March 8, 2026

Bihar Election Results 2025: बिहार में कौन कितना जीता, किसकी बनी सरकार

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: 20 साल बाद भी बिहार की सत्ता का पर्याय नीतीश, ये है अब तक के चुनावों में प्रदर्शन

बिहार में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने लगे हैं। एक बार फिर राज्य में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनती नजर आ रही है। इस तरह बिहार में अब बीते 20 वर्षों की तर्ज पर ही नीतीश के फिर से सत्ता के शीर्ष पर काबिज होना तय हो गया है। 2005 के अंत में शुरू हुआ नीतीश कुमार का शासन अब अगले पांच साल चल सकता है।

आखिर नीतीश कुमार कौन हैं, उनका सियासी सफर कैसा रहा है? बिहार में 2005 में पहली बार नीतीश के मुख्यमंत्री बनने के बाद से अब तक क्या-क्या हुआ है? किस तरह राज्य में अलग-अलग पार्टियों की सीटें और वोट प्रतिशत लगातार ऊपर-नीचे हुए हैं, लेकिन नीतीश कुमार किंग या किंगमेकर ही रहे हैं? इसके अलावा कैसे कम सीटें और वोट पाने के बावजूद नीतीश कुमार ने कैसे अपनी सत्ता बनाए रखी? आइये जानते हैं…

कौन हैं नीतीश कुमार, कैसे हुई राजनीतिक सफर की शुरुआत?
नीतीश कुमार का जन्म 1951 में नालंदा के कल्याण बीघा गांव में हुआ था। नीतीश के पिता देश के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल रहे थे, ऐसे में वे खुद सियासत में काफी रुचि रखते थे। वे राम मनोहर लोहिया की समाजवादी नीतियों से काफी प्रभावित थे।

बताया जाता है कि उनके और लालू प्रसाद यादव के सियासी सफर की शुरुआत लगभग एक ही समय हुई थी। यह समय था कर्पूरी ठाकुर के समाजवादी नेतृत्व का। कर्पूरी ठाकुर जनता पार्टी की सरकार के दौरान 1970 के दशक में बिहार में ओबीसी आरक्षण के अगुआ रहे थे।

कैसी रही सियासत में शुरुआत?
नीतीश पहली बार सियासत में 1977 में उतरे, जब पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ माहौल बन चुका था। इस दौर में जनता पार्टी मजबूती से उभरी और लगभग पूरे देश में वर्चस्व बनाया। हालांकि, नीतीश कुमार चुनावी राजनीति में बेहतर शुरुआत नहीं कर पाए। वे जनता पार्टी की तरफ से हरनौत विधानसभा सीट से उतरे और एक निर्दलीय उम्मीदवार से हार गए। यह वह दौर था, जब नीतीश कुमार ने निराशा में राजनीति तक छोड़ने का मन बना लिया था। हालांकि, उनके करीबियों ने किसी तरह उन्हें मना लिया। 1985 में वे एक बार फिर हरनौत सीट से ही लोक दल के टिकट पर चुनाव लड़े और आखिरकार जीते।

बाद में नीतीश ने 1989 में लोकसभा चुनाव में बाढ़ से जीत हासिल करने के बाद वे बिहार की राजनीति से कुछ दूर भी हुए। वे वीपी सिंह की सरकार में कृषि राज्य मंत्री बने। 1991 में उन्होंने जनता दल के टिकट पर बाढ़ से फिर जीत हासिल की। हालांकि, तीन साल बाद ही उन्होंने जनता दल से अलग होकर 1994 में जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी बना ली। उनका यही धड़ा बाद में जनता दल यूनाइटेड यानी जदयू बना।

1990 का दौर, जब लालू की सीएम कुर्सी को उनके ‘छोटे भाई’ से ही हुआ खतरा
1990 के दौर में बिहार में लालू प्रसाद यादव का वर्चस्व स्थापित हो चुका था। वे लगातार दो बार मुख्यमंत्री बने। हालांकि, भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद उन्होंने खुद पद छोड़ दिया और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया। यह वह दौर था, जब लालू को पिछड़ी जातियों का जबरदस्त समर्थन मिला था, हालांकि चारा घोटाले में नाम आने के बाद उनका यह मतदाता आधार उनसे दूरी बनाने लगा था।

यही वह दौर था, जब इंजीनियर से नेता बने नीतीश कुमार उभार पर आए। कभी लालू प्रसाद यादव के ‘छोटे भाई’ के तौर पर उनके विश्वासपात्र माने जाने वाले नीतीश ने धीरे-धीरे पिछड़ी जातियों, खासकर कुर्मी-कुशवाहा समाज को अपनी तरफ खींचना शुरू कर दिया। इसके अलावा उन्होंने अति-पिछड़ा समाज (ईबीसी) के बीच भी पैठ बनाई। इस जातीय समीकरण को बिठाकर उन्होंने लालू यादव के समर्थन में खड़े यादव समुदाय की एकजुटता की काट खोजी।

बिहार में 1951 से 2020 तक विधानसभा चुनाव में कब किसका रहा दबदबा, जानें पूरा इतिहास…

देश को आजादी मिलने के चार साल बाद यानी 1951 से लेकर अब तक बिहार में 17 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. फरवरी 2005 में हुए चुनाव में सरकार नहीं बन पाने के कारण अक्टूबर में फिर से चुनाव आयोजित कराने पड़े थे।

बिहार के किस गठबंधन में कौन? : एनडीए और महागठबंधन (इंडिया गठबंधन-) में बिहार की अधिकतर पार्टियों का गठजोड़ है. एनडीए में जहां बीजेपी, जेडीयू एलजे रामविलास, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा को मिलाकर पांच दल शामिल हैं. महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, विकासशील इंसान पार्टी के अतिरिक्त तीन वामपंथी दल- सीपीआईएमएल, सीपीएम और सीपीआई शामिल है. एलजेपी पारस का गुट भी इस बार महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ने की इच्छा जता चुका है.

इसके अलावा प्रशांत किशोर की जान सुराज पार्टी, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और शिवदीप लांडे की जय हिंद सेना भी चुनाव जंग है.

बिहार विधानसभा चुनाव का इतिहास : 1951, 1957 और 1962 के चुनाव
आजादी के बाद पहली बार हुए 1951 के चुनाव में कई पार्टियों ने भाग लिया, लेकिन कांग्रेस ही उस समय सबसे बड़ी पार्टी थी. कांग्रेस को 322 में से 239 सीटें मिली थीं. 1957 के चुनाव में भी कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी बनी. उसे 312 में से 210 सीटें मिली थी. 1962 के चुनाव में कांग्रेस को 185 सीटों के साथ बहुमत मिली थी. उसके बाद स्वतंत्र पार्टी को सबसे ज्यादा 50 सीटें मिली थी.

बिहार विधानसभा चुनाव 1967 : बिहार विधानसभा चुनाव 1967 में कांग्रेस को 128, एसएसपी को 68 और जन क्रांति दल को 13 सीटें मिली थीं. भारतीय जनसंघ 26 सीटें जीतने में कामयाब हुईं थी. तीनों बड़े दलों के थोड़े-थोड़े समय के लिए 3 सीएम बने.

बिहार विधानसभा चुनाव 1969 : साल 1969 के चुनाव में बिहार में इंडियन नेशनल कांग्रेस 118 सीटें मिलीं और भारतीय जनसंघ को 34 सीटें हासिल हुईं. एसएसपी को 52 और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया को 25 सीटें मिली थी. राष्ट्रपति शासन के बाद दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर और भोला पासवान शास्त्री कुछ-कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री बने.

बिहार विधानसभा चुनाव 1972
बिहार विधानसभा चुनाव 1972 में कांग्रेस को 167, कांग्रेस ओ को 30, भारतीय जनसंघ को 25 और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) को 33 सीटें मिली थीं. इस कार्यकाल में भी लगभग दो महीने राष्ट्रपति शासन लगा रहा और उसके बाद एक या दो साल के लिए केदार पांडे, अब्दुल गफूर और जगन्नाथ मिश्रा बिहार के मुख्यमंत्री रहे.

बिहार विधानसभा चुनाव 1977
देश भर में इमरजेंसी के बाद संपन्न चुनाव में पहली बार बिहार की जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने का काम किया. जनता पार्टी ने बिहार की 214 सीटों पर जीत हासिल की. कांग्रेस को केवल 57 सीटों पर संतोष करना पड़ा था. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने 21 सीटें हासिल की थीं. चुनाव परिणाम आने के बाद पहली बार बिहार में जनता पार्टी की सरकार बनी. पहले लगभग दो महीने राष्ट्रपति शासन लागू रहा. उसके बाद लगभग एक साल के लिए 1979 तक कर्पूरी ठाकुर और फिर 1980 तक रामसुंदर दास बिहार के मुख्यमंत्री बने.

बिहार विधानसभा चुनाव 1980
बिहार विधानसभा चुनाव 1980 में कांग्रेस इंदिरा को 169, कांग्रेस-यू को 14, बीजेपी को 21 और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने 23 सीटों पर जीत हासिल की थी. जनता पार्टी एससी को 42 सीटें मिली थीं. कांग्रेस इंदिरा को बहुमत मिलने के बाद भी लगभग चार महीने तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा. उसके बाद करीब तीन साल के लिए जगन्नाथ मिश्र और एक साल के लिए चंद्रशेखर सिंह बिहार के मुख्यमंत्री बने.

बिहार विधानसभा चुनाव 1985
बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 196 सीटें मिली थीं जो बहुमत से कहीं ज्यादा थी. इसके बावजूद बिहार में एक ही कार्यकाल में 4 मुख्यमंत्री बने थे. इसके अलावा, कांग्रेस यू को 14, लोक दल को 46 और बीजेपी 16 सीटें मिली थीं. जनता पार्टी को 13 सीटें मिली थीं.

बिहार विधानसभा चुनाव 1990
साल 1990 में हुए चुनाव में 1988 में कई दलों के विलय से बने जनता दल ने पहली बार बिहार में चुनाव लड़ा था. 122 सीटें जीतकर और जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. कांग्रेस 71 और बीजेपी को 39 सीटों हासिल हुई थी. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने 23 और जेएमएम 19 सीटें जीत पाई थी. तब लालू यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी थी.

बिहार विधानसभा चुनाव 1995
बिहार विधानसभा चुनाव 1995 में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल ने 167 सीटें जीतने में सफल हुई थी. बीजेपी 41 सीट, कांग्रेस 29 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी. जेएमएम ने चुनावों में 10 सीटें जीती थीं और समता पार्टी को सात सीटें मिली थीं. चुनाव बाद लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने थे.

बिहार विधानसभा चुनाव 2000
बिहार में साल 2000 का चुनाव संयुक्त बिहार का अंतिम चुनाव था. उस समय बिहार में 324 सीटें हुआ करती थीं. सरकार बनाने के लिए 162 सीटों की जरूरत होती थी. आरजेडी 124, बीजेपी 67, समता पार्टी 34 और कांग्रेस 23 सीट पर चुनाव जीतने में कामयाब हुई थी. चुनाव परिणाम आने के बाद 2000 के चुनाव में राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी थीं.

बिहार विधानसभा चुनाव 2005
साल 2005 में एक ही साल के अंदर दो बार विधानसभा चुनाव कराने पड़े थे. फरवरी 2005 में हुए इन चुनावों में राबड़ी देवी के नेतृत्व में आरजेडी ने ने 215 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें से उसे 75 सीटें मिल पाईं. जेडीयू 55 सीटें जीतीं और बीजेपी 37 सीटों के साथ विधानसभा में पहुंची थी. साल 2005 में कांग्रेस 10 सीटें ही जीत पाई थी. किसी भी दल को 122 सीटों का स्पष्ट बहुमत ना मिल पाने के कारण कोई भी सरकार नहीं बन पाई. कुछ महीनों तक राष्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर-नवंबर 2005 में फिर से विधानसभा चुनाव संपन्न हुए थे. दोबारा हुए चुनाव में जेडीयू 88, बीजेपी 55, आरजेडी 54, लोजपा 10 और कांग्रेस 9 सीटें ही जीत पाई. नीतीश कुमार ने पहली बार बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई.

साल 2000 आते-आते नीतीश कुमार नेता के तौर पर मजबूत होते चले गए। 2000 का चुनाव मार्च में हुआ था। गौर करने वाली बात यह है कि तब तक बिहार से झारखंड अलग नहीं हुआ था। इस चुनाव में भी राजद मजबूती से उभरी। उसने 324 में से 293 सीटों पर चुनाव लड़ा और 124 सीटें जीतीं। पार्टी बहुमत से दूर रह गई। दूसरी तरफ भाजपा को इस चुनाव में बढ़त मिली और उसे 168 में से 67 सीटें मिलीं। नीतीश कुमार की समता पार्टी 34 सीट और कांग्रेस 23 सीटें जीतने में सफल रही।

2000 में खंडित जनादेश के चलते सरकार बनाने की जंग छिड़ गई। नीतीश कुमार ने अपनी समता पार्टी के लिए भाजपा और अन्य दलों के गठबंधन के जरिए पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। हालांकि, उनके पास कुल-मिलाकर भी महज 151 विधायकों का ही समर्थन था, जो कि बहुमत के आंकड़े 163 से कम ही था। इसके चलते नीतीश को 7 दिन में ही अपना पद छोड़ना पड़ा। बिहार की कमान एक बार फिर राजद के हाथों में आ गई और लालू के जोड़-तोड़ की बदौलत राबड़ी देवी फिर मुख्यमंत्री बनीं।

2005 में क्यों हुए दो बार चुनाव, 7 महीने में कैसे बदले सारे समीकरण
बिहार में 1990, 1995, 2000 के चुनाव में लालू प्रसाद यादव सत्ता में आए। उस दौर में तो यहां तक कहा जाता था कि समोसे में जब तक आलू रहेगा, तब तक बिहार की सत्ता में लालू रहेंगे। हालांकि, 2005 के चुनाव में स्थितियां पूरी तरह बदल गईं। ये स्थितियां ऐसी बदलीं की सात महीने के भीतर राज्य में दो बार चुनाव हुए।

फरवरी 2005 में बिहार से झारखंड के अलग होने के बाद पहली बार चुनाव हुए। 243 सीटों वाली विधानसभा के लिए राजद ने 215 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन उसे 75 सीटें मिलीं। जदयू और भाजपा गठबंधन में 138 सीटों पर चुनाव लड़ा जदयू 55 सीटें हासिल कर सका। 103 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा को 37 सीटें मिलीं। इस तरह 92 सीटें जीतने वाला एनडीए भी बहुमत से दूर रह गया।

जब किंगमेकर बनी लोजपा, पर बिहार को किंग नहीं मिला
इस चुनाव में जिस पार्टी ने अपने प्रदर्शन से सबसे ज्यादा चौंकाया, वह रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी (लोजपा) थी। लोजपा को इस चुनाव में 29 सीटें मिलीं। वहीं, 84 सीटों पर उम्मीदवार उतारने वाली कांग्रेस 10 सीट ही जीत सकी। नतीजों में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। जोड़तोड़ शुरू हुई। लोजपा किंगमेकर की भूमिका में थी। कहा जाता है कि नतीजों के बाद रामविलास पासवान इस बात पर अड़ गए कि वो किसी भी गठबंधन को समर्थन तभी देंगे जब किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। गतिरोध कायम रहा। लोजपा की शर्तों के आगे कोई समाधान नहीं निकल सका। अंतत: राज्य में नए सिरे से चुनाव हुए।

सात महीने में बदल गया बिहार
चुनाव बाद किसी सरकार का गठन नहीं होने के चलते राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया। अक्तूबर-नवंबर में फिर चुनाव हुए। महज सात महीने बाद हुए इस चुनाव में एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिल गया। जदयू को 88 और भाजपा को 55 सीटें मिलीं। इस तरह एनडीए 143 सीट जीतकर सत्ता में आया और नीतीश कुमार राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। लालू यादव की राजद को महज 54 सीट से संतोष करना पड़ा। वहीं, फरवरी में किंगमेकर बनी लोजपा 29 से घटकर 10 सीट पर आ गई। कांग्रेस को इस बार केवल नौ सीट पर जीत मिली।

2005-10: जब नीतीश ने मजबूत की बिहार पर अपनी पकड़ : 2010 तक पसमांदा मुस्लिमों को सरकारी नौकरी में आरक्षण, महिलाओं को पंचायत-निकायों में आरक्षण, पिछड़ों में अति पिछड़ों के लिए कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूले के आधार पर आरक्षित पदों के भीतर आरक्षण की व्यवस्था करके नीतीश कुमार ने महिलाओं, मुस्लिमों और अति पिछड़ों में अपना नया जनाधार तैयार किया। इसका असर अगले चुनाव में भी देखने को मिला, जब नीतीश एकतरफा जीत दर्ज की।

2010 का विधानसभा चुनाव : 2010 के चुनाव में नीतीश को अपनी योजनाओं जबरदस्त फायदा हुआ। जदयू और भाजपा गठबंधन 243 में से 206 सीटें जीतने में सफल रहा। एनडीए का वोट प्रतिशत भी करीब 40 फीसदी तक पहुंच गया। 141 सीटों पर चुनाव लड़ा जदयू 115 सीटों पर जीतने में सफल रहा। वहीं, 102 सीटों पर चुनाव लड़ी भाजपा को 91 सीटों पर जीत मिली। दूसरी तरफ लालू का राजद महज 22 सीट पर सिमट गया। कांग्रेस को महज चार सीटें तो लोजपा को तीन सीटें मिलीं।

2010-15: सुशासन बाबू का तमगा पाया, भाजपा से गठबंधन तोड़ा
अपने दूसरे पूर्ण कार्यकाल में नीतीश कुमार ने बिहार के मूलभूत ढांचे के विकास पर ध्यान देना शुरू किया। टूटी-फूटी सड़कों की मरम्मत से लेकर उनके चौड़ीकरण का काम और इसके बाद बिहार की बिजली व्यवस्था को सुधारा। इसी कार्यकाल में उनकी ‘सुशासन बाबू’ वाली छवि बनी। यही कार्यकाल था जब नीतीश के गठबंधन बदलने की शुरुआत हुई।

जून 2013 में उन्होंने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया। 2014 का लोकसभा चुनाव उन्होंने अकेले लड़ा। इस चुनाव में जदयू को महज दो सीट से संतोष करना पड़ा। लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद नीतीश ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी और जीतन राम माझी राज्य के मुख्यमंत्री बने। हालांकि, 2015 के विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले नीतीश वापस मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए।

2015 का विधानसभा चुनाव: 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश और लालू दशकों बाद साथ आए। जदयू-राजद-कांग्रेस ने मिलकर महागठबंधन बनाया। इस गठबंधन ने 243 में से 178 सीटें हासिल कीं। राजद-जदयू ने बराबर 101-101 सीटें बांटीं, वहीं कांग्रेस को 41 सीटें मिलीं। जहां राजद 80 सीट जीतकर सबसे बड़ा दल बना। जदयू को 71 सीटें मिलीं, वहीं कांग्रेस 27 सीट जीतने में सफल रही। नीतीश फिर से मुख्यमंत्री बने। वहीं, लालू यादव के दोनों बेटे उनकी कैबिनेट का हिस्सा बने। लालू के छोटे बेटे तेजस्वी को डिप्टी सीएम बनाया गया।

एनडीए को 58 सीटों से संतोष करना पड़ा। भाजपा को 53, लोजपा और रालोसपा को दो-दो और जीतनराम मांझी की हिंदुस्तानी आवामी मोर्चा (हम) को एक सीट ही मिली। लेफ्ट फ्रंट को सिर्फ तीन सीटें ही मिलीं। दूसरी ओर सपा, राकांपा, जाप जैसी पार्टियों का सोशलिस्ट सेक्युलर मोर्चा एक भी सीट नहीं जीत सका। तीन निर्दलीय भी जीतने में सफल हुए।

2015-20: फिर पलटे नीतीश, पर मुख्यमंत्री बने रहे
इस चुनाव में राजद को जदयू से ज्यादा सीटें मिलीं। इसके बावजूद नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने। हालांकि, इस गठबंधन को सत्ता में आए अभी दो साल भी नहीं हुए थे कि नीतीश कुमार ने पलटी मार दी।

जून-जुलाई 2017 में लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले खुलने शुरू हो गए। नीतीश और लालू परिवार में तल्खी बढ़ने लगी। इन सबके बीच नीतीश महागठबंधन से नाता तोड़कर भाजपा के समर्थन से फिर मुख्यमंत्री बन गए। 2019 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर एनडीए ने जबरदस्त प्रदर्शन किया और राजद-कांग्रेस को पटखनी दी।

2020 का विधानसभा चुनाव
2020 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर एनडीए और महागठबंधन आमने सामने थे। नतीजों में एनडीए को 243 में से 125 सीटें मिलीं, जबकि महागठबंधन 110 सीट पर सिमट गया। 115 सीटों पर चुनाव लड़े जदयू को 43 सीटें मिलीं। पार्टी के वोट प्रतिशत में 1.44% की भी गिरावट आई। वहीं, 110 सीटों पर चुनाव लड़ी भाजपा 74 सीटें जीतने में सफल रही। उसके वोट शेयर में 5 फीसदी की कमी आई, लेकिन सीटें 21 ज्यादा मिलीं। एनडीए में शामिल विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) को चार, जीतनराम मांझी की हम को 4 पर जीत हासिल की। कम सीटें पाने के बाद भी नीतीश कुमार एक बार फिर मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे।

महागठबंधन के दलों की बात करें तो राजद को 75, कांग्रेस को 19, भाकपा-माले को 12, भाकपा को 2 और माकपा को 2 सीटें मिलीं। इस चुनाव में कभी एनडीए का हिस्सा रही राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) ने अलग तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश की। इस गठबंधन में ओवैसी की एआईएमआईएम, मायावती की बसपा और उपेंद्र कुशवाहा की खुद की पार्टी थी। इस गठबंध में शामिल एआईएमआईएम को पांच, बसपा को एक सीट पर जीत मिली। वहीं, रालोसपा के सभी 99 उम्मीदवार बुरी तरह हार गए। अन्य पार्टियों में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को सिर्फ एक सीट मिली। एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली।

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