धनतेरस आज, जानें पूजा का पूरा विधान, खरीदारी के शुभ मुहूर्त और यम दीपदान की परंपरा..
धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर की पूजा प्रदोष काल में करना शुभ माना जाता है। पूजा और खरीदारी के शुभ समय में अलग-अलग शहरों के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए स्थानीय पंचांग के मुताबिक मुहूर्त देखना उचित माना जाता है। इस दिन पूजा से पहले सभी आवश्यक सामग्री एकत्र कर लेनी चाहिए, ताकि विधि के दौरान किसी वस्तु की कमी न रहे।
पूजा की तैयारी के लिए लकड़ी की चौकी, लाल या पीला कपड़ा, साबुत चावल, गंगाजल, पंचपात्र, आचमनी और गुलाब की पंखुड़ियां रखी जाती हैं। इसके अलावा रोली, कुमकुम, चंदन, कलावा, फूल, फल, धूप, कपूर, मिठाई, कलश और देवी-देवताओं की प्रतिमाएं या तस्वीरें भी रखी जा सकती हैं। भोग के लिए बताशे, खीर, पंचामृत, पान, लौंग और सुपारी की व्यवस्था की जाती है। दीपदान के लिए मिट्टी के दीपक, सरसों का तेल, गाय का घी और रूई की बातियां रखी जाती हैं।
धनतेरस की पूजा में सबसे पहले भगवान गणेश का पूजन किया जाता है। पूजा स्थल पर उनकी प्रतिमा स्थापित कर दीपक और धूप जलाएं। इसके बाद हल्दी, फूल, अक्षत और मोदक अर्पित करें। गणेश मंत्र ‘ॐ गं गणपतये नमः’ का स्मरण कर पूजा की शुरुआत करें। इसके बाद भगवान धन्वंतरि की आराधना करें। उन्हें आयुर्वेद और आरोग्य का देवता माना जाता है। उनकी पूजा में पंचामृत, फूल, अक्षत और धूप अर्पित कर परिवार के अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है।
इसके बाद भगवान कुबेर की पूजा की जाती है। उन्हें धन का रक्षक माना जाता है। पूजा में सिक्के, फूल और अक्षत रखकर धन-धान्य में वृद्धि की प्रार्थना की जाती है। नए खरीदे गए सोने-चांदी के आभूषण भी पूजा स्थल पर रखे जा सकते हैं। अंत में माता लक्ष्मी की आराधना की जाती है। उन्हें कमल का फूल, रोली, अक्षत, मिठाई, फल और बताशे अर्पित किए जाते हैं। घी का दीपक जलाकर आरती की जाती है और घर में सुख, शांति तथा समृद्धि बनाए रखने की कामना की जाती है।
धनतेरस पर घर के अलग-अलग स्थानों पर सात दीपक जलाने की परंपरा भी प्रचलित है। मान्यता है कि दीपदान से घर में सकारात्मकता और खुशहाली आती है। इसके साथ ही यमराज के नाम से यम दीपदान किया जाता है। इसे यम दीपक या मुखदीपदान भी कहा जाता है। परंपरा के अनुसार, यह विशेष दीपक घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा में जलाया जाता है। इसे परिवार के सदस्यों के सोने से पहले या सोने के समय जलाने की मान्यता है। कुछ परिवारों में सभी सदस्यों के सो जाने के बाद दीपक जलाया जाता है। दीपदान के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखने की परंपरा भी प्रचलित है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, यह दीपक परिवार के सदस्यों की लंबी आयु और अकाल मृत्यु से सुरक्षा की कामना का प्रतीक है।
धनतेरस पर सोना, चांदी और धातु के बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। हालांकि, खरीदारी के लिए महंगी वस्तु लेना जरूरी नहीं है। अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार कोई उपयोगी नई वस्तु या बर्तन भी खरीदा जा सकता है। इस दिन घर की साफ-सफाई करने, मुख्य द्वार सजाने, मिट्टी के दीपक जलाने और जरूरतमंदों की सहायता करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवसर पर विवाद, झगड़े, फिजूलखर्ची और दिखावे से बचना चाहिए। शराब और मांसाहारी भोजन से दूरी रखने की सलाह भी दी जाती है।
धनतेरस का संबंध समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि अमृत प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया था। इसी दौरान भगवान विष्णु के अंशावतार भगवान धन्वंतरि हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। उन्हें आयुर्वेद और चिकित्सा का देवता माना जाता है। समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी के प्रकट होने की कथा भी इस पर्व से जुड़ी है। यही वजह है कि धनतेरस पर धन के साथ स्वास्थ्य, आरोग्य और परिवार की खुशहाली की कामना की जाती है।
