Kaladhungi Mission 2027: इस बार क्या चाहती है कालाढ़ूंगी की सीट
Kaladhungi seat choice for 2027
-
नीचे से जमीन खिसकने के बाद भी होश में ही नहीं आ रहे नेता
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर कालाढूंगी सीट सबसे हॉट बनी हुई है। ऐसे में जहां लंबे समय से क्षेत्र के विधायक रहे भाजपा के नेता का बड़ा विरोध सामने आ रहा है। वहीं जनता के कई लोग किसी भी स्थिति में इस बार उन्हें या उनके परिवार के किसी भी व्यक्ति को वोट देने के लिए इनकार करते हुए साफ देखे जा सकते हैं।
इसके बावजूद नेता जी हैं कि इसी सीट को लेकर इस प्रकार अटके हुए हैं कि उन्होंने कई जगह साफ तौर पर पार्टी की लाइन से हटते हुए यहां तक कह दिया है कि यदि मैं नहीं तो मेरा बेटा ही यहां पर पार्टी की ओर से लड़ाया जाएगा। जबकि भाजपा सदैव परिवार का विरोध करने वाली पार्टी के तौर पर देखी जाती है। इसके बावजूद नेता जी का यह बयान, न केवल पार्टी की लाइन से अलग है, बल्कि उनका ये बयान तो पार्टी हाइकमान को तक साफ चेतावानी देता हुआ लगता है।
ऐसे में नेता जी के कुछ खास लोग तो यहां तक कहते दिखते हैं कि यदि अमित शाह बेटे का सपोर्ट कर सकते हैं तो नेताजी क्यों नहीं? वहीं जब उनसे ये पूछा गया कि अमित शाह अपने बेटे को पार्टी में कब लाए और क्या पद दिया? तो ऐसे लोग अपनी बगलें झांकते हुए कहते हैं तो क्या ये केवल पार्टी तक के लिए ही नियम है। वहीं यही लोग ये भी मानते हैं कि नेताजी का बेटा चुनाव योग्य तो नहीं है, लेकिन वह नेता जी की राजनीति में किए गए कर्मों का फल तो पा ही सकता है। जो उसे जीताने में सहायक सिद्ध होगी। उनका कहना है कि आखिर पिता के द्वारा जोड़ी गई चीजें पुत्र को ही तो लाभ देतीं हैं।
वहीं जब विजन को लेकर सवाल किया जाता है तो वे भी मानते हैं कि नेता जी की तरह ही उनके बेटे भी राजनीति करेंगे कोई अलग या नई सोच का होना लगता तो नहीं है।
Uttarakhand: भाजपा में दबाव का खेल शुरु, चुनाव से पहले ही परिवारवाद का चेहरा आया सामने
वहीं यदि जमीनी हकीकत की बात की जाए तो कालाढ़ूंगी विधानसभा में इन दिनों नेता जी का भारी विरोध बना हुआ है। इसी के चलते पूर्व में भी नेता जी को लेकर लोग प्रदर्शन भी कर चुके हैं।
हकीकत तो यह है…
वहीं यदि क्षेत्र की पूरी जानकारी ली जाए तो कालाढ़ूंगी विधानसभा एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। जिसमें से वर्तमान विधायक की स्थिति देखने पर सामने आता ही कि केवल एक क्षेत्र ही ऐसा रहा है जहां उनका वर्चस्व बहुत अधिक रहा है।
लेकिन देखने में आ रहा हे कि इस बार तो उस वर्चस्व वाले क्षेत्र में तक इनकी पकड़ सीमित हो गई है। यहां भी उन्हें लेकर लोग पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हैं। ऐसे में वर्तमान में इनके क्षेत्र का तक केवल 25 से 30 प्रतिशत का हिस्सा ही इनका करीबी है, वहीं उसमें भी कई ऐसे हैं जो भाजपा के कारण ही इनके साथ हैं।
उत्तराखंड के चुनाव 2027 को लेकर अभी की स्थिति ऐसे समझें
दरअसल आज ही जिस क्षेत्र की बात कर रहे हैं वहीं क्षेत्र नेताजी का गढ़ माना जाता रहा है। नाम है बिठौरिया, जहां कभी 60 से 70 प्रतिशत तक लोग नेता जी के सपोर्टर रहे हैं। लेकिन यहां भी बदलती परिस्थितियों के बीच पकड़ सीमित हो जाने के बावजूद भी नेता जी इसी स्वप्न में है कि यहां कि 60 से 70 प्रतिशत लोग आज भी उनके साथ हैं।
ऐसे समझें कालाढूंगी सीट:
इस सीट में मुख्य रूप से हल्द्वानी का ग्रामीण क्षेत्र आता है। कुल मिलाकर इसमें बिठौरिया, रामपुर रोड, छडेल, आरटीओ रोड, गैस गोदाम रोड, पनियाली, फतेहपुर क्षेत्र, कमलुआगांजा, चकलुआ, लामाचौड़, कालाढूंगी, नया गांव, कोटाबाग क्षेत्र, बैलपडाव, गैबुआ सहित अनेक क्षेत्र शामिल हैं।
बिठौरिया एक बड़ी ग्राम सभा है, लेकिन अब उस क्षेत्र का भी कुछ ही हिस्सा नेताजी से खुद को जुड़ा मानता है। ये बात अलग है कि नेता जी का भय कुछ हद तक लोगों में आज भी यहां है, जिसके चलते वे सामान्यत: नेताजी के समर्थन की बात करते हैं, लेकिन यदि आप उनसे भाजपा व नेताजी में से चुनने को कहें तो उनमें से कई भाजपा की ओर तो कई किसी नेता विशेष के समर्थन की बात करते हैं। वहीं कुल मिलाकर देखा जाए तो कालाढूंगी की जनता इस बार बदलाव की मांग करती दिख रही है। जिसमें उनका मुख्य समर्थन नए चेहरों को आगे लाने का है।
कालाढूंगी विधानसभा सीट 2027 : दावेदारों के बीच नए चेहरों पर भी हो रही चर्चा
ये कह रहे हैं क्षेत्र लोग
यदि कालाढ़ूंगी विधानसभा क्षेत्र के लोगों से बात की जाए तो वे साफ तौर पर यह कह रहे हैं। कि इस बार किसी भी स्थिति में पुराने नेता को तो वोट नहीं देंगे, वहीं कुछ जनसंघ के समय से जुड़े कई लोगों का तो यहां तक कहना है कि हम नेताजी या उनके परिवार के किसी भी सदस्य को वोट न तो देंगे न अपने परिवार वालों को देने देंगे यानि परिजनों से भी उन्हें वोट न देने का आग्रह करेंगे। चाहे किसी भी अन्य दल को या किसी निर्दलीय को ही वोट क्यों न देना पड़े।
वहीं लोग यह भी बात रहे हैं कि भले ही नेता जी का किसी भी हद तक विरोध क्यों न कर लिया जाए। भाजपा को जाने वाली लिस्ट में उनका नाम जिलाध्यक्ष भाजपा की ओर से आगे बढ़ाया ही जाएगा। इसके कारण के संबंध में जनता का कहना है कि वे नेताजी के काफी खास जो हैं।
लोगों का यह भी कहना है कि इस सीट पर फिर से आएगी तो भाजपा ही लेकिन यदि नेता जी को नहीं हटाया गया तो उस परिस्थिति में इस बार भाजपा को ये सीट खोनी पड़ सकती है। जहां तक वोटों की बात की जाए तो एक पुराने पार्टी के कार्यकर्ता ने बताया कि लोगों ने मन बना लिया है, इस बात नेताजी को या उनके किसी परिजन को हटाने का लेकिन नेताजी अभी भी कुंभकरिणी नींद में हैं जबकि धरातल पर समीकरण बदल गए हैं।
उत्तराखंड भाजपा में हो सकता है बवाल! जानें कौन से हैं बड़े कारण
कुल मिलाकर देखा जाए तो इस बार विधायक जी कालाढूंगी सीट को लेकर इस कदर फंस गए हैं कि अभी कुछ दिनों पहले ही उन्होंने एक बार फिर अपनी ही सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं इसी हड़बड़हट में कुछ समय पहले ही वह पार्टी की गाइडलाइन को छोड़ अपने मकसद को आगे रखते हुए अपने बेटे को भाजपा का टिकट देने के लिए भी साफतौर पर कह चुके हैं।
कई पुराने कार्यकर्ताओं के अनुसार अब तो स्थिति ये है कि पार्टी के कुछ नए लोगों ने उन जगहों पर तक वर्चस्व बना लिया है जो कभी अन्य पार्टियों के गढ़ हुआ करते थे, और आज भी वर्तमान के विधायक जी को वहां के क्षेत्रवासी किसी भी स्थिति में अपना समर्थन देने को तैयार नहीं हैंं। वहीं नेता जी आज भी अपनी पुरानी स्थिति को पहले की तरह ही मानकर आगे चल रहे हैं, जबकि उनके क्षेत्र में भी उनके नीचे की जमीन काफी हद तक खिसक चुकी है, पर वह इसे मानने व जानने को तैयार ही नहीं हैं। उनका मानना है कि ऐसे में कोई अपनी दम पर खड़े भाजपा से जुड़े नेता की ही इस क्षेत्र को जरूरत है।
कालाढूंगी विधानसभा सीट के संभावित भाजपा प्रत्याशी
कालाढूंगी विधानसभा के किस क्षेत्र में किसका वर्चस्व…
अब तक की स्थिति में यह भी समझ लें कि कालाढूंगी विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव को लेकर बंसीधर भगत की स्थिति फिलहाल अस्थिर और विवादित दिख रही है।
बंसीधर भगत की वर्तमान स्थिति
वर्तमान विधायक: बंसीधर भगत (BJP के वरिष्ठ नेता)।
बयान विवाद: उन्होंने कहा था कि “2027 मुश्किल हो जाएगा”, जिसे मीडिया ने पार्टी की कमजोरी के रूप में प्रचारित किया। बाद में उन्होंने सफाई दी कि उनका आशय अधिकारियों की लापरवाही और विकास कार्यों की कमी से था, न कि पार्टी की स्थिति से।
उत्तराधिकार की चर्चा: भगत ने यह भी कहा कि यदि उन्हें टिकट नहीं मिलता तो उनके बेटे को मौका दिया जाना चाहिए। इस बयान ने स्थानीय राजनीति में हलचल मचा दी है और इसे राजनीतिक उत्तराधिकार की कोशिश माना जा रहा है।
प्रमुख चुनौतियाँ
पार्टी के भीतर प्रतिस्पर्धा: कालाढूंगी सीट पर कई दावेदार सक्रिय हैं, जिनमें गुंजन तिवारी, मनोज पाठक, राजेंद्र सिंह बिष्ट और गजराज बिष्ट जैसे नाम शामिल हैं।
जनता की नाराजगी: जल जीवन मिशन और सड़क निर्माण जैसे अधूरे विकास कार्यों से जनता असंतुष्ट है। भगत ने खुद स्वीकार किया कि अधिकारियों की लापरवाही से जनता का धैर्य टूट रहा है।
विरोधी खेमे की रणनीति: विपक्ष इस असंतोष को भुनाने की कोशिश करेगा, जिससे भगत की स्थिति और कमजोर हो सकती है।
तुलना : बंसीधर भगत – मुख्य अन्य दावेदार
पहलू : बंसीधर भगत– अन्य दावेदार (गुंजन तिवारी, मनोज पाठक आदि)
अनुभव : वरिष्ठ BJP नेता, कई बार विधायक – अपेक्षाकृत नए चेहरे, लेकिन स्थानीय स्तर पर सक्रिय
जनाधार : परंपरागत वोट बैंक, खासकर एक निश्चित क्षेत्र में – युवाओं और सामाजिक कार्यों से जुड़ा समर्थन + यहां तक की उन क्षेत्रों में तक पकड़ जहां भाजपा (BJP) अब तक कमजोर है
विवाद : बयानबाजी और टिकट उत्तराधिकार पर आलोचना – नए चेहरे होने के कारण कम विवाद
चुनौती : जनता की नाराजगी और पार्टी के भीतर प्रतिस्पर्धा – पार्टी हाईकमान का भरोसा जीतना
इनमें जहां मनोज पाठक भाजपा संगठन से पहले से जुड़े हुए हैं, लेकिन पिछले दिनों तबियत की समस्या के चलते वे इतने सक्रिय नहीं रहे, ऐसे में क्षेत्र के कई लोग दबाव आने पर पुन: तबियत बिगड़ने की आशंका के बीच क्षेत्र की तरक्की को लेकर आश्वस्थ नहीं हैं। क्षेत्र में एक खास समर्थित ग्रुप उनके पास माना जाता है। मनोज पाठक द्वारा समय समय पर क्षेत्र मे किए जाने वाले कार्य भी उन्हें लोगों से जोड़ने का कार्य करते हैं।
गुंजन तिवारी एक युवा सामाजिक कार्यकर्ता (नशा मुक्ति, महिला सशक्तिकरण और पलायन रोकने जैसे अभियानों से जनता में गहरी पकड़) होने के साथ ही वे एक निर्विवाद चेहरा (कभी कोई आरोप नहीं लगा) भी हैं। इसके अलावा कुछ ही समय में क्षेत्र में उन्होंने अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली है कि कालाढूंगी के कई ऐसे क्षेत्र जहां विपक्षी दलों की पकड़ हमेशा मजबूत रही है वहां के लोग तक उनका खुल कर समर्थन करते देखे जा रहे हैं।
इनके अलावा क्षेत्र में राजेंद्र सिंह बिष्ट, सुरेश भट्ट का नाम भी बीच बीच में सामने आ रहा है।
राजनीति के जानकारों तक का मानना है कि इस बार कालाढ़ूंगी में बंसीधर भगत की स्थिति कहीं से भी ठीक तो नहीं कही जा सकती लेकिन, इसे “बेहद खराब” कहना भी कुछ लोग जल्दबाजी मानते हैं, वहीं ये बात क्षेत्र में अधिकांश लोग मान रहे हैं कि उनकी पकड़ लगातार और तेजी से कमजोर हो रही है। और मुमकिन है कि इस बार उन्हें या उनसे विशेष रूप से जुड़े किसी को टिकट दिए जाने पर भाजपा को अपना यह किला गंवाने के लिए मजबूर होना पड़े।
एक शख्स ने तो यहां तक कह दिया कि एक ओर जहां टिकट को लेकर BJP में खींचतान बढ़ रही है और नेताजी की ऐसी हरकतों (मुझे नहीं तो मेरे बेटे को टिकट दें) को देख जनता में भी उनके खिलाफ नाराजगी बढ़ती जा रही है।
ऐसे में माना जा रहा है कि यदि पार्टी हाईकमान नए चेहरों को प्राथमिकता देता है, तो भगत या उनके बेटे की दावेदारी कमजोर पड़ सकती है।
