उत्तराखंड सरकार जवाब दे: गर्भवती निशा की मौत क्यों और पहाड़ की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था का जिम्मेदार कौन?
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3 दिन तक भटका परिवार, नहीं बचे जुड़वा बच्चे और मां
उत्तराखंड के पहाड़ों के कठिन जीवन व बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की भेंट इस बार एक गर्भवती चढ़ी है। अल्मोड़ा के भिकियासैंण ब्लॉक के इनोलू गांव की गर्भवती निशा को बचाने की कोशिश में उसका परिवार तीन दिन तक रामनगर से हल्द्वानी और काशीपुर तक अस्पतालों के चक्कर काटता रहा। कहीं इलाज की उम्मीद जगी तो कहीं इंतजार मिला।
छह अस्पतालों तक पहुंचने के बावजूद निशा और उसके जुड़वा बच्चों को समय पर उपचार नहीं मिल सका। आखिरकार, काशीपुर के एक निजी अस्पताल में निशा की मौत हो गई। ऑपरेशन के बाद गर्भ से निकाले गए दोनों बच्चों में से एक पहले ही मृत था जबकि दूसरे ने भी कुछ घंटे बाद दम तोड़ दिया।
यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं बल्कि पहाड़ और आसपास के क्षेत्रों की स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद उन खामियों पर भी बड़ा सवाल है, जिनकी कीमत मरीजों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है।
परिजनों के मुताबिक 30 अगस्त की रात निशा (24) को अचानक घुटन महसूस हुई। कुछ देर बाद राहत मिलने पर परिवार ने इसे सामान्य माना लेकिन 31 अगस्त की सुबह सांस लेने में परेशानी बढ़ गई।
परिजन उसे रामनगर के रामदत्त जोशी राजकीय चिकित्सालय में ले गए। वहां केस को जटिल बताते हुए उसे हल्द्वानी ले जाने की सलाह दी गई। इसके बाद परिजन निशा को हल्द्वानी के सुशीला तिवारी राजकीय अस्पताल ले गए।
वहां निजी अस्पताल में उसका अल्ट्रासाउंड कराया गया। जांच के बाद उसकी हालत ठीक बताई गई और उसे घर ले जाने की सलाह दी गई। इसके बाद परिजन उसे एक रिश्तेदार के घर ले आए।
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अस्पताल में गंभीर बताकर नहीं किया भर्ती
एक सितंबर की रात करीब नौ बजे निशा की हालत फिर बिगड़ गई। सांस लेने में तकलीफ बढ़ने पर परिजन उसे दोबारा सुशीला तिवारी अस्पताल ले गए। परिजनों का आरोप है कि केस की जटिलता व स्थिति गंभीर बताकर उसे भर्ती नहीं किया गया और आगे के उपचार के लिए रेफर कर दिया गया।
इसके बाद परिवार उसे एक निजी अस्पताल ले गया लेकिन वहां भी इलाज नहीं हो सका। हालत लगातार बिगड़ने पर परिजन निशा को काशीपुर ले गए। वहां तीन अस्पतालों के चक्कर काटने पड़े।
दो अटैक लगातार आए और चली गई जान
दो सितंबर की सुबह करीब 10 बजे निशा को ऑपरेशन थिएटर ले जाया जा रहा था। इसी दौरान उसे लगातार दो अटैक आए और उसकी मौत हो गई। इसके बाद चिकित्सकों ने ऑपरेशन कर गर्भ से जुड़वा बच्चों को बाहर निकाला।
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सवाल तो उठता है:
जानकारों के अनुसार किसी भी प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना सरकार की जिम्मेदारी होती है। यदि यह व्यवस्था बदहाल है, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी भी सरकार पर ही आती है।
स्वास्थ्य सेवाएँ समय के साथ बेहतर होती (होने वाली प्रक्रिया है) जानी चाहिए। इसलिए यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि वर्षों पहले किसी व्यक्ति के निर्णयों के कारण आज भी व्यवस्था खड़ी नहीं हो पाई है।
कई बुद्धिजीवियों व जानकारों का मानना है कि जब उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएँ इतनी बदहाल हैं और यहां पिछले 10 वर्षों से भाजपा की ही सरकार है, तो हर आम नागरिक को यह पूछने का अधिकार है कि:
– आखिर पहाड़ों में स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों है, जबकि यह खुद एक पहाड़ी राज्य है?
-इस बदहाल व्यवस्था के लिए जिम्मेदार कौन है?
– गर्भवती निशा की मौत का जिम्मेदार कौन है?
– इसके अलावा कब तक हमें मरीजों को चारपाई या कुर्सियों में बैठा कर अस्पताल ले जाना होगा।
कुल मिलाकर सरकार ने स्वास्थ्य सेवा को ध्यान में रखते हुए पिछले 10 सालों में प्रदेश की जनता के लिए क्या किया? और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर पिछले कई सालों से चली आ रही कौन सी समस्या का निवारण किया। क्योंकि स्वास्थ्य सेवा संबंधी यही समस्या करीब 10 साल पहले भी आम जनता के सामने थी और आज भी वहीं समस्या बनी हुई है।
– ऐसे में इन सवालों का जवाब सीधे तौर पर धामी सरकार से मांगा ही जाना चाहिए।
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इसमें सवाल ये भी है कि केवल दिखावे के लिए नए नए अस्पताल और नई तरह की चिकित्सा पद्धतियों से क्या होगा जब मरीज वहां तक पहुंच ही नहीं पाएंगे यानी पहली समस्या अस्पताल तक पहुंचने की क्या व्यवस्था है (प्रदेश में ऐसी कई जगहें हैं जहां किलोमीटरों की दूरी तक भी एंबुलेंस पहुंच ही नहीं पातीं), ऐसे में किसी गंभीर को एंबुलेंस तक पहुंचाने की क्या व्यवस्था आज तक की गई है। अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी: प्रदेश के विभिन्न अस्पतालों में डॉक्टरों की लगातार कमी (विशेष रूप से पहाड़ों के अस्पतालों में) बनी रहती है यानी डॉक्टर ही नहीं होंगे तो इलाज कौन करेगा। पहाड़ों के अस्पताल केस को जटिल बताते हुए दूसरी जगह ले जाने को कह देते है या रिफर कर देते हैं, ऐसे में पहाड़ों में ही हर इलाज की सुविधा वालो अस्पतालों का निर्माण अब तक क्यों नहीं किया गया।
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जानकारों के अनुसार पहाड़ों के हर शहर में एक या दो ऐसे अस्पतालों का निर्माण जो हर जटिल केस को भी सुलझा सके होने से कई लोगों की जान बचाई जा सकती है, क्योंकि पहाड़ से मैदान के अस्पतालों में आने वाले मरीजों की मृत्यु का कारण अधिकतर देरी बनती है। इसको ऐसे समझें बागेश्वर के किसी गांव में किसी जटिल केस का मरीज है। उसे यदि हल्द्वानी रेफर किया जाएगा तो वहां से हल्द्वानी आने में ही करीब 2.30 से 3.00 घंटे लग जाएंगे वहीं तेज गाडी चलाने में दुर्घटना का रिस्क अलग वहीं यदि एक सर्वसुविधा युक्त अस्पताल बागेश्वर में ही हो या अल्मोड़ा तक में हो तो मरीज को समय पर व उचित तरीके से संभाला जा सकता है। इनका ये भी मानना है कि पहाड़ों में जिला मुख्यालयों पर कम से कम एक व बड़े व पुराने शहरों में कम से कम 2 या 3 ऐसे सर्वसुविधायुक्त अस्पताल होने चाहिए जैसे हल्द्वानी या दून में हैं।
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