धनतेरस की रात क्यों जलाया जाता है यम दीपक? समुद्र मंथन से राजकुमार की मृत्यु तक जुड़ी हैं तीन पौराणिक कथाएं..
समुद्र मंथन से जुड़ी है धनतेरस की कथा
धनतेरस को धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। एक प्रमुख पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन से जुड़ा हुआ है। कथा में बताया गया है कि जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, तब कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए थे।
भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और आरोग्य का देवता माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, उन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार भी कहा जाता है। समुद्र मंथन के दौरान उनके हाथों में अमृत कलश होने के कारण धनतेरस पर नए बर्तन खरीदने की परंपरा प्रचलित हुई। माना जाता है कि इस दिन धातुओं और बर्तनों की खरीदारी करने से घर में समृद्धि आती है। इसके साथ ही परिवार के सदस्यों को अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
माता लक्ष्मी और किसान से जुड़ी दूसरी कथा
धनतेरस पर मां लक्ष्मी की पूजा और दीपक जलाने के पीछे भी एक पौराणिक कथा सुनाई जाती है। मान्यता के अनुसार, एक बार माता लक्ष्मी को श्राप के कारण 12 वर्षों तक एक किसान के घर रहना पड़ा था। उनके वहां रहने के दौरान किसान के जीवन में लगातार उन्नति हुई। उसके घर में धन-धान्य की वृद्धि होने लगी और परिवार में खुशहाली आ गई।
12 वर्ष पूरे होने पर जब माता लक्ष्मी के वापस जाने का समय आया तो किसान उन्हें विदा करने के लिए तैयार नहीं था। उसे विश्वास था कि माता लक्ष्मी के आगमन से ही उसके जीवन में सुख और समृद्धि आई है। किसान की विनती सुनकर माता लक्ष्मी ने उसे कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर विशेष पूजा करने का उपाय बताया।
उन्होंने किसान से कहा कि इस दिन घर की अच्छी तरह सफाई करे, घी का दीपक जलाए और एक कलश में सिक्के रखकर श्रद्धापूर्वक पूजा करे। माता लक्ष्मी ने यह भी बताया कि जो व्यक्ति इस तिथि पर विधि-विधान से उनकी आराधना करेगा, उसके घर में सुख-समृद्धि बनी रहेगी। किसान ने उनके बताए अनुसार पूजा की। धार्मिक मान्यता है कि इसके बाद उसके घर में कभी धन और अनाज की कमी नहीं हुई। इसी कथा को धनतेरस पर लक्ष्मी पूजन और दीप प्रज्वलित करने की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
राजकुमार की मृत्यु से जुड़ी है यम दीपक की कथा
धनतेरस की रात यमराज के नाम से दीपक जलाने के पीछे एक अन्य प्रसिद्ध पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि एक बार यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि क्या कभी किसी व्यक्ति के प्राण लेते समय उन्हें दुख या पीड़ा महसूस हुई है। इस पर एक यमदूत ने एक राजकुमार की घटना सुनाई।
कथा के अनुसार, हंस नाम का एक राजा शिकार के लिए निकला था। रास्ता भटकने के कारण वह दूसरे राज्य पहुंच गया, जहां राजा हेमा ने उसका आदर-सत्कार किया। इसी दौरान राजा हेमा के घर पुत्र का जन्म हुआ। ज्योतिषियों ने उसकी कुंडली देखकर भविष्यवाणी की कि विवाह के चार दिन बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी।
यह सुनकर राजा ने अपने पुत्र को यमुना नदी के किनारे एक गुफा में रखवा दिया, ताकि उसका विवाह न हो सके। लेकिन एक दिन संयोग से राजा हंस की पुत्री वहां पहुंच गई। राजकुमार को देखकर वह उस पर मोहित हो गई और दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया। भविष्यवाणी के अनुसार विवाह के चौथे दिन राजकुमार की मृत्यु हो गई। अपने पति के वियोग में उसकी पत्नी का विलाप देखकर यमदूत का मन भी दुखी हो गया।
यमदूत ने यमराज से पूछा कि क्या मनुष्य को अकाल मृत्यु से बचाने का कोई उपाय है। इस पर यमराज ने बताया कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर विधिपूर्वक पूजा करने और घर के बाहर दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय दूर होने की मान्यता है। इसी धार्मिक विश्वास के चलते धनतेरस की रात यमराज के नाम दीपक जलाया जाता है। इस परंपरा को यम दीपदान कहा जाता है।
इस प्रकार धनतेरस केवल धन और खरीदारी का पर्व नहीं, बल्कि आरोग्य, समृद्धि और जीवन की सुरक्षा की कामना से जुड़ा त्योहार भी माना जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान धन्वंतरि की पूजा के साथ यमराज के नाम दीपदान करने की परंपरा विशेष धार्मिक महत्व रखती है।
