September 16, 2026

मेडिकल यूनिवर्सिटी के 250 करोड़ के फंड पर भी विवाद उज्जैन को 70 फीसदी राशि देने पर आपत्ति

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जबलपुर। जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के पुनर्गठन का मामला अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। विश्वविद्यालय को दो हिस्सों में बांटने की प्रक्रिया को लेकर जबलपुर निवासी डॉ. पीजी नाजपांडे सहित अन्य लोगों ने याचिका दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदेश की इकलौती मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी के पुनर्गठन में जबलपुर के साथ समान व्यवहार नहीं किया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और चिकित्सा शिक्षा विभाग को नोटिस जारी किया है और चार सप्ताह के भीतर जवाब पेश करने को कहा है।

याचिका में मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के पुनर्गठन से जुड़े राजपत्र में प्रकाशित संशोधन अधिनियम के साथ मध्य प्रदेश धन्वंतरि विश्वविद्यालय अधिनियम 2026 की वैधानिकता को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नए ढांचे के तहत जबलपुर विश्वविद्यालय के हिस्से में चार संभाग रखे गए हैं जबकि उज्जैन में गठित धन्वंतरि विश्वविद्यालय को छह संभाग दिए गए हैं। याचिका में इसी व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए गए हैं और कहा गया है कि पुनर्गठन की प्रक्रिया समानता के संवैधानिक सिद्धांत के अनुरूप नहीं है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने अदालत में पुनर्गठन की प्रक्रिया को लेकर कई आपत्तियां रखीं। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय के विभाजन से पहले किसी विशेषज्ञ समिति से विस्तृत अध्ययन नहीं कराया गया। इसके अलावा प्रक्रिया की व्यवहार्यता को लेकर भी कोई रिपोर्ट तैयार नहीं कराई गई। याचिका में दावा किया गया है कि इतने बड़े संस्थागत बदलाव से पहले प्रशासनिक और शैक्षणिक प्रभाव का विशेषज्ञ स्तर पर आकलन किया जाना जरूरी था। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने पुनर्गठन की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं।

मामले में विश्वविद्यालय की आर्थिक संपत्तियों का मुद्दा भी महत्वपूर्ण बन गया है। याचिका के अनुसार मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के पास करीब 250 करोड़ रुपए का रिजर्व फंड है। याचिकाकर्ताओं ने इस राशि के बंटवारे को लेकर भी आपत्ति दर्ज कराई है। आरोप है कि रिजर्व फंड की करीब 70 प्रतिशत राशि उज्जैन में गठित धन्वंतरि विश्वविद्यालय को दिए जाने की प्रक्रिया चल रही है। याचिका में इस राशि के हस्तांतरण पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विश्वविद्यालय का पुनर्गठन केवल प्रशासनिक सीमाओं का बदलाव नहीं है बल्कि इसका सीधा असर मेडिकल शिक्षा से जुड़े संस्थानों और विद्यार्थियों पर भी पड़ सकता है। ऐसे में संभागों के बंटवारे और आर्थिक संसाधनों के वितरण को लेकर स्पष्ट और समान नीति जरूरी है। हाईकोर्ट ने फिलहाल सरकार और चिकित्सा शिक्षा विभाग से जवाब मांगा है। अब मामले की अगली सुनवाई में सरकार का पक्ष सामने आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि पुनर्गठन की प्रक्रिया को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर उसका क्या रुख है।

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