March 12, 2026

टीईटी अनिवार्यता के आदेश का विरोध तेज, राज्य कर्मचारी संघ ने सरकार से कहा-फैसला वापस लें

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भोपाल । मध्यप्रदेश में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों के लिए टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (टीईटी) पास करना अनिवार्य करने के आदेश का विरोध शुरू हो गया है। भारतीय मजदूर संघ से संबद्ध मप्र राज्य कर्मचारी संघ ने स्कूल शिक्षा विभाग के इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है और सरकार से आदेश वापस लेने की मांग की है। संगठन का कहना है कि इस निर्देश से प्रदेश के लाखों शिक्षकों में असमंजस और असंतोष की स्थिति बन गई है।

संघ ने इस मामले को गंभीर बताते हुए प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र लिखा है। पत्र में मांग की गई है कि शिक्षक पात्रता परीक्षा से जुड़े आदेश को तत्काल प्रभाव से रोका जाए और इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर की जाए, ताकि पहले से सेवा दे रहे शिक्षकों के हितों की रक्षा की जा सके।

सेवा में कार्यरत शिक्षकों को परीक्षा देने का निर्देश
राज्य कर्मचारी संघ के प्रदेश महामंत्री जितेंद्र सिंह द्वारा लिखे गए पत्र में कहा गया है कि लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा जारी निर्देश में यह कहा गया है कि सेवा में कार्यरत शिक्षकों को भी टीईटी परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा। जबकि प्रदेश में बड़ी संख्या में शिक्षक कई वर्षों से नियमित रूप से सेवा दे रहे हैं।

संघ का तर्क है कि यह आदेश शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) के प्रावधानों की गलत व्याख्या के आधार पर जारी किया गया है। यदि इसे लागू किया गया तो हजारों शिक्षकों के सामने अनावश्यक संकट खड़ा हो सकता है।

2009 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर नियम लागू नहीं
पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि टीईटी परीक्षा की अनिवार्यता मूल रूप से प्राथमिक (कक्षा 1 से 5) और उच्च प्राथमिक (कक्षा 6 से 8) के लिए नए शिक्षकों की भर्ती के समय लागू की गई थी। यह नियम उन शिक्षकों के लिए बनाया गया था जो 2009 के बाद नियुक्त हुए हैं।

संघ का कहना है कि मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में शिक्षक 2009 से पहले नियुक्त हुए थे और वे लंबे समय से सफलतापूर्वक शिक्षण कार्य कर रहे हैं। ऐसे में वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों को अचानक टीईटी परीक्षा देने के लिए बाध्य करना न केवल अनुचित है बल्कि उनके मनोबल को भी प्रभावित करेगा।

तीन लाख शिक्षकों में बढ़ा असमंजस
राज्य कर्मचारी संघ के अनुसार शिक्षा विभाग ने अपने निर्देश में सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला दिया है, लेकिन इस संबंध में राज्य सरकार या विभागीय स्तर पर कोई स्पष्ट नीति या आदेश जारी नहीं किया गया है। इसी कारण प्रदेश के लगभग तीन लाख शिक्षकों के बीच असमंजस की स्थिति बन गई है।

संघ ने चेतावनी दी है कि यदि इस आदेश को तुरंत वापस नहीं लिया गया तो शिक्षक वर्ग में व्यापक असंतोष फैल सकता है। संगठन ने सरकार से आग्रह किया है कि लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा जारी पत्र पर तत्काल रोक लगाई जाए और शिक्षकों के हितों को ध्यान में रखते हुए उचित निर्णय लिया जाए।

न्यायालय जाने की भी चेतावनी
संघ ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि यदि सरकार इस मामले में जल्द कोई स्पष्ट फैसला नहीं लेती, तो संगठन न्यायालय में पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटीशन) दायर करने पर भी विचार करेगा। उनका कहना है कि प्रदेश के शिक्षकों के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए हर कानूनी विकल्प अपनाया जाएगा।

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