June 24, 2026

चीन को लेकर अमेरिका में बढ़ी चिंता: संवेदनशील प्रयोगशालाओं तक पहुंच पर उठे गंभीर सवाल

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नई दिल्ली ।अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच अब अमेरिकी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में चीनी नागरिकों की मौजूदगी एक नया राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दा बन गई है। अमेरिका के दो वरिष्ठ रिपब्लिकन सीनेटरों ने ट्रंप प्रशासन से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और संवेदनशील शोध संस्थानों तक विदेशी नागरिकों की पहुंच की समीक्षा करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल वैज्ञानिक सहयोग का मामला नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी श्रेष्ठता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

अर्कांसस से रिपब्लिकन सीनेटर टॉम कॉटन और यूटा से सीनेटर माइक ली ने अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट को एक विस्तृत पत्र लिखकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। दोनों सांसदों का कहना है कि अमेरिकी ऊर्जा विभाग की राष्ट्रीय प्रयोगशालाएं कृत्रिम बुद्धिमत्ता उन्नत कंप्यूटिंग ऊर्जा सुरक्षा सामग्री विज्ञान और परमाणु अनुसंधान जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों में काम करती हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में चीनी नागरिकों की मौजूदगी और उनकी पहुंच राष्ट्रीय हितों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।

पत्र में दोनों सीनेटरों ने ऊर्जा विभाग के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि वित्त वर्ष 2025 के दौरान लगभग 1900 अल्पकालिक यात्राएं चीनी नागरिकों द्वारा की गईं। इसके अतिरिक्त करीब 1300 दीर्घकालिक शोध नियुक्तियां और लगभग 2100 औपचारिक रोजगार पदों पर भी चीनी नागरिक विभिन्न प्रयोगशालाओं से जुड़े रहे। इन आंकड़ों ने अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

सांसदों ने यह भी बताया कि इसी अवधि में चीनी नागरिकों ने राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की सुविधाओं तक 5000 से अधिक बार प्रत्यक्ष अथवा दूरस्थ पहुंच हासिल की। उनके अनुसार यह स्थिति केवल सामान्य वैज्ञानिक आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है बल्कि इससे संवेदनशील तकनीकों और अनुसंधान से जुड़ी जानकारियों के लीक होने की आशंका भी पैदा होती है।

टॉम कॉटन और माइक ली का तर्क है कि चीन वर्तमान समय में उभरती तकनीकों की वैश्विक दौड़ में अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी है। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन लंबे समय से विदेशी तकनीक और बौद्धिक संपदा हासिल करने की रणनीति पर काम करता रहा है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं तक व्यापक पहुंच देना राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से चिंताजनक है।

पत्र में दोनों सांसदों ने ऊर्जा विभाग से कई महत्वपूर्ण सवाल भी पूछे हैं। उन्होंने जानना चाहा है कि विभाग अपनी सुरक्षा नीतियों में चीन के राष्ट्रीय खुफिया कानून को किस प्रकार ध्यान में रखता है। सीनेटरों का दावा है कि यह कानून चीनी नागरिकों को आवश्यक होने पर अपने देश की खुफिया एजेंसियों के साथ सहयोग करने के लिए बाध्य करता है। इसलिए अमेरिका को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।

इसके अलावा सांसदों ने यह भी जानकारी मांगी है कि क्या चीनी नागरिकों को निर्यात नियंत्रण वाली तकनीकों नियंत्रित अनुसंधान परियोजनाओं या अन्य संवेदनशील वैज्ञानिक कार्यक्रमों तक पहुंच दी जा रही है। उन्होंने यह भी पूछा है कि रिमोट एक्सेस को सीमित करने और संभावित जोखिमों को कम करने के लिए विभाग कौन से कदम उठा रहा है।

सीनेटरों ने अपने पत्र में स्पष्ट कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और महत्वपूर्ण तकनीकी बढ़त को बनाए रखना ऊर्जा विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उनका मानना है कि यदि हजारों विदेशी नागरिक विशेषकर चीन जैसे रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी देश के नागरिक इन प्रयोगशालाओं तक लगातार पहुंच बनाते रहेंगे तो अमेरिका की तकनीकी बढ़त और सुरक्षा दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब इस मुद्दे को उठाया गया हो। जनवरी में भी टॉम कॉटन माइक ली और अन्य रिपब्लिकन सांसदों ने ऊर्जा विभाग से कार्रवाई की मांग की थी। इसके बाद मार्च 2025 में उन्होंने जीएटीई एक्ट नामक विधेयक पेश किया था जिसका उद्देश्य अमेरिकी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं और संवेदनशील तकनीकों तक प्रतिद्वंद्वी देशों के नागरिकों की पहुंच को सीमित करना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा और तेज होगी। ऐसे में वैज्ञानिक सहयोग और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना अमेरिकी प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

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