November 6, 2026

ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों से बढ़ेगा अमेरिका का संकट, ट्रंप की एक और चूक से पश्चिम एशिया में भड़क सकती है जंग

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नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। दोनों देशों के बीच फरवरी 2026 में शुरू हुए भीषण संघर्ष ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया था। उस दौरान अमेरिकी और इजरायली हमलों में ईरान के मिसाइल ठिकानों और ड्रोन केंद्रों को निशाना बनाया गया था। जवाब में ईरान ने भी मिसाइलों और ड्रोन के जरिए पलटवार किया था। इतना ही नहीं बल्कि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही को प्रभावित करने की कोशिश भी की गई थी। अब अगर दोनों देशों के बीच फिर से बड़े स्तर पर युद्ध छिड़ता है तो ईरान की रणनीति केवल मिसाइल हमलों तक सीमित नहीं रहेगी। वह कई तरह के हथियारों और क्षेत्रीय सहयोगियों के जरिए अमेरिका पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है।

ईरान की सैन्य ताकत का सबसे बड़ा आधार उसका बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम है। उसके पास कम और मध्यम दूरी तक मार करने वाली कई तरह की मिसाइलें मौजूद हैं। फतेह शहाब और सेज्जिल जैसे मिसाइल परिवार उसकी सैन्य क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कुछ मिसाइलों की अनुमानित मारक क्षमता करीब 2000 किलोमीटर तक बताई जाती है। इस दायरे में इजरायल और पश्चिम एशिया में मौजूद कई अमेरिकी सैन्य ठिकाने आ सकते हैं। फतेह सीरीज की ठोस ईंधन वाली मिसाइलों की खासियत यह है कि इन्हें लॉन्च करने से पहले ईंधन भरने की लंबी प्रक्रिया की जरूरत नहीं होती। इससे इन्हें कम समय में इस्तेमाल करने की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि अमेरिका और इजरायल के आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम ईरान के इन हमलों को रोकने की क्षमता रखते हैं। इसलिए हर मिसाइल का लक्ष्य तक पहुंचना तय नहीं माना जा सकता।

ईरान की दूसरी बड़ी ताकत उसके अंडरग्राउंड मिसाइल ठिकाने हैं। इन्हें आमतौर पर मिसाइल सिटी कहा जाता है। जमीन के भीतर बनी लंबी सुरंगों और सुरक्षित परिसरों में मिसाइलों के साथ सैन्य उपकरण भी रखे जाते हैं। इनका मकसद दुश्मन के हवाई हमलों के बावजूद अपनी सैन्य क्षमता को सुरक्षित रखना है। नवंबर 2026 की शुरुआत में ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने भूमिगत मिसाइल ठिकानों के वीडियो जारी कर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया था। हालांकि ये ठिकाने पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। अमेरिका के बंकर बस्टर बम और लगातार हवाई हमले इन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं।

मिसाइलों के अलावा शाहेद ड्रोन ईरान के लिए एक अहम हथियार साबित हो सकते हैं। शाहेद-136 और शाहेद-238 जैसे ड्रोन अपेक्षाकृत कम लागत वाले मानवरहित हथियार हैं। इनका इस्तेमाल एकतरफा हमलों के लिए किया जाता है। इनकी कम कीमत के मुकाबले इन्हें रोकने में इस्तेमाल होने वाले इंटरसेप्टर काफी महंगे हो सकते हैं। यही वजह है कि ड्रोन हमलों के जरिए विरोधी देश की रक्षा व्यवस्था पर आर्थिक दबाव भी बनाया जा सकता है। ईरान मिसाइलों और ड्रोन का एक साथ इस्तेमाल करके अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम के सामने चुनौती खड़ी करने की कोशिश कर सकता है।

इस संभावित युद्ध का एक महत्वपूर्ण मोर्चा समुद्र भी होगा। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे अहम तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति और वैश्विक बाजार प्रभावित हो सकते हैं। ईरान समुद्री माइंस और अन्य समुद्री हथियारों के जरिए जहाजों की आवाजाही को मुश्किल बना सकता है। इसके अलावा यमन के हूती और इराक तथा लेबनान में सक्रिय ईरान समर्थित संगठन भी संघर्ष का दायरा बढ़ा सकते हैं। हालांकि उनकी भूमिका परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।

कुल मिलाकर ईरान की रणनीति अमेरिका को एक लंबे और महंगे संघर्ष में उलझाने की हो सकती है। मिसाइलें ड्रोन भूमिगत ठिकाने और समुद्री दबाव उसके संभावित जवाबी विकल्प हैं। दूसरी तरफ अमेरिका के पास आधुनिक वायु शक्ति और मजबूत रक्षा प्रणालियां हैं। ऐसे में युद्ध का नतीजा पहले से तय नहीं किया जा सकता। लेकिन अगर दोनों देशों के बीच फिर सैन्य टकराव होता है तो इसका असर पश्चिम एशिया से निकलकर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा तक पहुंच सकता है।

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