November 3, 2026

भारत की विदेश नीति में राष्ट्रीय हित सर्वोपरि, किसी एक गुट तक सीमित नहीं रहेंगी वैश्विक साझेदारियां, बोले एलजी तरनजीत सिंह संधू

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नई दिल्ली। बदलती वैश्विक राजनीति के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभर रही है। भारत अपनी विदेश नीति के फैसले किसी एक देश या समूह के दबाव में लेने के बजाय राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देकर करता है। यही स्वतंत्र दृष्टिकोण उसे दुनिया के अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ मजबूत संबंध बनाने का अवसर देता है। दिल्ली के उपराज्यपाल सरदार तरनजीत सिंह संधू ने मंगलवार को हरियाणा के सोनीपत स्थित ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में आयोजित विशेष व्याख्यान के दौरान यह बात कही। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र वैश्विक साझेदारियां बनाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की भूमिका मजबूत करने के लिए रणनीतिक स्वायत्तता बेहद महत्वपूर्ण है।

बदलती भू-राजनीति में भारत की भूमिका विषय पर आयोजित व्याख्यान में संधू ने कहा कि दुनिया इस समय बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। रणनीतिक प्रतिस्पर्धा क्षेत्रीय संघर्ष आर्थिक अनिश्चितता और संसाधनों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती होड़ ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को नए सिरे से आकार देना शुरू कर दिया है। कई देश अपनी पुरानी साझेदारियों का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं और आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने के साथ भरोसेमंद आर्थिक एवं रणनीतिक सहयोगियों की तलाश कर रहे हैं।

उपराज्यपाल ने कहा कि भारत के पास बड़ी अर्थव्यवस्था युवा आबादी बढ़ती तकनीकी क्षमता और दुनिया के अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ स्थापित संबंधों जैसी महत्वपूर्ण ताकतें हैं। भारत की विशेषता यह है कि वह ऐसे देशों के साथ भी संवाद और सहयोग बनाए रख सकता है जिनके आपसी संबंध हमेशा सहज नहीं रहते। अमेरिका यूरोप रूस जापान ऑस्ट्रेलिया और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भारत के संबंध उसकी इसी कूटनीतिक क्षमता को दर्शाते हैं। उनके अनुसार रणनीतिक स्वायत्तता भारत को अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों का स्वतंत्र आकलन करने और अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के आधार पर निर्णय लेने की आजादी देती है।

संधू ने कहा कि मौजूदा समय में संघर्ष ऊर्जा संकट और आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान के कारण दुनिया के अनेक देश प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे हालात में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भरोसेमंद साझेदारों की जरूरत है जो स्थिरता बनाए रखने आर्थिक अवसर उपलब्ध कराने और संकटों से निपटने में सहयोग कर सकें। भारत के पास इस दिशा में बड़ी भूमिका निभाने की क्षमता और विश्वसनीयता दोनों मौजूद हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग भू-राजनीतिक समूहों के साथ भारत के संबंध संकट के समय संवाद के नए रास्ते खोल सकते हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल मजबूत अर्थव्यवस्था और कूटनीतिक संबंधों से वैश्विक प्रभाव नहीं बढ़ता। भारत को अपनी क्षमताओं को लगातार मजबूत करना होगा। इसके लिए शिक्षा अनुसंधान बुनियादी ढांचे रक्षा विनिर्माण ऊर्जा सुरक्षा और उन्नत तकनीक में निवेश जरूरी है। ग्लोबल साउथ के साथ सहयोग को भी उन्होंने महत्वपूर्ण बताया। उनके मुताबिक विकासशील देश किफायती तकनीक बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं बुनियादी ढांचे में निवेश और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच चाहते हैं। भारत अपनी विशेषज्ञता और तकनीकी सहयोग के जरिए इन देशों की क्षमताओं के विकास में मदद कर सकता है।

संधू ने कहा कि भारत को बदलती वैश्विक व्यवस्था में केवल दूसरे देशों के फैसलों के अनुसार खुद को ढालने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे उन नियमों संस्थानों तकनीकों और आर्थिक साझेदारियों को आकार देने में भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए जो आने वाले वर्षों में दुनिया की दिशा तय करेंगे। भारत के सामने अवसर केवल वैश्विक व्यवस्था में अपनी जगह बनाने का नहीं बल्कि उसे बेहतर बनाने में योगदान देने का भी है।

कार्यक्रम में ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के संस्थापक कुलपति प्रोफेसर सी राज कुमार ने उपराज्यपाल का स्वागत किया। उन्होंने संधू के भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी और अमेरिका में भारत के राजदूत के रूप में किए गए कार्यों की सराहना की। उन्होंने विश्वविद्यालय की ओर से पहले वर्ल्ड आइडियाज फोरम 2027 की शुरुआत की घोषणा भी की। इसका उद्देश्य भारत और ग्लोबल साउथ को विचारों के निर्माण तथा वैश्विक विमर्श में नेतृत्वकारी भूमिका देने का मंच उपलब्ध कराना है। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने भी भारत के भविष्य और बदलती भू-राजनीति से जुड़े विषयों पर चर्चा की।

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