July 1, 2026

Election 2027: उत्तराखंड की कई बड़ी सीटों पर हार के कगार में भाजपा

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UK-BJPFailure in 2027
  • खुद पर जरुरत से ज्यादा भरोसा बनेगा पराजय का कारण!

साल 2027 के उत्तराखंड चुनावों में भाजपा अनेक सीटें गंवाते हुए दिख रही है। जिसका कारण उसकी जमीनी पकड़ में ढ़ीलेपन को माना जा रहा है। एक ओर जहां साल 2022 के चुनाव में भाजपा ने 70 सदस्यीय उत्तराखंड विधान सभा में 45 सीटें जीतकर सरकार बनाई थीं। वहीं इस बार लोगों की नाराजगी और संगठन की कमजोरी के चलते भाजपा बमुश्किल करीब 37 से 40 सीटों पर निपटती दिख रही है।

इसका कारण एक और जहां वर्तमान विधायकों से जनता की नाराजगी (विकास कार्यों की धीमी गति) है। वहीं कई ऐसे मुद्दे हैं जो सीधे तौर पर जनता से जुड़े हैं और सरकार की कमजोरी के चलते जनता में भीषण नाराजगी है। इसके अलावा संगठन का खुद पर जरूरत से ज्यादा भरोसा भी इस बार भाजपा को कमजोर करता दिख रहा है, जिसके चलते एक ओर जहां कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी है। तो वहीं संगठन इसको अब तक भांप नहीं पा रहा है। और अपनी ही मस्ती में आगे बढ़ता दिख रहा है।

वहीं प्रदेश में कई ऐसी सीटें भी हैं कि भाजपा वहां जीत तो हासिल कर सकती है, लेकिन जनता का भरोसा वहां के पुराने नेताओं पर नहीं है, ऐसे में यदि भाजपा इन सीटों पर नए लोगों को सामने नहीं लाती है, तो भाजपा के ये पुराने गढ़ भी ढह सकते हैं।

कई तरह के सर्वें जो चुपचाप कुछ संस्थानों द्वारा भी कराए जा चुके हैं। उनकी रिपोर्ट साफ तौर से ये साबित करती है कि खुद भाजपा में भी न केवल कुछ विधायकों को लेकर ही चिंता बनी हुई है, बल्कि कुछ विधायक तो इस बार चुनावी दृष्टि से खतरे में भी माने जा रहे हैं।

ऐसे में कुछ विधानसभाओं में तो भाजपा के पास प्रत्याशी को बदलना ही एक मात्र उपाय है। तो वहीं कुछ क्षेत्रों में भाजपा का तीव्र विरोध प्रत्याशी में बदलाव से थमता नहीं दिख रहा है। इसके अलावा भी कई जगह ऐसी हैं जहां पिछली बार हारी भाजपा इस बार जीत की आशा लगाए बैठी है, लेकिन इस बार भी वह वहां से जीतती नहीं दिख रही है। इसका मुख्य कारण भी संगठन के कार्यों में लेटतीफी ही सामने आ रही है। ज्ञात हो भाजपा प्रदेशकार्यकारिणी के सदस्यों की अब तक घोषणा ही नहीं की गई है, ज्ञात हो कि पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत य​हीं सदस्य करते हैं न कि पदाधिकारी। इनके बल पर जहां कई क्षेत्रों में भाजपा रिक्वरी कर सकती थी, वहां उसकी हालत पतली होती दिख रही है। क्योंकि जमीन पर कोई बहुत ज्यादा कार्यकर्ता दिख ही नहीं रहे हैं। ऐसे में जहां पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर होती दिख रही है वहीं अब तक नाम नहीं आने से कार्यकर्ता भी नाराज बने हुए हैं।

चलिए जानते हैं कि किन विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा कमजोर है।

1. विनोद चमोली – विधायक, देहरादून कैंट, इनसे जुड़े विवादों और सार्वजनिक चर्चाओं के चलते य​ह सीट इस बार भाजपा के लिए कठिन बनती दिख रही है। इन्हें लेकर जनता में अविश्वास पनपता साफ देखा जा सकता है। ऐसे में यहां क्षेत्र की जनता भाजपा के विधायक चेहरे में बदलाव चाहती है।

2. झबरेड़ा, विधायक देशराज करणवाल – इनका झाबरेडी खुर्द की घटना को लेकर बयान पार्टी के लिए गले की फांस बन गया है। इसके चलते जहां जनता इनसे नाराज चल रही है। वहीं भाजपा संगठन के स्तर पर क्षेत्र में काम नहीं होना, भाजपा के लिए परेशानी का विषय बना हुआ है। पूर्व में इनका गांव वालों के साथ एक वीडियो भी वारयल हुआ था तभी से क्षेत्र की जनता इन्हें लेकर बदलाव की मांग करती आ रही हैं

3. ज्वालापुर के पूर्व विधायक सुरेश राठौर के बाद से ज्वालापुर विधानसभा को लेकर भी भाजपा की स्थिति कमजोर बनी हुई है। यहां भी न तो संगठन मजबूत रूप में सामने आ रहा है और न ही पार्टी का कोई व्यक्ति मजबूत स्थिति में दिख रहा है। भले ही भाजपा ने इन्हें 2025 में 6 साल के लिए निष्काषित कर दिया हो, लेकिन क्षेत्र में इनकी अपनी पकड़ भी काफी हद तक ठीक ही है, ऐसे में यदि ये दूसरे खेमे में जाते हैं, तो यह स्थिति भाजपा को भारी पड़ सकती है।

4. कालाढूंगी विधायक बंसीधर भगत– क्षेत्र में विकास की कमी को लेकर जहां एक ओर जनता इनसे अत्यधिक नाराज बनी हुई है। तो वहीं इनकी उम्र अधिक होने को लेकर भी चिंता बनी हुई है। जनता तक का कहना है कि जब ये पहले कम उम्र के दौरान में तक क्षेत्र का विकास नहीं करा पाए तो अब इस बढती उम्र में इन्हें जीताना तो क्षेत्र के विकास को गर्त में ले जाने के समान होगा। इसके अलावा पुत्र को टिकट देने की मांग वाले इनके बयान ने केवल आम जनता को ही नहीं पुराने समय से पार्टी से जुड़े लोगों तक को नाराज कर दिया है। सभी इसे पार्टी की लाइन को छोड़ कांग्रेस की लाइन पर चलने वाला विचार मान रहे हैं।

राजनैतिक विश्लेषकों का तो यहां तक मानना है कि कुल मिलाकर बंसीधर भगत या उनके किसी अपने को टिकट दिया जाना, जनता सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी व अमित शाह की हार के रूप में देखेगी।

क्षेत्र के लोगों का मानना है कि यहां एक ऐसे नए नेता की जरूरत है, जो युवा हो और राजनीति में पका पुराना चावल न हो। इसके अलावा वह राजनीति से इतर भी जनता की सेवा करता हो और उसका विजनरी क्षमता अत्यंत शानदार हो।

  • क्या मोदी व शाह की जोड़ी को झुका कर ही दम लेंगे भगत…
    पुराने जनसंघी तो यहां तक कहने से पीछे नहीं हट रहे कि अब ये देखना जोरदार होगा कि पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी इनसे डर कर इनकी बात मानती है या नहीं। उनके अनुसार यदि मोदी व शाह ने इनकी बात मान ली तो ये देश के एकमात्र ऐसे नेता होंगे जिन्होंने इतनी मजबूत जोड़ी को भी अपने सामने झुकने को मजबूर कर दिया। लेकिन इसका प्रभाव ये होगा कि इसके बाद हर कोई इस जोड़ी को दबाने का प्रयास करेगा।

 

  • अपनी ही बात से मुकरे भगत

यहां तक की क्षेत्र के कई बुजुर्ग तो यह तक बताते हैं कि करीब 2020 में जब बंसीधर भगत प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे, तब उन्होंने ये साफ घोषणा की थी कि 2022 जिन भी विधायकों का रिपोर्ट कार्ड ठीक नहीं है, उन्हें टिकट नहीं मिलेगा। — ऐसे में अब जब उनका खुद का रिपोर्ट कार्ड शून्य के आसपास है या​नी रिपोर्ट कार्ड की स्थिति में वह पूरी तरह से फेल हो चुके हैं तो अब किस अधिकार से अपने लिए या अपने बेटे के लिए टिकट मांग रहे हैं।

5. खजान दास – विधायक, राजपुर रोड : इन्हें लेकर जनता की नाराज़गी मुख्य रूप से विकास कार्यों की कमी, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में अव्यवस्था और कुछ विवादों से जुड़ी है। राजपुर रोड क्षेत्र में टूटी सड़कों, सीवर और पेयजल लाइन की समस्याओं के समाधान न होने से जनता असंतुष्ट है। ऐसे में इनकी सीट भी इस बार भाजपा के लिए काफी परेशानी का कारण बनती दिख रही है।

6. दीपक बत्रा – विधायक, रुड़की: इन पर क्षेत्र की जनता के विश्वास को तार तार करने का आरोप लगाया जाता है। वादे के बावजूद कार्यों को पूरा न करना जैसी स्थितियों के चलते यहां की जनता में इन्हें लेकर नाराजगी हैं।

7. रुद्रपुर के कद्दावर नेता राजकुमार ठुकराल जो दो बार भाजपा की ओर से इस क्षेत्र के विधायक रह चुके हैं। वे अब भाजपा छोड़ कर कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं। ऐसे में यहां अब कांग्रेस की शक्ति में इजाफा देखने को मिल रहा है। जिसके चलते 2027 चुनाव में यहां से जीत के लिए भाजपा को ऐडी चोटी का जोर लगाना होगा।

8. साहदेव सिंह पुंडीर – विधायक, सहसपुर, इन पर सड़क और नाली निर्माण कार्य समय पर पूरे नहीं करवाने, क्षेत्र में विकास कार्यों की धीमी गति और उनकी संपत्ति में तेज़ी से हुई वृद्धि के सवालों ने सहसपुर विधानसभा भाजपा के लिए मुश्किलों से भरा क्षेत्र बन गई है। ऐसे में जनता की नाराजगी और संगठन की कमजोरी भाजपा को यह सीट गंवाने के लिए मजबूर कर सकती है।

9. पौड़ी से वर्तमान विधायक धन सिंह रावत, इनकी स्थिति जो कुछ निजी सर्वे में समाने आई है, उसके अनुसार जनता के नजरिये में इसका मुख्य कारण अंकिता मर्डर केस है जिसमें वे अपने ही क्षेत्र की बेटी के लिए पुलिस और प्रशासन की तेज कार्रवाई करवाने में असफल रहे। यानि उन्होंने इस मामले में जनभावनाओं के अनुरूप नेतृत्व नहीं किया। इसके अलावा मंत्री रहते हुए भी स्वास्थ्य मामले में उन्होंने पर्याप्त आवाज़ नहीं उठाई।

इन 9 विधानसभा क्षेत्रों के अलावा कई अन्य विधानसभाक्षेत्र के लोगों का यह भी मानना है कि हमें केंद्र की सरकार से कोई शिकायत नहीं है, हम 2029 में भी मोदी जी को ही वोट देकर उन्हें जिताएंगे। लेकिन राज्य की सरकार प्रधानमंत्री के सपनों पर ही पानी फेरने में लगी हुई है, ऐसे में यहां की सरकार को हटाना ही एकमात्र विकल्प है।

 जानकारों के अनुसार अभी और कई बातें सामने आनी हैं और चुनाव के पास तक अनेक बड़े खुलासे भी सामने आएंगे, जिससे मुमकिन है उत्तराखंड भाजपा की स्थिति कई और स्थानों पर अत्यधिक कमजोर हो सकती है।

राजनीति के जानकारों के अनुसार यहां ये भी समझ लें कि भाजपा इनमें से कई सीटों को डेमेज कंट्रोल के तहत आसानी से वापस पा सकती थी, लेकिन कार्यकारिणी सदस्य ही न होने के कारण वह इसे अब तक पूरी तरह से जमीन पर उतर का कंट्रोल नहीं कर सकी है। वहीं जानकारों का यह भी मानना है कि आगामी चंद दिनों में यदि भाजपा संगठन कार्यकारिणी सदस्यों को जनता के सामने नहीं लाता है तो ये लगभग पक्का ही है कि उसके बादवह 2027 के चुनावों को लेकर डेमेज कंट्रोल करने में सक्षम नहीं हो पाएगा। ऐसे में कुल मिलाकर नेताओं द्वारा क्षेत्र का विकास न कर पाने, वादों को पूरा न करने व कार्यस​मिति सदस्यों को लेकर संगठन का कमजोर नजरिया ही इस बार 2027 के चुनावों में भाजपा को भारी पड़ता दिख रहा है।

वहीं दूसरी और यहां भी भाजपा के ख्वाबों पर फिरने जा रहा है पानी…

​साल 2022 में जिन सीटों पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था, उन्हें लेकर भाजपा पहले तो अत्यंत सजग स्थिति में आई पर अब जब अपनी ही सीटों पर अब खतरा मंडराने लगा, तो भाजपा अब केवल विपक्ष की उन सीटों की ओर ही देख रही है, जहां विपक्ष ने कम मार्जन से जीत दर्ज कराई थी। ऐसी ही एक सीट कांग्रेस के अल्मोड़ा विधायक मनोज तिवारी है। भाजपा 2022 के चुनावों के बाद से ही इनकी सीट पर नजर गढ़ाए बैठी हैं। लेकिन वर्तमान में जनता की बीजेपी से नाराजगी के चलते यहां एक बार फिर मनोज तिवारी मजबूत होते दिख रहे हैं। 2022 के बाद से अब तक सरकार के कई कार्य हैं, जो भाजपा ​को बैकफुट पर लाए हैं। वहीं एक बार फिर अल्मोड़ा में भी बीजेपी को पुन: कमजोर स्थिति में डालते दिख रहे हैं।

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