हर बूंद की पुकार: भूजल दोहन और जलवायु परिवर्तन से गहराता जल संकट
– डॉ. सत्यवान सौरभ
जल केवल जीवन का आधार नहीं, बल्कि किसी भी राष्ट्र की सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय समृद्धि की नींव है। मानव सभ्यता का विकास हमेशा नदियों और जल स्रोतों के किनारे हुआ, लेकिन आज वही जल संसाधन अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं। भारत जैसे विशाल और कृषि प्रधान देश के लिए यह चुनौती और भी गंभीर होती जा रही है। बढ़ती आबादी, अनियंत्रित शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, भूजल का अंधाधुंध दोहन, जल प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने देश को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां केवल जल संकट की नहीं, बल्कि संभावित जल दिवालियापन की आशंका व्यक्त की जा रही है।
भारत विश्व की करीब 18 प्रतिशत आबादी का घर है, जबकि उसके पास दुनिया के केवल लगभग 4 प्रतिशत मीठे जल संसाधन हैं। स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता पांच हजार घन मीटर से अधिक थी, जो लगातार घटकर जल तनाव की सीमा के करीब पहुंच चुकी है। महानगरों में गर्मियों के दौरान पेयजल संकट आम बात हो गई है, वहीं ग्रामीण इलाकों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। कई नदियां प्रदूषण के कारण अपने प्राकृतिक स्वरूप और उपयोगिता को खोती जा रही हैं।
देश में जल संकट की सबसे बड़ी वजह भूजल पर अत्यधिक निर्भरता है। सिंचाई, पेयजल और उद्योगों की जरूरतें पूरी करने के लिए लाखों ट्यूबवेल लगातार भूजल का दोहन कर रहे हैं। कई राज्यों में मुफ्त या रियायती बिजली मिलने से भूजल का अंधाधुंध उपयोग बढ़ा है। जल निकासी की तुलना में पुनर्भरण बेहद कम होने से भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। किसानों को अब पहले की तुलना में कहीं अधिक गहराई तक बोरिंग करनी पड़ रही है, जिससे उनकी लागत बढ़ रही है। दूसरी ओर कई क्षेत्रों में भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक और नाइट्रेट की बढ़ती मात्रा लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन गई है।
भारत में वर्षा का अधिकांश हिस्सा केवल चार महीनों के मानसून में होता है, लेकिन उसका बड़ा भाग बिना उपयोग के नदियों के माध्यम से समुद्र में बह जाता है। यदि वर्षा जल का वैज्ञानिक तरीके से संचयन और भूजल पुनर्भरण किया जाए तो जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है। दुर्भाग्य से तालाब, बावड़ियां, जोहड़, कुएं और झील जैसी पारंपरिक जल संरचनाएं अतिक्रमण, प्रदूषण और उपेक्षा का शिकार हो चुकी हैं। कई शहरों में वर्षा जल संचयन को अनिवार्य तो किया गया है, लेकिन उसका प्रभावी पालन अब भी चुनौती बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाना होगा। कृषि में सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देना, फसलों के चयन में बदलाव, जल स्रोतों का संरक्षण, वर्षा जल संचयन को प्रभावी बनाना और जल के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि आज ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में जल केवल संसाधन नहीं, बल्कि सबसे बड़ी राष्ट्रीय चुनौती बन जाएगा। आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देने के लिए हर बूंद बचाना अब विकल्प नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
