चीन के डॉक्टरों ने पहली बार इंसान के शरीर में एकसाथ ट्रांसप्लांट किए सुअर के लिवर और दोनों किडनी
इस अभूतपूर्व चिकित्सा परीक्षण को अंजाम देने के लिए डॉक्टरों ने एक ऐसे ५३ वर्षीय व्यक्ति को चुना जो पहले से ही पूरी तरह ब्रेन-डेड घोषित हो चुका था। मरीज के परिजनों ने चिकित्सा अनुसंधान के महत्व को समझते हुए इस ऐतिहासिक प्रयोग के लिए अपनी स्वैच्छिक सहमति प्रदान की थी। जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से विशेष रूप से तैयार किए गए सुअर के इन अंगों को जब मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित किया गया, तो उन्होंने लगभग पांच दिनों तक बिना किसी बड़ी रुकावट के बेहद प्रभावी तरीके से काम किया।
इस बेहद जटिल सर्जरी के बाद जो परिणाम सामने आए, उन्होंने दुनिया भर के विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया है। वर्षों से वैज्ञानिक इस बात पर शोध कर रहे थे कि क्या सुअर के अंग इंसानों की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं, और अब सुअर के डीएनए को एडिट करने की तकनीक ने इसे एक ठोस हकीकत में बदल दिया है।
डॉक्टरों और शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रत्यारोपण संपन्न होने के महज उन्नीस घंटों के भीतर ही सुअर के लिवर ने मानव शरीर के अनुकूल काम करते हुए पित्त का निर्माण और रिसाव शुरू कर दिया था, जो इसके सामान्य रूप से सक्रिय होने का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। इसके अलावा, गंभीर बीमारी के कारण मरीज के शरीर में क्रिएटिनिन और यूरिया का जो स्तर खतरनाक रूप से बढ़ा हुआ था, वह सुअर की दोनों किडनियां लगते ही तेजी से गिरकर बिल्कुल सामान्य स्तर पर लौट आया। इस सकारात्मक बदलाव ने स्पष्ट संकेत दिया कि प्रत्यारोपित की गई दोनों किडनियां मानव शरीर के भीतर अपने महत्वपूर्ण जैविक कार्यों को पूरी तरह से निभाने में सक्षम थीं।
इस चमत्कारिक सफलता के बाद भी वैज्ञानिक अभी पूरी तरह से सतर्क हैं और उनका कहना है कि इस तकनीक को जीवित मरीजों पर आजमाने से पहले अभी कई और कड़े परीक्षणों की आवश्यकता होगी। भविष्य में इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए अभी ब्रेन-डेड व्यक्तियों और जीवित बंदरों पर और अधिक गहन अध्ययन किए जाएंगे। वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि सुअर के अंगों के माध्यम से किसी भी प्रकार के अज्ञात या खतरनाक वायरस और बैक्टीरिया इंसानों के भीतर प्रवेश न कर पाएं। बहरहाल, दुनिया भर में लाखों लोग हर साल किडनी, लिवर और हार्ट जैसे अंगों की प्रतीक्षा में दम तोड़ देते हैं, ऐसे में इस नई तकनीक ने चिकित्सा जगत में चिकित्सा अनुसंधान के एक नए स्वर्णिम युग की शुरुआत कर दी है।
