टाटा ट्रस्ट में बढ़ी कानूनी खींचतान, मेहली मिस्त्री की शिकायतों पर सुनवाई से पहले उठी अधिकार क्षेत्र की बहस
नई दिल्ली। टाटा ट्रस्ट विवाद में एक बार फिर नया मोड़ आ गया है। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और बाई हीराबाई जमशेदजी टाटा नवसारी चैरिटेबल इंस्टीट्यूशन ने मेहली मिस्त्री की ओर से उठाई गई आपत्तियों पर सवाल खड़े किए हैं। दोनों धर्मार्थ संस्थानों ने चैरिटी कमिश्नर कार्यालय में दाखिल हलफनामों में दावा किया है कि मिस्त्री का ट्रस्टी के रूप में कार्यकाल 28 अक्टूबर 2025 को ही समाप्त हो गया था। ऐसे में अब उन्हें ट्रस्टों के प्रशासन और कामकाज को चुनौती देने का अधिकार नहीं है। ट्रस्टों ने आग्रह किया है कि उनकी शिकायतों पर कोई जांच शुरू करने या आरोपों के गुण-दोष पर विचार करने से पहले यह तय किया जाए कि मिस्त्री की याचिकाएं सुनवाई योग्य हैं या नहीं।
मेहली मिस्त्री दिवंगत उद्योगपति रतन टाटा के करीबी माने जाते रहे हैं। उन्होंने कथित तौर पर चैरिटी कमिश्नर के समक्ष शिकायत दर्ज कराते हुए दोनों ट्रस्टों के प्रशासनिक कामकाज और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। उनकी आपत्तियों में प्रशासनिक खामियों और हितों के टकराव की आशंकाओं का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि ट्रस्टों ने इन शिकायतों पर सीधे विचार करने से पहले मिस्त्री के अधिकार और संबंधित कार्यालय के क्षेत्राधिकार पर फैसला करने की मांग की है। अब इस मामले में कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने अपने हलफनामे में यह भी कहा है कि सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट सर रतन टाटा ट्रस्ट और बाई हीराबाई जमशेदजी टाटा नवसारी चैरिटेबल इंस्टीट्यूशन अलग-अलग सार्वजनिक धर्मार्थ संस्थान हैं। इनके संचालन संबंधी दस्तावेज बोर्ड संपत्तियां और खाते अलग-अलग हैं। ऐसे में सभी ट्रस्टों से जुड़े विवादों को एक ही कार्यवाही में सुनने की मांग स्वीकार नहीं की जानी चाहिए। ट्रस्टों का कहना है कि उनकी अलग कानूनी पहचान और प्रशासनिक व्यवस्था को ध्यान में रखकर ही मामले पर विचार किया जाना चाहिए।
विवाद का एक अहम पहलू बाई हीराबाई ट्रस्ट की ट्रस्ट डीड में शामिल पात्रता शर्तें भी हैं। ट्रस्ट ने मिस्त्री की ओर से डीड की धाराओं 6 और 18 की व्याख्या पर आपत्ति जताई है। ये प्रावधान ट्रस्टी बनने के लिए धर्म और निवास से संबंधित शर्तों से जुड़े हैं। ट्रस्ट का तर्क है कि इन प्रतिबंधों की व्याख्या मूल वसीयत और उससे जुड़े कोडिसिल के प्रावधानों के अनुरूप होनी चाहिए। मिस्त्री को दोनों ट्रस्टों की ओर से दाखिल हलफनामों पर जवाब देने के लिए 5 नवंबर तक का समय दिया गया है।
इसी बीच बाई हीराबाई ट्रस्ट ने विजय सिंह के इस साल की शुरुआत में ट्रस्टी पद से हटने के बाद उनकी जगह नोएल टाटा को रिपोर्टिंग ट्रस्टी नियुक्त करने के लिए आवेदन दिया है। इस प्रस्ताव ने विवाद को एक नया आयाम दे दिया है। मेहली मिस्त्री ने इस नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए आवेदन किया है कि उप चैरिटी कमिश्नर यह सुनिश्चित करें कि नोएल टाटा 7 दिसंबर 1923 की ट्रस्ट डीड में निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा करते हैं या नहीं।
मिस्त्री के मुताबिक ट्रस्ट डीड में ट्रस्टी के पारसी समुदाय से होने और जोरास्ट्रियन धर्म का पालन करने के साथ मुंबई या नवसारी का स्थायी निवासी होने जैसी शर्तों का उल्लेख है। उन्होंने बाई हीराबाई ट्रस्ट के बोर्ड में कुछ ट्रस्टियों की पात्रता पर भी सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर सर रतन टाटा ट्रस्ट ने एक अलग सुनवाई में कहा है कि 15 मई के आदेश के कारण उसे कामकाज में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इस आदेश के तहत ट्रस्ट को बैठक करने से रोका गया है।
कुल मिलाकर टाटा ट्रस्ट विवाद अब ट्रस्टी के कार्यकाल शिकायतों की सुनवाई और नए ट्रस्टी की पात्रता जैसे कई कानूनी सवालों पर केंद्रित हो गया है। आने वाले समय में चैरिटी कमिश्नर कार्यालय का रुख यह तय करने में अहम होगा कि मिस्त्री की आपत्तियों पर आगे सुनवाई किस आधार पर होगी और नोएल टाटा की प्रस्तावित नियुक्ति को लेकर उठे सवालों पर क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
