साथ जाने में हिचकिचा रहे हैं। लोगों का मानना है कि ऐसी बीमारी पुन: उभर सकती हैं जो कई बार लोगों में देखा भी गया है। ऐसे में यदि मनोज जी चुनाव लड़ते हैं और जीत भी जाते हैं तो क्षेत्र में कार्यों का अत्यधिक दबाव उन्हें पुन: बीमारी की चपेट में ला सकता है। बीमार अवसथा में वह विकास के कार्य नहीं कर सकेंगे। ऐसे में न केवल क्षेत्र का विकास प्रभावित होगा बल्कि गर्त में भी जा सकता है।
पर्दे के पीछे का ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’: सर्वे को मोड़ने की रणनीति
क्षेत्र में चर्चा है कि पार्टी के क्षेत्रीय संगठन को अपनी जेब में रखने वाले नेता खुद के लिए टक्कर माने जाने वाले नेताओं का नाम संगठन द्वारा क्षेत्र की सूची में उपर नहीं जाने देना चाहते जिसके चलते वे क्षेत्र के संगठन पर अपना दबाव बनाए हुए हैं।
बताते चलें कि टिकट की अंतिम मुहर लगाने से पहले भाजपा में आलाकमान का सबसे बड़ा हथियार होता है— ‘आंतरिक गोपनीय सर्वे‘। ऐसे में पहले से पार्टी से जुड़े लोगों व क्षेत्र के लोगों के बीच यह भी चर्चा है इसी सर्वे को प्रभावित करने के लिए पर्दे के पीछे एक मास्टरस्ट्रोक बिछाया जा रहा है:
‘प्रायोजित चेहरे और समर्पण’ का राजनीतिक दांव
> राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि रणनीति के तहत मैदान में कुछ ऐसे नए और प्रायोजित चेहरों (Proxy Candidates) को उभारकर सामने लाया जा रहा है, जो सर्वे टीम के सामने खुद को टिकट का दावेदार दिखाते हैं।
ऐसे समझें पूरा खेल…
> इसके तहत जब आलाकमान की सर्वेक्षण टीम क्षेत्र में गुप्त रूप से फीडबैक लेने पहुंचती है, तो ये प्रायोजित चेहरे अपना नाम आगे बढ़ाते हैं ताकि सर्वेक्षण के आंकड़ों में भ्रम की स्थिति बने।
> इसके तुरंत बाद, यही चेहरे सर्वे टीमों के सामने यह संदेश पहुँचाते हैं कि- “अगर एक पुराने बुजूर्ग नेता खड़े होते हैं, तो हम तुरंत अपना दावा छोड़कर बैठ जाएँगे और पूरी ताकत से उनका समर्थन करेंगे।”
> मकसद: माना जा रहा है कि इस चाल से केंद्रीय और प्रांतीय सर्वे टीमों के सामने एक कृत्रिम ‘सर्वसम्मति’ (Artificial Consensus) का माहौल तैयार करने की कोशिश की जा रही है, ताकि गुंजन तिवारी या मनोज पाठक जैसे मजबूत व लोकप्रिय दावेदारों की स्वाभाविक जनस्वीकार्यता को आंकड़ों के चक्रव्यूह में उलझाया जा सके।
3. तुलनात्मक विश्लेषण: कौन किस पर भारी?

कुल मिलाकर देखा जाए तो कालाढूंगी की इस सियासी चौसर पर खेल बेहद दिलचस्प हो चुका है:
: एक तरफ – अनुभव, पारंपरिक किलेबंदी और सर्वे को साधने का हुनर है,
: तो दूसरी तरफ – गुंजन तिवारी का 365 दिन धरातल पर दिखता ‘निजी फंड, स्वरोजगार और विज़नरी नेतृत्व’ वाला मॉडल’, जो पार्टी आलाकमान को एक बेदाग और दूरदर्शी विकल्प के रूप में सोचने पर मजबूर कर रहा है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी आलाकमान पुराने ढर्रे और सर्वे के इस राजनीतिक चक्रव्यूह पर ही भरोसा जताता है, या फिर कालाढूंगी को एक नया और आत्मनिर्भर विज़न देने वाले चेहरे को मौका देता है!
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