शर्म करो उत्तराखंड सरकार: क्या इसीलिए चुना था तुमको कि, गर्भवती को कुर्सी के सहारे पहुंचाएंगे अस्पताल!
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उत्तराखंड की स्वस्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल!: कर्णप्रयाग में गर्भवती का पहले पैदल फिर कुर्सी के सहारे प्रसव पीड़ा के बीच छह किमी का सफर
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यहां पैदल और फिर कुर्सी के सहारे चल रही महिलाओं की स्वस्थ्य व्यवस्था
महिलाओं पर विशेष ध्यान देने का दावा करने वाली भाजपा आज सवाल के घेरों में है। कारण ये है कि भाजपा की ही सरकार में महिलाओं (सामान्य ही नहीं गर्भवती तक) की दयनीय स्थिति जानकर आप भी स्वयं को पार्टी के दावों के बीच ठगा हुआ महसूस करेंगे। एक ओर जहां उत्तराखंड की महिलाओं को लेकर देवभूमि के सीएम तक तमाम दावे और उन पर गर्व होने जैसी बातें करते रहते हैं। वहीं उन्हीं की सरकार में महिलाओं की क्या स्थिति हो रही है या उन्हें किस तरह की सेवाएं प्रदान की जा रही हैं, इनकी पोल मात्र एक घटना ने सामने ला दी है, ऐसा नहीं की ये एकमात्र ही ऐसी घटना है, बल्कि ऐसी सेंकडों अन्य घटनाएं हैं जो सरकार के तमाम दावों को आइना दिखाती तो हैं लेकिन सरकार उन पर मात्र दिखावा करने के अलावा कुछ और करती नहीं दिखती।
सरकार के दावों की पोल खोलती सबसे नई घटना देवभूमि उत्तराखंड में आदिबदरी के पंडाव गांव से आई है। जहां भारी बारिश के बीच एक गर्भवती महिला को ग्रामीणों ने करीब छह किलोमीटर तक कुर्सी के सहारे मुख्य सड़क तक पहुंचाया। सड़क सुविधा नहीं होने के कारण ग्रामीणों ने यह जोखिम भरा सफर तय किया। इसके बाद महिला को उपजिला चिकित्सालय कर्णप्रयाग में भर्ती कराया गया, जहां उसने एक बालिका को जन्म दिया।
पंडाव गांव की 24 वर्षीय मुन्नी देवी को शनिवार दोपहर प्रसव पीड़ा शुरू हुई। क्षेत्र में दो दिनों से लगातार बारिश हो रही थी। आशा कार्यकर्ता अल्का नेगी और परिजनों ने महिला को अस्पताल ले जाने की तैयारी की। कुछ दूर चलने के बाद महिला चलने में असमर्थ हो गई। इसके बाद ग्रामीणों ने कुर्सी को डंडी बनाकर उसे मुख्य सड़क तक पहुंचाया।
108 एंबुलेंस से रात करीब नौ बजे महिला को अस्पताल पहुंचाया गया। सुबह और रात करीब 9:30 बजे चिकित्सकों ने सुरक्षित प्रसव कराया। आशा कार्यकर्ता अल्का नेगी ने बताया कि सड़क सुविधा नहीं होने के कारण गर्भवती महिलाओं को डंडी-कंडी के जरिये अस्पताल ले जाना पड़ता है।
सवाल तो उठता है:
नेताजी ईश्वर न करें कि कभी ऐसी ही स्थिति के चलते किसी महिला व उसके बच्चे के साथ कुछ अनहोनी हो जाती है। तो उस परिवार का क्या होगा? आप तो हम जल्द कार्यवाही करेंगे, कौन दोषी है उसे छोड़ेंगे नहीं जैसी बातें कह कर अलग हो जाएंगे और खुद को सेफ करते हुए जिम्मेदारी से बच जाएंगे।
जानकार कहते हैं कि लेकिन असल में यह महोदय (नेताजी) की ही जिम्मेदारी है जिसे शायद आप लोग पूरी तरह निभा नहीं पा रहे हैं। जानकार तो यहां तक कहते हैं कि कर्मचारी तो सरकारी के अनुसार कार्य करने वाले है लेकिन, नेता तो जनसेवक/जनप्रतिनिधि होते है, ऐसे में जनता की सेवा करना इन्हीं का कार्य होता है। अत: इस तरह की घटनाओं के लिए सरकारी कर्मचारी से ज्यादा जनसेवक/जनप्रतिनिधि दोषी होता है अत: ऐसी हर घटना पर सरकारी कर्मचारी से पहले जनसेवक/जनप्रतिनिधि पर गाज गिरना आवश्यक है। तभी व्यवस्थाओं में सुधार आएगा।
