क्लर्क से महान साहित्यकार बनने तक का सफर: कर्ण के दर्द को शब्द देकर शिवाजी सावंत ने रचा मृत्युंजय और कहलाए मृत्युंजयकार
साहित्य के प्रति बढ़ती रुचि और पुस्तकालयों के करीब रहने की इच्छा उन्हें कोल्हापुर की राजाराम प्रशाला तक ले गई जहां उन्होंने 1962 से 1974 तक शिक्षक के रूप में काम किया। इसके बाद वे पुणे पहुंचे और महाराष्ट्र सरकार के शिक्षा विभाग की पत्रिका लोकशिक्षण से जुड़े। पहले उन्होंने सह संपादक और बाद में संपादक के रूप में जिम्मेदारी संभाली। लेकिन उनकी असली पहचान उस रचना से बनी जिसने उन्हें मराठी साहित्य में अमर कर दिया।
उनका उपन्यास मृत्युंजय 1967 में प्रकाशित हुआ और देखते ही देखते साहित्य जगत में चर्चा का विषय बन गया। महाभारत के महान लेकिन उपेक्षित योद्धा कर्ण के जीवन पर आधारित इस उपन्यास को पूरा करने में शिवाजी सावंत ने सात वर्षों तक अथक मेहनत की। कर्ण के व्यक्तित्व को समझने की उनकी जिज्ञासा उस समय और गहरी हुई जब एफवाईबीए की पढ़ाई के दौरान उन्होंने कवि केदारनाथ मिश्र प्रभात का हिंदी खंडकाव्य कर्ण पढ़ा। इसके बाद उन्होंने कर्ण के जीवन और कुरुक्षेत्र से जुड़े संदर्भों को गहराई से खंगालना शुरू किया।
उनकी शोध और लेखन के प्रति समर्पण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने कुरुक्षेत्र की यात्रा करने का फैसला किया तब उनकी जेब में केवल 50 रुपए थे। इसके बावजूद उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति को आड़े नहीं आने दिया और कुरुक्षेत्र पहुंचकर वहां की भौगोलिक परिस्थितियों को करीब से समझा। उस समय कोल्हापुर की एक पुलिस चॉल में बड़े भाई विश्वासराव के साथ रहते हुए वे इस रचना को लिख रहे थे और अपने लेखन को लंबे समय तक गुप्त रखा।
मृत्युंजय की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अनोखी शैली रही। सावंत ने कहानी को केवल कर्ण की नजर से नहीं देखा बल्कि कर्ण के साथ कुंती दुर्योधन वृषाली शोण और श्रीकृष्ण के दृष्टिकोण को भी शामिल किया। अलग अलग पात्रों के स्वगत कथनों के जरिए उन्होंने कर्ण के व्यक्तित्व के कई आयाम सामने रखे। इस रचना में भाग्य और स्वतंत्र इच्छा के बीच संघर्ष के साथ कर्ण की पीड़ा उसकी महत्वाकांक्षा उसकी वफादारी और उसके भीतर चलने वाला द्वंद्व बेहद प्रभावशाली तरीके से सामने आता है। इसी अद्भुत कृति ने शिवाजी सावंत को मृत्युंजयकार की उपाधि दिलाई।
हालांकि उनकी साहित्यिक यात्रा केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं रही। वर्ष 1980 में प्रकाशित छावा में उन्होंने छत्रपति संभाजी महाराज के जीवन और संघर्ष को केंद्र में रखा। इस रचना ने मराठा इतिहास के एक वीर योद्धा के मानवीय पक्ष को पाठकों के सामने रखा। बाद में इसी कथा पर आधारित हिंदी फिल्म भी बनी जिसने व्यापक व्यावसायिक सफलता हासिल की। वर्ष 2000 में प्रकाशित युगंधर में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को एक अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया और उनके व्यक्तित्व में रणनीतिक सोच के साथ मानवीय संवेदनाओं को भी उभारा।
मराठी साहित्य में उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। वर्ष 1994 में उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ के प्रतिष्ठित मूर्तिदेवी पुरस्कार से सम्मानित किया गया और वे यह सम्मान पाने वाले पहले मराठी लेखक बने। उनकी रचनाओं का कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। परिवार की ओर से पत्नी मृणालिनी पुत्र अमिताभ और पुत्री कादंबिनी ने भी उनकी साहित्यिक यात्रा को मजबूती दी।
18 सितंबर 2002 को गोवा में 76वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद के लिए प्रचार के दौरान हृदय गति रुकने से शिवाजी सावंत का आकस्मिक निधन हो गया। लेकिन उनकी रचनाएं आज भी पाठकों के बीच जीवित हैं। मृत्युंजय ने उन्हें केवल एक महान लेखक नहीं बनाया बल्कि कर्ण की पीड़ा और संघर्ष को पीढ़ियों तक पहुंचाने वाला वह साहित्यकार बना दिया जिसे दुनिया मृत्युंजयकार के नाम से याद करती है।
