उत्तराखंड चुनाव 2027: कालाढूंगी विधानसभा सीट पर सियासी घमासान, भाजपा के गढ़ में टिकट के लिए दिग्गजों में कड़ी जंग
-
उत्तराखंड चुनाव 2027: कालाढूंगी विधानसभा सीट पर उबाल, बंशीधर भगत का विरोध! और टिकट के दावेदारों की पूरी कुंडली
हल्द्वानी/कालाढूंगी। उत्तराखंड के आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक तापमान अभी से चरम पर है। राज्य की सबसे हॉट और वीआईपी सीटों में शुमार कालाढूंगी विधानसभा सीट पर सत्ताधारी दल (भाजपा) के भीतर घमासान अब खुलकर सामने आ गया है। वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद से यह सीट भाजपा का सबसे सुरक्षित और अभेद किला मानी जाती रही है, जहां से वरिष्ठ नेता बंशीधर भगत लगातार दबदबा बनाए रहे। लेकिन, सूत्र बताते हैं कि क्षेत्र में पनप रहे विरोध और विकास व विजन की कमी के चलते 2027 के इस चुनावी रण में बंशीधर भगत और उनके परिवार के सामने अस्तित्व की बड़ी लड़ाई खड़ी हो गई है।
इस सीट पर मुख्य रूप से बंशीधर भगत और उनके बेटे विकास भगत के अलावा, सुरेश भट्ट, गुंजन तिवारी और मनोज पाठक के नाम चर्चा में हैं। आइए जानते हैं राजनीति के जानकारों के अनुसार इन सभी की ताकत, कमजोरियां, जनता के बीच इनकी स्थिति और बंशीधर भगत व उनके बेटे के खिलाफ सुलग रहे भारी असंतोष का पूरा कच्चा-चिट्ठा:
1. बंशीधर भगत (वर्तमान विधायक एवं वरिष्ठ भाजपा नेता)
ताकत: बंशीधर भगत सात बार विधायक चुने गए, उत्तराखंड भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष रहे,संगठनात्मक नेटवर्क।
वर्तमान स्थिति: गहराता संकट और चौतरफा विरोध...
राजनीतिक रूप से कभी इस क्षेत्र के निर्विवाद नेता रहे बंशीधर भगत के लिए 2027 का रास्ता अब कांटों भरा हो गया है। उनके विरोध के मुख्य कारण और नेगेटिव प्वाइंट्स कुछ इस प्रकार हैं:
: सड़कों पर जन-आक्रोश: पिछले कुछ दिनों में स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों और विशेषकर सड़क निर्माण के दौरान जनता का भयंकर गुस्सा देखने को मिला है। स्थिति यहाँ तक बिगड़ गई कि जनता ने उनके दौरों का कड़ा विरोध तक किया।
: विवादित बयान और देवी-देवताओं पर टिप्पणी: बंशीधर भगत अपने बयानों को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहे हैं। पूर्व में हिंदू देवी-देवताओं को लेकर उनकी अमर्यादित टिप्पणियों का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने से सनातन धर्म के जानकारों और आम जनता में उनके प्रति गहरी नाराजगी है।
: जल जीवन मिशन और पीएम मोदी पर परोक्ष प्रहार: जल जीवन मिशन की विफलता और योजनाओं की सुस्त रफ्तार पर उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया और “बजट ” को कारण बताया। चूंकि यह योजना सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट्स में शामिल है, इसलिए उनके इस बयान को सीधे तौर पर पीएम मोदी और केंद्र सरकार पर ठीकरा फोड़ने के रूप में देखा गया, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं और शीर्ष नेतृत्व सहित क्षेत्र की जनता में भारी रोष है।
: सिकुड़ता जनादेश और सर्वे रिपोर्ट: राजनीति के जानकारों का कहना है किकई निजी कंपनियों द्वारा कराए गए राजनीतिक सर्वे के अनुसार, बंशीधर भगत अपने सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले क्षेत्रों (विशेषकर बिठौरिया व आसपास के इलाकों) में लगभग 35 से 45% वोट बैंक और अपनी पकड़ तेजी से खो चुके हैं। यहाँ तक कि जनसंघ के जमाने से जुड़े निष्ठावान कार्यकर्ता भी अब खुलकर उनके विरोध में खड़े हो गए हैं।
: वंशवाद का मुद्दा (बेटे के लिए टिकट की मांग): भाजपा लंबे समय से कांग्रेस और अन्य दलों पर ‘परिवारवाद की राजनीति’ (Familyism) का कड़ा प्रहार करती रही है। ऐसे में बंशीधर भगत द्वारा यह सार्वजनिक रूप से कहना कि “मुझे नहीं, तो मेरे बेटे (विकास भगत) को टिकट दो, यह मेरी सीट है” — ने पूरी पार्टी को असहज कर दिया है। विरोधी दल अब बीजेपी को इसी मुद्दे पर घेरने की तैयारी में हैं कि जिस पार्टी ने परिवारवाद के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है, उसी का दिग्गज विधायक परिवारवाद को बढ़ावा दे रहा है।
2. विकास भगत (बंशीधर भगत के पुत्र)
ताकत: बंशीधर भगत का पुत्र है, भाजपा में प्रदेश प्रवक्ता की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
अलोकप्रियता! विजन का अभाव और भारी विरोध
बंशीधर भगत द्वारा अपने बेटे विकास भगत को राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिशों के बीच, ज़मीन पर विकास भगत को लेकर गहरी निराशा और विरोध देखने को मिल रहा है: जानकारों की मानें तो विकास भगत के लिए बंसीधर भगत जो पहले उनकी ताकत में थे वे ही अब परेशानी का कारण बन रहे हैं, इसके पीछे का कारण ये बताया जाता है कि इस चुनाव में जनता बंसीधर भगत से नाराज है, क्षेत्र में इन्फ्रास्टर्कचर को लेकर जहां जनता बंसीधर भगत से नाराज है। वहीं पिता से हुई नाराजगी का एक बड़ा हिस्सा पुत्र तक भी आ रहा है।
: जनता के बीच अजनबी चेहरा: स्थिति यह है कि कालाढूंगी क्षेत्र और उनके सबसे मुख्य गढ़ कहे जाने वाले बिठौरिया के भी कई लोग विकास भगत को ठीक से जानते तक नहीं हैं। यहां तक की कई तो उनका चेहरा भी ठीक से नहीं जानते या उनको सीधे तौर पर नहीं पहचानते।
: सीमित और दूरी: कई लोगों का तो यहां तक कहना है कि जनता के बीच इनकी सक्रियता सिर्फ राजनीतिक आयोजनों तक ही सीमित नजर आती है।
: विज़न और दूरगामी सोच का अभाव: जब पिता (बंशीधर भगत) के पास क्षेत्र के विकास को लेकर कोई स्पष्ट और दूरगामी विजन नहीं बचा, तो जनता स्वाभाविक रूप से गुस्से में है। ऐसे में पुत्र विकास भगत पर भी यही सवाल उठ रहा है कि यदि उनके पास कोई विजन होता, तो वे अपने पिता को सही दिशा और विकास का नया खाका दे सकते थे, लेकिन वे ऐसा करने में वह पूरी तरह नाकाम रहे हैं।
: बदलाव चाहती जनता: आज का मतदाता और युवा एक ऐसे नेता की तलाश में है जिसकी सोच दूरगामी हो और जो भविष्य की जरूरतों को समझ सके। लोगों का कहना है कि वे इस पर सटिक नहीं उतरते हैंहै, जिसके चलते जनता उन्हें उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार करने को बिल्कुल तैयार नहीं है और उन्हें वोट देने से दूरी बनाने की बात कह रही है।
3. सुरेश भट्ट (वरिष्ठ संगठन नेता)
: ताकत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और पार्टी संगठन के भीतर गहरी पैठ, सांगठनिक कौशल और मजबूत नेटवर्क, हरियाणा चुनाव में भूमिका, कालाढूंगी की ही पैदाइश हैं।
जन-नेता की जगह संगठन के नेता
जमीनी स्तर पर जनता के बीच सीधे तौर पर लोकप्रिय जन-नेता के रूप में उनकी छवि का अभाव होना। इनकी जीत को लेकर संदेह उत्पन्न करता है।
: लोकप्रियता व विरोध: संगठन में उनका रसूख तो है, लेकिन स्थानीय जनता से जुड़ाव की कमी के चलते उन्हें इतना समर्थन मिलता नहीं दिख रहा है, वहीं ये भी माना जा रहा है कि उनके आने से स्थानीय कैडर में असंतोष उभर सकता है।
कुछ खास जो आपके लिए जानना जरूरी है…
जानकारों के अनुसार कुल मिलाकर देखा जाए तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि सुरेश भट्ट की पकड़ पार्टी संगठन, आरएसएस और रणनीतिक गलियारों में बहुत मजबूत है। लेकिन, क्षेत्र मे जो बात ज़मीनी स्तर पर सामने आती है उसके अनुसार एक विधायक या जननेता के रूप में उनकी पहचान उस तरह से नहीं है, जैसी एक लोकप्रिय स्थानीय नेता की होनी चाहिए।
इसके अलावा आज की जनता और खासकर युवा मतदाता ऐसे जनप्रतिनिधि चाहते हैं जो हर वक्त उनके बीच उपलब्ध रहें, जिनकी ऊर्जावान छवि हो और जो आधुनिक समय की विकास संबंधी अपेक्षाओं पर खरे उतर सकें। इस लिहाज से उम्र और स्थानीय कनेक्ट के मामले में उन्हें जनता के स्तर पर कड़ा संघर्ष करना पड़ सकता है।
वहीं प्रदेश के कुछ नेताओं के स्तर पर भी उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में जहां क्षेत्र के कुछ नेता भविष्य में अपने परिवार के लोगों को यहां वापस जमाने की कोशिश में हैं, वे उनके यहां आने को असहज महसूस कर सकते है।
इसके साथ क्षेत्र के कई लोगों का यह भी कहना है कि पिछले चुनावों में भी उनके नाम का मुद्दा उठने पर उन्हें मुख्यमंत्री का दावेदार माना जा रहा था, ऐसे में इस बार उनके आने से पार्टी में समीकरण बिगड़ने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
4. गुंजन तिवारी (युवा, सामाजिक और कॉर्पोरेट पृष्ठभूमि)
: ताकत: मुखर शैली, कॉर्पोरेट और सामाजिक सेवा के बैकग्राउंड (जैसे पिछले 3 से अधिक वर्षों से स्ववित्त पोषित ‘पुष्पा मेमोरियल फाउंडेशन’ के जरिए लगातार सक्रियता) के चलते युवाओं और आम जनता में तेजी से पैठ बनाना। रोजगार (ब्याज मुक्ज ऋण), शिक्षा (योग्य लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को स्कालरशिप देने), स्कूलों (स्वच्छ जल के लिए प्यूरिफायर लगवाने), गरीबों (मकान बनवाने व गंभीर बीमारी में आर्थिक सहायता देने) सहित श्रमिक मुद्दों पर उनकी बेबाक आवाज इनकी यूएसपी है।
चुनौती: दलीय मशीनरी को साधने की
: पारंपरिक रूप से दशकों से जड़े राजनीतिज्ञों के मुकाबले बड़े चुनावी तंत्र और दलीय मशीनरी को साधने की चुनौती। कालाढूंगी में कुछ जगहें ऐसी भी हैं, जहां पर पकड़ अन्य जगहों की अपेक्षा थोड़ी सीमित है। लंबे समय तक बाहर नौकरी आदि रहने के चलते लोग इन पर बाहरी होने का भी आरोप लगाते हैं, जबकि असल में यह उत्तराखंड के ही मूल निवासी हैं।
: लोकप्रियता व विरोध: युवाओं के बीच ये बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं। हालाँकि, पुराने सियासी खिलाड़ी इन्हें अपने लिए बड़ा खतरा मानते हैं, इसलिए अंदरखाने इन्हें रोकने की कोशिशें भी होती हैं।
5. मनोज पाठक (स्थानीय दावेदार)
: ताकत: स्थानीय स्तर पर जनसमस्याओं के खिलाफ मुखर रहना, क्षेत्र की अधिकांश जगहों के कुछ कुछ लोग इनसे जुड़े हुए हैं, लोगों से मेलमिलाप, बच्चों के लिए लाइब्रेरी का निर्माण और संघ-संगठन से पुराना जुड़ाव।
नाम की कम चर्चा :
अपने ही क्षेत्र में विरोध (बिठोरिया क्षेत्र के पास रहने के बावजूद बिठोरिया में कम समर्थन/चर्चा कम होना), इसके अतिरिक्त बीच में बीमार होना और लोगों को संदेह है कि जिम्मेदारी ( वर्क लोड के चलते) बढ़ने के चलते पुन: बीमारी की गिरफ्त में न आ जाएं। कालाढूंगी में कई जगह लोग इनका विरोध (कुछ बड़े व खास क्षेत्रों में) करते या इन्हें जानने से इनकार करते मिल जाते हैं। कई जगह तो इनके नाम की चर्चा भी काफी सीमित देखी गई है।
: लोकप्रियता व विरोध: स्थानीय जनसंपर्क अच्छा होने के कारण समर्थन है, लेकिन अन्य बड़े क्षत्रप इनके बढ़ते प्रभाव से असहज रहते हैं।
कुल मिलाकर जानकारों का मानना है कि कई सर्वे में जो बाते सामने आ रहीं हैं वे यहीं दिखाती हैं कि कालाढूंगी सीट पर 2027 का चुनाव पूरी तरह से बदलाव और असंतोष के मुहाने पर खड़ा है। एक तरफ बंशीधर भगत के खिलाफ जनता का गुस्सा, काले झंडे दिखाना, जल जीवन मिशन के बयानों से पार्टी की फजीहत और ‘वंशवाद’ का खुला खेल है, तो दूसरी तरफ विकास भगत की विजनहीन स्थिति की बात लोगों की चर्चाओं में सामने आना और जनता के बीच अजनबी बने रहना है। बीजेपी हाईकमान के सामने अब सबसे बड़ा संकट यह है कि यदि वह इस परिवारवादी और विजनहीन ढांचे को आगे बढ़ाती है, तो उसे जनता के भयंकर आक्रोश और विपक्ष के हमलों का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में कालाढूंगी का यह घमासान आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ने वाला है।
Uttarakhand Elections 2027: Political Upheaval in Kaladhungi Seat, Widespread Resentment Against Banshidhar Bhagat and His Son, and Analysis of Ticket Aspirants
Click to read News-1: कालाढूंगी
Click To read News-2 : कालाढूंगी
Click To read News-3 : कालाढूंगी
Click To read News-4 : कालाढूंगी
