नसीरुद्दीन शाह की अधूरी प्रेम कहानी पहली शादी से लेकर बेटी की अनदेखी तक आत्मकथा में किए भावुक खुलासे
नसीरुद्दीन शाह की पहली मुलाकात परवीन मुराद से उस समय हुई थी जब वह महज 19 साल के थे और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे। परवीन उनसे लगभग 15 वर्ष बड़ी थीं। वह तलाकशुदा थीं और पहले से दो बच्चों की मां भी थीं। उम्र और सामाजिक परिस्थितियों का अंतर होने के बावजूद दोनों एक दूसरे के करीब आए। नसीरुद्दीन शाह के अनुसार परवीन पहली ऐसी शख्स थीं जिन्होंने उनके भीतर छिपे अभिनेता पर भरोसा जताया और उनके सपनों को पहचान दी। यही विश्वास धीरे धीरे प्यार में बदल गया।
हालांकि दोनों के रिश्ते को परिवारों की मंजूरी नहीं मिली। नसीरुद्दीन शाह के परिवार को परवीन के तलाकशुदा होने और दो बच्चों की मां होने पर आपत्ति थी जबकि परवीन के परिवार को दोनों की उम्र के बड़े अंतर और नसीरुद्दीन की कम उम्र को लेकर चिंता थी। विरोध के बावजूद दोनों ने शादी कर ली और अपने नए जीवन की शुरुआत की।
शादी के करीब एक वर्ष बाद बेटी हीबा का जन्म हुआ लेकिन इस खुशी के साथ ही दोनों के रिश्ते में दूरियां बढ़ने लगीं। नसीरुद्दीन शाह ने अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया कि उस समय वह पत्नी की भावनाओं को समझने में पूरी तरह असफल रहे। उन्होंने लिखा कि वह अपने अभिनय करियर और भविष्य को लेकर इतने व्यस्त थे कि परिवार और पत्नी की जरूरतों पर ध्यान ही नहीं दे सके। उन्होंने यह भी माना कि गर्भावस्था के दौरान वह पत्नी का साथ नहीं दे पाए और पिता बनने की जिम्मेदारी निभाने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी नहीं थे।
अभिनेता ने अपनी बेटी हीबा को लेकर भी बेहद भावुक स्वीकारोक्ति की है। उन्होंने लिखा कि कई वर्षों तक वह अपनी बेटी से भावनात्मक रूप से जुड़ ही नहीं पाए। उन्हें इस बात का आज भी गहरा पछतावा है कि उन्होंने पिता होने की जिम्मेदारी को गंभीरता से नहीं लिया। नसीरुद्दीन शाह के अनुसार यह उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी गलतियों में से एक रही जिसका अफसोस उन्हें हमेशा रहेगा।
पहली शादी टूटने के दौर में ही थिएटर के दौरान उनकी मुलाकात अभिनेत्री रत्ना पाठक से हुई। दोनों के बीच दोस्ती धीरे धीरे गहरे रिश्ते में बदल गई। परवीन मुराद से कानूनी रूप से अलग होने के बाद वर्ष 1982 में नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक ने विवाह किया। अभिनेता ने अपनी आत्मकथा में रत्ना पाठक को अपने जीवन का सबसे सच्चा प्रेम बताया है और स्वीकार किया कि उनके साथ उन्होंने रिश्तों की अहमियत को सही मायनों में समझा।
नसीरुद्दीन शाह की यह कहानी केवल एक अभिनेता की निजी जिंदगी का किस्सा नहीं बल्कि इस बात की सीख भी देती है कि सफलता के पीछे भागते समय रिश्तों और परिवार की जिम्मेदारियों को नजरअंदाज करना जीवनभर का पछतावा बन सकता है। उनकी आत्मस्वीकृति यह साबित करती है कि गलतियों को स्वीकार करना भी साहस का सबसे बड़ा रूप होता है।
