July 11, 2026

गर्भावस्था में कॉस्मेटिक्स बन सकते हैं खतरे की वजह AIIMS की रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य

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नई दिल्ली । गर्भावस्था का समय किसी भी महिला के जीवन का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इस दौरान खानपान से लेकर जीवनशैली तक हर छोटी बड़ी बात का सीधा असर मां और गर्भ में पल रहे शिशु के स्वास्थ्य पर पड़ता है। अब ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस नई दिल्ली की अगुवाई में हुई एक नई रिसर्च ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। अध्ययन में संकेत मिले हैं कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले कुछ कॉस्मेटिक्स पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स और प्लास्टिक से जुड़े रसायन गर्भवती महिलाओं के शरीर में जमा होकर हार्मोन के सामान्य कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर केवल मां तक सीमित नहीं रहता बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के विकास पर भी पड़ सकता है।

इस शोध में 641 स्वस्थ गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया। गर्भावस्था के अलग अलग चरणों में उनके यूरिन सैंपल की जांच की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि शरीर में कौन कौन से रसायन मौजूद हैं। जांच के दौरान सबसे अधिक मात्रा मिथाइलपैराबेन नामक रसायन की पाई गई। यह एक प्रिजर्वेटिव है जिसका इस्तेमाल सामान्य रूप से स्किन केयर प्रोडक्ट्स लोशन फेस क्रीम शैंपू मेकअप और अन्य पर्सनल केयर उत्पादों में किया जाता है।

शोधकर्ताओं को मोनोएथाइल फ्थेलेट नामक रसायन भी अधिक मात्रा में मिला। यह रसायन प्लास्टिक उत्पादों और सिंथेटिक खुशबू वाले कई सामानों में इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये दोनों एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल्स की श्रेणी में आते हैं। ऐसे रसायन शरीर के हार्मोन संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं और गर्भावस्था के दौरान यह जोखिम और अधिक बढ़ जाता है।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि गर्भावस्था की दूसरी तिमाही के दौरान इन रसायनों का स्तर सबसे अधिक पाया गया। यही वह समय होता है जब गर्भ में पल रहे शिशु के अंगों और शरीर का तेजी से विकास हो रहा होता है। ऐसे संवेदनशील चरण में यदि हार्मोन के कार्य में किसी प्रकार की बाधा आती है तो इसका असर बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ सकता है।

एम्स के विशेषज्ञों के अनुसार जिन महिलाओं के शरीर में इन रसायनों का स्तर अधिक पाया गया उनके नवजात शिशुओं के जन्म के समय वजन लंबाई और विटामिन डी के स्तर में भी अंतर देखा गया। हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन केवल संभावित संबंधों की ओर संकेत करता है। इन निष्कर्षों की पूरी पुष्टि के लिए भविष्य में और बड़े स्तर पर विस्तृत शोध किए जाने की आवश्यकता होगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भवती महिलाओं को इस दौरान अनावश्यक कॉस्मेटिक्स के उपयोग से बचना चाहिए और जहां तक संभव हो कम रसायन वाले या सुरक्षित उत्पादों का चयन करना चाहिए। साथ ही प्लास्टिक के बर्तनों और पैकेजिंग में लंबे समय तक भोजन रखने से भी बचना बेहतर हो सकता है। प्राकृतिक और सुरक्षित विकल्प अपनाने से संभावित जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत में ऐसे रसायनों के उपयोग और उनकी निगरानी के लिए स्पष्ट और सख्त नियम बनाए जाने चाहिए ताकि उपभोक्ताओं विशेषकर गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित उत्पाद उपलब्ध हो सकें। जागरूकता बढ़ाने के साथ यदि महिलाएं चिकित्सकीय सलाह के अनुसार उत्पादों का चयन करें तो गर्भावस्था के दौरान मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

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