November 3, 2026

भोजशाला के इतिहास के पन्ने खुले, विशेष प्रदर्शनी में दिखे प्राचीन अवशेष और शिलालेख, सदियों पुराने घटनाक्रम को तस्वीरों से समझाया

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धार । धार की ऐतिहासिक भोजशाला एक बार फिर चर्चा में है। इस बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक के दौरान लगाई गई विशेष प्रदर्शनी में भोजशाला के इतिहास को 24 अध्यायों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इंदौर के डेली कॉलेज परिसर में आयोजित इस प्रदर्शनी में राजा भोज के शासनकाल से लेकर मध्यकालीन आक्रमणों और आधुनिक समय में भोजशाला को लेकर चले आंदोलनों तक का घटनाक्रम तस्वीरों के जरिए दिखाया गया है। भोजशाला के प्रत्यक्ष प्रमाण नाम से तैयार इस विशेष खंड में स्थापत्य कला शिलालेख स्तंभ धार्मिक प्रतीक और पुरातात्विक अवशेषों के चित्र लगाए गए हैं। प्रदर्शनी में कई ऐतिहासिक घटनाओं और दावों को क्रमवार रखा गया है। हालांकि इसमें प्रस्तुत मध्यकालीन घटनाओं और विवादों से जुड़े कई विवरण प्रदर्शनी के अपने दावे हैं जिन्हें स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाणों के रूप में देखना जरूरी नहीं है।

प्रदर्शनी की शुरुआत धार नगरी और परमार वंश के प्रसिद्ध शासक राजा भोज के परिचय से होती है। उन्हें पराक्रमी शासक के साथ कला साहित्य दर्शन विज्ञान और शिक्षा का संरक्षक बताया गया है। इसके बाद वर्ष 1034 में भोजशाला यानी सरस्वती कंठाभरण विश्वविद्यालय की स्थापना का उल्लेख किया गया है। अगले अध्यायों में भोजशाला की स्थापत्य कला संस्कृत शिलालेख देवी वाग्देवी की प्रतिमा और प्राण प्रतिष्ठा के लिए हुए यज्ञ का विवरण तस्वीरों के साथ दिखाया गया है। प्रदर्शनी में प्रवेश द्वार के भीतर परिजात मंजरी और विजयश्री नाटिका से जुड़े प्रकृत भाषा के शिलालेखों के चित्र भी लगाए गए हैं। इसके अलावा सिद्धि यंत्र सनातन प्रतीकों वाले स्तंभ और खंडित शिलालेखों को भी प्रदर्शित किया गया है।

भोजशाला को प्रदर्शनी में केवल धार्मिक स्थल नहीं बल्कि प्राचीन शिक्षा और ज्ञान का बड़ा केंद्र बताया गया है। मालवा का विश्वविद्यालय नाम के अध्याय में दावा किया गया है कि यहां पांच हजार से अधिक विद्यार्थी अध्ययन करते थे। संस्कृत संगीत खगोल विज्ञान योग आयुर्वेद और दर्शनशास्त्र जैसे विषयों की शिक्षा दिए जाने का उल्लेख है। शास्त्रार्थ साहित्य रचना वेद मंत्रों का उच्चारण और शिल्पकला को भी यहां की गतिविधियों का हिस्सा बताया गया है। राजा भोज की विद्वता को प्रदर्शित करने के लिए उनके नाम से जुड़े कई ग्रंथों की सूची भी लगाई गई है। इसमें सरस्वती कंठाभरण श्रृंगार प्रकाश समरांगण सूत्रधार युक्ति कल्पतरु राजमार्तंड और तत्व प्रकाश जैसी रचनाओं का उल्लेख है।

प्रदर्शनी के आठवें अध्याय से भोजशाला के कथित विध्वंस और मध्यकालीन आक्रमणों का विवरण शुरू होता है। इसमें कमाल मौलाना नाम के एक फकीर के वर्ष 1269 में मालवा आने और बाद में अलाउद्दीन खिलजी तक क्षेत्र की जानकारी पहुंचाने का दावा किया गया है। इसके बाद वर्ष 1305 में खिलजी के मालवा पर आक्रमण और परमार शासकों महलक देव तथा गोगादेव के प्रतिरोध का विवरण दिया गया है। प्रदर्शनी में यह भी दावा किया गया है कि भोजशाला के आचार्यों और विद्यार्थियों ने आक्रमणकारी सेना का मुकाबला किया था। करीब 1400 विद्वानों को बंदी बनाने और धर्म परिवर्तन से इनकार करने पर उनकी हत्या किए जाने का आरोप भी प्रदर्शनी में प्रस्तुत किया गया है। इन दावों को लेकर ऐतिहासिक स्रोतों और प्रमाणों की स्वतंत्र पड़ताल महत्वपूर्ण है।

आगे के अध्यायों में वर्ष 1401 में दिलावर खान द्वारा मालवा में स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने के बाद भोजशाला के स्थापत्य अवशेषों के इस्तेमाल और लाट मस्जिद के निर्माण का उल्लेख है। वर्ष 1514 में महमूद शाह खिलजी द्वितीय के धार पर आक्रमण तथा कमाल मौलाना की मजार बनाए जाने का विवरण भी दिया गया है। इसके बाद प्रदर्शनी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वर्ष 1857 की खुदाई और वाग्देवी की प्रतिमा से जुड़ा है। प्रदर्शनी के अनुसार अंग्रेजी शासन के पुरातत्व विभाग की खुदाई में स्फटिक पत्थर की वाग्देवी प्रतिमा मिली थी। वर्ष 1880 में भोपाल के पॉलिटिकल एजेंट मेजर किनकेड द्वारा इसे लंदन ले जाने और रॉयल म्यूजियम में रखवाने का दावा किया गया है। वर्ष 1961 में पुरातत्ववेत्ता विष्णु श्रीधर वाकणकर द्वारा लंदन जाकर प्रतिमा का अध्ययन किए जाने का भी उल्लेख है।

प्रदर्शनी के अंतिम अध्यायों में वर्ष 1936 से लेकर मंगलवार सत्याग्रह और भोजशाला से जुड़े आधुनिक विवादों की समयरेखा दिखाई गई है। इसमें वर्ष 1936 में पूजा और नमाज से संबंधित व्यवस्थाओं को लेकर विवाद शुरू होने का दावा किया गया है। वर्ष 1952 में श्री महाराजा भोज स्मृति वसंतोत्सव समिति के गठन और भोजशाला से जुड़े मामले को पुरातत्व विभाग को सौंपे जाने का उल्लेख भी है। वर्ष 1991 से शुरू हुए मंगलवार सत्याग्रह को विशेष स्थान दिया गया है। प्रदर्शनी के अनुसार 4 फरवरी 1991 से भोज उत्सव समिति ने पूजा के अधिकार की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया था। वर्ष 1996 के विवाद और उसके बाद मंगलवार को हिंदुओं की पूजा तथा शुक्रवार को मुस्लिम समाज की नमाज की व्यवस्था का विवरण भी शामिल किया गया है। इस तरह 24 अध्यायों की यह प्रदर्शनी भोजशाला के इतिहास और उससे जुड़े विभिन्न दावों को एक ही स्थान पर प्रस्तुत करती है।

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