संत प्रेमानंद महाराज का भावुक संदेश सुन श्रद्धालु हुए भावुक, बोले– मैं रहूं या न रहूं, आपका साथ कभी नहीं छोड़ूंगा
काफी समय से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे संत प्रेमानंद महाराज ने अपने संदेश में भक्तों से विशेष आग्रह करते हुए कहा कि उन्हें लेकर किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि यह शरीर नश्वर है और जीवन का नियम परिवर्तन है, लेकिन आत्मिक संबंध कभी समाप्त नहीं होते। उन्होंने अपने श्रद्धालुओं को आश्वस्त करते हुए कहा कि चाहे वह इस शरीर में रहें या न रहें, उनका स्नेह, आशीर्वाद और आध्यात्मिक उपस्थिति हमेशा उनके साथ बनी रहेगी। उन्होंने भक्तों से अपनी चिंता छोड़कर पूरी श्रद्धा के साथ श्रीजी के नाम का स्मरण और भजन करने की अपील की।
बताया जा रहा है कि पिछले कई दिनों से संत प्रेमानंद महाराज की तबीयत ठीक नहीं चल रही है, जिसके कारण उनकी प्रसिद्ध पदयात्रा और नियमित दर्शन कार्यक्रम अस्थायी रूप से स्थगित कर दिए गए हैं। यह निर्णय उनके स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए लिया गया। उनके दर्शन के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते रहे हैं और उनकी एक झलक पाने के लिए लोग घंटों इंतजार किया करते हैं। लेकिन स्वास्थ्य में आई गिरावट के बाद परिस्थितियों में बदलाव देखने को मिला है।
गौरतलब है कि संत प्रेमानंद महाराज लंबे समय से गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। कठिन शारीरिक परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी धार्मिक दिनचर्या और भक्तों से जुड़ाव को कभी कम नहीं होने दिया। शारीरिक कष्ट के बावजूद उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्तों के प्रति समर्पण हमेशा लोगों के लिए प्रेरणा का विषय रहा है। यही कारण है कि उनके स्वास्थ्य को लेकर भक्तों की चिंता स्वाभाविक रूप से लगातार बढ़ती रही।
अपने संदेश में उन्होंने एकांतवास को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि उनका यह एकांत किसी निजी कारण या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं है, बल्कि यह उनके आश्रितों और भक्तों के कल्याण से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि अब उनका जीवन पूरी तरह अपने अनुयायियों की आध्यात्मिक उन्नति और कल्याण के लिए समर्पित है। साथ ही उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से निर्भय और निश्चिंत रहने की अपील की।
संत प्रेमानंद महाराज का यह भावुक संदेश केवल स्वास्थ्य अपडेट नहीं बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी माना जा रहा है। उनके शब्दों ने एक बार फिर यह दिखाया कि संतों का रिश्ता केवल शारीरिक उपस्थिति तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह श्रद्धा, विश्वास और आत्मिक जुड़ाव से जुड़ा होता है। यही कारण है कि उनके इस संदेश ने भक्तों के मन को भावुक भी किया और उन्हें आध्यात्मिक रूप से मजबूत होने का संदेश भी दिया।
