ग्रेट निकोबार परियोजना पर फिर उठे सवाल, जयराम रमेश ने NGT से मांगी सीलबंद रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग
जयराम रमेश ने कहा कि एनजीटी को अपनी स्वतंत्र भूमिका और कानूनी अधिकारों को प्रभावी ढंग से निभाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि अलग-अलग न्यायाधिकरण, विशेष रूप से एनजीटी, अपनी संस्थागत विश्वसनीयता और अधिकार को फिर से मजबूत करेंगे तथा कानून के तहत निर्धारित जिम्मेदारियों का पूरी तरह पालन करेंगे।
उन्होंने न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, इस विधेयक पर लोकसभा में चर्चा प्रस्तावित है। यह विधेयक पिछले वर्षों में गठित 16 अर्द्ध-न्यायिक अधिकरणों के लिए नई व्यवस्था तय करने से जुड़ा है। इनमें राष्ट्रीय हरित अधिकरण भी शामिल है, जिसका गठन अक्टूबर 2010 में संसद के एक कानून के तहत किया गया था।
रमेश ने कहा कि प्रस्तावित विधेयक का संबंध 19 नवंबर 2025 के उच्चतम न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसले से भी है। इस फैसले में न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के प्रमुख प्रावधानों को रद्द किया गया था। साथ ही न्यायाधिकरणों में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति के लिए स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन की दिशा में निर्देश दिए गए थे।
कांग्रेस नेता ने न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता से जुड़े पुराने विवादों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वह 2021 के कानून को चुनौती देने वाले लोगों में शामिल थे। इससे पहले उन्होंने वित्त अधिनियम, 2017 के उन प्रावधानों को भी चुनौती दी थी, जिनके माध्यम से न्यायाधिकरणों की व्यवस्था में बदलाव किए गए थे।
रमेश ने आरोप लगाया कि कुछ संशोधनों को धन विधेयक का हिस्सा बनाकर संसद के दोनों सदनों, खासकर राज्यसभा में विस्तृत विधायी समीक्षा से बचने का प्रयास किया गया। उन्होंने कहा कि न्यायाधिकरणों की भूमिका और स्वतंत्रता को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है और अब इस व्यवस्था में जरूरी सुधारों को लागू करने की आवश्यकता सामने आई है।
ग्रेट निकोबार परियोजना से जुड़ी उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट को उन्होंने इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, समिति ने अपनी रिपोर्ट 8 जुलाई 2025 को एनजीटी के समक्ष सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत की थी। उन्होंने मांग की कि इस रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरियों की समीक्षा के दौरान समिति ने किन तथ्यों और निष्कर्षों को सामने रखा था।
जयराम रमेश ने कहा कि रिपोर्ट सार्वजनिक करना एनजीटी की पारदर्शिता और स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण संकेत होगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि न्यायाधिकरण पर्यावरणीय मामलों में अपने कानूनी दायित्वों का पालन करते हुए स्वतंत्र रूप से काम करेंगे।
न्यायाधिकरण सुधार विधेयक में अध्यक्षों और सदस्यों की योग्यता तथा नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के साथ स्वतंत्रता, पारदर्शिता और एकरूपता सुनिश्चित करने का प्रस्ताव है। इसमें राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन की रूपरेखा भी शामिल है। ऐसे में ग्रेट निकोबार परियोजना की समीक्षा रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग ने पर्यावरणीय मंजूरियों के साथ न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता और पारदर्शिता के मुद्दे को भी प्रमुखता से सामने ला दिया है।
