हरदीप सिंह पुरी के बयान से पंजाब की सियासत गरम, भाजपा ने पुराने 22 सीटों वाले समझौते से अलग रुख साफ किया
नई दिल्ली । पंजाब में भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है। इसी बीच केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा है कि यदि दोनों दल भविष्य में साथ आते हैं तो सीटों का बंटवारा बराबरी के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि भाजपा अब पुराने गठबंधन के उस फॉर्मूले पर आगे नहीं बढ़ना चाहती, जिसमें उसे विधानसभा की सीमित सीटों पर चुनाव लड़ना पड़ता था।
पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं। हरदीप सिंह पुरी के बयान के मुताबिक भाजपा आधी सीटों पर दावेदारी चाहती है। उन्होंने पुराने 22 से 23 सीटों वाले फॉर्मूले को स्वीकार करने से इनकार किया और कहा कि भाजपा अब जूनियर पार्टनर की भूमिका में नहीं रहना चाहती। हालांकि गठबंधन को लेकर अंतिम फैसला पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व करेगा।
भाजपा और अकाली दल लंबे समय तक पंजाब की राजनीति में गठबंधन के सहयोगी रहे हैं। पुराने समीकरण में अकाली दल अधिक सीटों पर चुनाव लड़ता था, जबकि भाजपा मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक मौजूदगी के आधार पर सीमित सीटों पर मैदान में उतरती थी। वर्ष 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर दोनों दलों का गठबंधन टूट गया था।
अब भाजपा पंजाब में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है। पार्टी की गतिविधियों और नेताओं के बयानों से संकेत मिलता है कि वह राज्य में अपने संगठनात्मक आधार को पहले की तुलना में अधिक व्यापक बनाना चाहती है। हाल के समय में भाजपा ने अलग-अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं और प्रभावशाली चेहरों को अपने साथ जोड़ा है।
पंजाब की राजनीति में भाजपा की पारंपरिक पकड़ मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों और हिंदू मतदाताओं के बीच रही है। पार्टी अब ग्रामीण क्षेत्रों और सिख समुदाय के बीच भी अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इसी रणनीति के तहत कई प्रमुख सिख चेहरों के भाजपा से जुड़ने को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दूसरी ओर, अकाली दल के साथ संभावित गठबंधन को लेकर बातचीत और अटकलों के बीच भाजपा अपने हिस्से को लेकर स्पष्ट रुख अपनाती दिखाई दे रही है। पार्टी का जोर पुराने सहयोगी के साथ संबंधों को पुनर्जीवित करने की स्थिति में बराबरी की भूमिका पर है।
वर्ष 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला था। उस चुनाव में अकाली दल को तीन सीटें और भाजपा को दो सीटें मिली थीं। इसके बाद दोनों दलों की राजनीतिक स्थिति को लेकर अलग-अलग चर्चाएं होती रही हैं। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले दोनों पार्टियों के बीच सीटों के बंटवारे का सवाल महत्वपूर्ण बन गया है।
हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में भाजपा ने पंजाब में अपने संगठन और जनाधार के विस्तार पर भी जोर बढ़ाया है। पार्टी की ओर से राज्य के सभी 117 विधानसभा क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक गतिविधियां बढ़ाने की बात सामने आई है। ऐसे में अकाली दल के साथ संभावित समझौते में सीटों की संख्या और भूमिका को लेकर बातचीत आसान नहीं होगी।
फिलहाल भाजपा और अकाली दल के बीच गठबंधन पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। हरदीप सिंह पुरी के बयान ने इतना स्पष्ट किया है कि यदि दोनों दल दोबारा साथ आते हैं तो भाजपा पुराने छोटे साझेदार वाले समीकरण के बजाय बराबरी की शर्त पर समझौता चाहती है। अब देखना होगा कि अकाली दल इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाता है और दोनों दल आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए किस तरह का राजनीतिक समीकरण तैयार करते हैं।
