September 16, 2026

आईसीयू में बदल रहा मरीजों का पैटर्न: युवाओं में स्ट्रेस और स्क्रीन टाइम बढ़ा रहा परेशानी बुजुर्गों में कई बीमारियां बनी बड़ी वजह

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भोपाल । भोपाल में आईसीयू में भर्ती होने वाले मरीजों के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले गंभीर मरीजों में बुजुर्गों की संख्या अधिक दिखाई देती थी लेकिन अब कम उम्र के लोगों में भी ऐसी स्वास्थ्य समस्याएं सामने आ रही हैं जो धीरे धीरे गंभीर रूप ले सकती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक युवाओं में बढ़ता तनाव नींद की कमी लंबे समय तक स्क्रीन के सामने रहना और बिगड़ी लाइफस्टाइल चिंता का कारण बन रहे हैं। हालांकि इनमें से ज्यादातर मरीज शुरुआत में आईसीयू तक नहीं पहुंचते और ओपीडी में ही इलाज कराते हैं लेकिन कुछ मामलों में स्थिति गंभीर होने पर अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़ सकती है।
भोपाल में आयोजित एमपी क्रिटिकॉन 1.0 में इंदौर के क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डॉ. संजय धानुका और डॉ. आनंद सांघी ने आईसीयू में बदलते मरीजों के पैटर्न पर चर्चा की। विशेषज्ञों ने बताया कि बीमारियों का मूल स्वरूप पूरी तरह नहीं बदला है लेकिन मरीजों की उम्र उनकी जीवनशैली और गंभीर अवस्था तक पहुंचने के कारणों में बदलाव जरूर दिखाई दे रहा है।

20 से 40 साल की उम्र के लोगों में स्ट्रेस डिसऑर्डर इंसोम्निया सिरदर्द और लाइफस्टाइल से जुड़ी परेशानियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं। लंबे समय तक मोबाइल और कंप्यूटर चलाने तथा देर रात तक जागने की आदत का असर नींद के साथ गर्दन कंधे और मांसपेशियों पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि लगातार स्क्रीन देखने के बजाय बीच बीच में ब्रेक लेना चाहिए। इसके साथ सर्वाइकल और शोल्डर एक्सरसाइज को दिनचर्या में शामिल करना भी मददगार हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार प्रोफेशनल स्ट्रेस अब केवल ऑफिस की चारदीवारी तक सीमित नहीं रह गया है। काम का दबाव कम समय में ज्यादा काम करने की अपेक्षा और घर की जिम्मेदारियां मिलकर तनाव को बढ़ा सकती हैं। लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव कुछ लोगों में गंभीर मानसिक परेशानियों का कारण बन सकता है। आईसीयू में पॉइजनिंग के मरीज भी पहुंचते हैं जिनमें कीटनाशक और सल्फास जैसी चीजों से हुई पॉइजनिंग के मामले शामिल हैं। ऐसे मामलों में मरीज के शारीरिक इलाज के साथ मानसिक स्थिति का आकलन भी जरूरी माना जाता है और जरूरत पड़ने पर साइकेट्रिस्ट को उपचार में शामिल किया जाता है।

तनाव का असर बच्चों और छात्रों में भी देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक मोबाइल नहीं देने पढ़ाई को लेकर डांटने या अपेक्षाओं के दबाव जैसी स्थितियां कुछ बच्चों में काफी तनाव पैदा कर सकती हैं। ऐसे मामलों में परिवार की भूमिका अहम हो जाती है। केवल दिखाई देने वाले लक्षणों का इलाज करने के बजाय तनाव के पीछे की वजह समझना जरूरी है।

वहीं दूसरी तरफ आईसीयू में बुजुर्ग मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है। बढ़ती उम्र के साथ डायबिटीज ब्लड प्रेशर किडनी संबंधी बीमारी और दूसरी पुरानी समस्याएं लंबे समय तक बनी रहती हैं। कई बार संक्रमण डायलिसिस हार्ट अटैक एंजाइना या ऑपरेशन के बाद होने वाली जटिलताओं के कारण ऐसे मरीजों को आईसीयू की जरूरत पड़ती है। बढ़ती उम्र और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का असर भी क्रिटिकल केयर सेवाओं पर दिखाई दे रहा है। ऐसे में बदलती जीवनशैली और बढ़ती उम्र दोनों ही आईसीयू पर अलग अलग तरह का दबाव बढ़ा रहे हैं।

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