October 17, 2026

कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र की ग्राउंड रिपोर्ट: भीतर ही भीतर आक्रोश, लेकिन डर के साये में समर्थन!

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Truth of Kaladhungi- Oct2026
  • क्या कालाढूंगी में कमजोर हो रहे हैं बंशीधर भगत?

उत्तराखंड की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ और बेबाक अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री बंशीधर भगत को लेकर कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में सियासी पारा गरमाया हुआ है। हालांकि, कागजों और सतह पर दिखने वाले चुनावी सर्वे यह दिखाते हैं कि नेताजी के समर्थन में कई लोग हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

सर्वे में चौंकाने वाला सच: समर्थन असली या डर का दिखावा?
हाल ही में कालाढूंगी क्षेत्र में जब मतदाताओं की नब्ज टटोलने के लिए एक अनौपचारिक और दोस्ताना बातचीत के जरिए सर्वे किया गया, तो जनता का एक ऐसा छिपा हुआ सच सामने आया जो चौंकाने वाला तो है ही, साथ ही राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय भी बनता दिख रहा है।
अमूमन चुनावी सर्वे में जब लोग खुलकर अपनी पसंद बताते हैं, तो कई स्थानीय लोगों ने बंशीधर भगत के पक्ष में बयान दिए। लेकिन, वहीं जब उनसे बिना किसी दबाव और पहचान छिपाकर गहराई से बात की गई, तो मतदाताओं के दिल का असली दर्द और डर बाहर आ गया।

“हम वोट नहीं देंगे, पर मुंह पर समर्थन करना मजबूरी है”
क्षेत्र के कई मतदाता जो पहले बंशीधर भगत के पक्ष में बयान दे रहे थे दबे शब्दों में स्वीकार करते दिखे कि वे भीतर से बंशीधर भगत और उनके परिवार के कामकाज से खफा हैं और किसी भी स्थिति में उन्हें वोट नहीं देंगे (यहां तक कि उन्होंने कहा कि हमारी नाराजगी केवल भगत जी से ही न होकर उनके पूरे परिवार से यदि कोई चुनाव में उतरता है तो उससे भी है।) । इससे ये सच भी उजागर हुआ कि जनता का एक बड़ा वर्ग उन्हें इस बार सत्ता से बाहर देखना चाहता है।
लेकिन, इसके बावजूद वे सार्वजनिक रूप से या किसी अनजान सर्वेकर्ता के सामने उनका विरोध करने से बचते हैं। इसके पीछे का मुख्य कारण भय और राजनीतिक नुकसान की आशंका है।

सर्वे के दौरान जब लोगों से बातचीत की गई तो सबसे पहले उन्हीं की ओर से सवाल दागा गया कि आप किसी मीडिया से तो नहीं हो? हमारा नाम कहीं नहीं आना चाहिए। जब उनको यकीन दिलाया गया कि आपका नाम कहीं नहीं आएगा, हम तो केवल अपने क्षेत्र को समझ रहे हैं। तब उन्होंने सवालों के जवाब देने शुरु किए।

शुरुआत हुई विधानसभा की स्थिति तो ठीक दिख रही है? लोग बोले आप पूरा क्षेत्र घूमो विचार बदल जाएगा। यहां न विकास है न तरक्की अचानक एक बुजुर्ग बोले जो समस्याएं आज से कई साल पुरानी है उनका तक आज भी कोई समाधान नहीं हुआ।

हमने पूछा जैसे? वे बोले सड़क, पानी, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, रोजगार, नशा कौन कौन सी समस्याएं गिनाएं। अब तो जंगली जानवरों का आतंक भी बढ़ गया है।

हमने पूछाा तो इस बार कौन आएगा? जवाब मिला कोई नया जो क्षेत्र में काम करेगा। समस्याओं को हल करेगा। विकास करेगा, हमारी समस्याओं को समझेगा और उन्हें हल करने में मदद करेगा।

स्थानीय लोगों का साफ कहना है:
> “हम जानबूझकर नेताजी (बंशीधर भगत) का विरोध नहीं करते। अगर कोई पूछता है, तो हम मजबूरी में खुलकर उनका समर्थन कर देते हैं। कारण ये है कि हम बाद में अपना कोई नुकसान नहीं चाहते। सच तो यह है कि हम उन्हें वोट नहीं देना चाहते और न ही उन्हें जिताना चाहते हैं। लेकिन डर इस बात का है कि यदि कल को उन्हें टिकट मिल गया और वे दोबारा जीत गए, तो हमारा जीना मुश्किल हो जाएगा और व्यक्तिगत नुकसान उठाना पड़ सकता है।”

नाम उजागर नहीं करने वाले इन लोगोंं से डर का कारण व किस चीज का भय के संबंध में सवाल करने पर वे कहते है पिछली बार भी एक आडियो जारी हुआ था उससे सुन कर आप समझ सकते हैं, वे किस तरह लोगोां को पाला बदलने के​ लिए मजबूर करते हैं। वहीं यदि भगत जी को हमारे बारे में पता चल गया और कल में चुनाव जीत गए तो हमारे किसी भी कार्य को अनुमति नहीं देंगे।

इसके अलावा जिला भाजपा में भी उन्होंने अपने ही लोग भर रखें हैं, ऐसे में यदि वे हारते हैं या भाजपा किसी और को टिकट भी देती है और वो जीतता भी है तो भी हमारे कार्यों के लिए वे समस्या पैदा कर सकते हैं या करा सकते हैं।

ऐसे मे जब इनसे पूछा गया कि इस बार आप किसे चाहते हैं, तो उनका साफ कहना था कि इस बार भाजपा को टिकट किसी नए व्यक्ति को देना चाहिए जो हर ओर विकास करे। किसी से भेदभाव न रखता हो और न ही किसी से उसकी तकरार हो साथ ही युवा और समझदार होना चाहिए। तभी हमारा वोट भाजपा को जाएगा।

> अंदरूनी आक्रोश बनाम बाहरी समर्थन
यही कारण है कि कई आधिकारिक और अनौपचारिक सर्वे रिपोर्ट्स में बंशीधर भगत का पलड़ा भारी नजर आता है या लोग उनके विरोध में सीधे तौर पर खड़े होने से डरते हैं। जनता के भीतर उनके और उनके परिवार के खिलाफ गहरा आक्रोश और बदलाव की इच्छा सुलग रही है, लेकिन प्रतिशोध के डर ने मतदाताओं की जुबान पर ताला लगा रखा है।

यहां एक बात खास देखने को मिली कि कुछ समय पहले के सर्वे में भी ये बात देखने को मिली थी कि वे लोग जो जनसंघ के समय से संगठन से जुड़े थे उनका भी भगत को लेकर मोह भंग हो रहा है।

सवाल?
कालाढूंगी का यह ताज़ा सियासी घटनाक्रम यह सवाल खड़े करता है कि क्या यह ‘डर का समर्थन’ असल चुनावों में वोटों में बदल पाएगा? सतह पर मजबूत दिखने वाले बंशीधर भगत और उनके परिवार के लिए यह अंदरूनी नाराजगी खतरे की घंटी साबित हो सकती है, बशर्ते मतदाता मतदान के दिन अपने इसी छुपे हुए गुस्से को ईवीएम के जरिए बाहर निकालने का साहस जुटा सकें।

​”Support Out of Fear”: Why Voters in Kaladhungi are Hiding Their Real Choice Ahead of Elections

 

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