September 29, 2026

मखाने की खेती को मिल रहा तकनीक और निर्यात का सहारा, उत्पादन बढ़ने से बिहार सहित किसानों को मिलेगा बड़ा बाजार

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नई दिल्ली ।भारत का मखाना क्षेत्र आने वाले वर्षों में तेजी से विस्तार करने की दिशा में बढ़ रहा है। बढ़ती घरेलू मांग, बेहतर बाजार कीमत, उत्पादन में वृद्धि और निर्यात के विस्तार के कारण वर्ष 2029-30 तक देश का मखाना बाजार 11 हजार से 12 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। केंद्र सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, मखाना अब केवल पारंपरिक खाद्य उत्पाद नहीं रह गया है, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक और प्रीमियम स्नैक के रूप में घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बना रहा है।

वित्त वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच मखाना उत्पादन में करीब 4 से 5 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन इसी अवधि में इसकी औसत कीमत लगभग 500 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 1,250 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। कीमतों में यह वृद्धि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग, प्रीमियम उत्पादों की लोकप्रियता और सीमित आपूर्ति जैसे कारणों से जुड़ी है।

मखाने को कम वसा और पोषण से भरपूर खाद्य पदार्थ के रूप में देखा जाता है। पौध-आधारित भोजन और क्लीन-लेबल उत्पादों की ओर बढ़ते वैश्विक रुझान ने भी इसकी मांग को मजबूत किया है। घरेलू बाजार के साथ विदेशों में भी भारतीय मखाने की खपत बढ़ रही है, जिससे किसानों और प्रसंस्करण से जुड़े कारोबार के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

वर्ष 2024-25 में देश में मखाने का कुल उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन रहा था। इस दौरान औसत उत्पादकता 2.03 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। वर्ष 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमान में उत्पादन बढ़कर 80,590 मीट्रिक टन और उत्पादकता 2.34 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर पहुंचने की संभावना है। उत्पादन और उत्पादकता में यह बढ़ोतरी खेती के आधुनिक तरीकों के बढ़ते इस्तेमाल को दर्शाती है।

मखाना उत्पादन में बिहार देश का प्रमुख राज्य है। वर्ष 2025-26 में बिहार का उत्पादन लगभग 60 हजार मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। राज्य में औसत उत्पादकता करीब 2 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है। देश के कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी सबसे बड़ी होने के कारण मखाना क्षेत्र के विस्तार का सीधा लाभ राज्य के किसानों को मिलने की संभावना है।

पारंपरिक तौर पर मखाने की खेती तालाबों और जलाशयों में की जाती रही है, लेकिन अब फील्ड सिस्टम खेती और उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1 जैसी उन्नत किस्मों से पैदावार बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। इससे खेती के दायरे का विस्तार करने और उत्पादन से जुड़े जोखिम कम करने में भी मदद मिल रही है।

भारत हर साल 60 हजार मीट्रिक टन से अधिक मखाने का उत्पादन करता है। इसमें करीब 40 प्रतिशत हिस्सा निर्यात होता है, जो लगभग 23 हजार से 25 हजार मीट्रिक टन के बराबर है। शेष उत्पादन की खपत घरेलू बाजार में होती है। घरेलू मखाना बाजार ने 2021-22 से 2024-25 के बीच करीब 17 से 18 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की है।

सरकार ने इस क्षेत्र की संभावनाओं को देखते हुए केंद्रीय बजट 2025-26 में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना की घोषणा की थी। इसके अलावा 2025-26 से 2030-31 के लिए 476.03 करोड़ रुपये की मखाना विकास केंद्रीय क्षेत्र योजना को मंजूरी दी गई है। इसके तहत अनुसंधान, गुणवत्तापूर्ण बीज, किसानों का कौशल विकास, कटाई के बाद प्रबंधन, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग, विपणन और निर्यात को बढ़ावा दिया जाएगा।

मखाना क्षेत्र में उत्पादन और बाजार दोनों के विस्तार से किसानों को बेहतर कीमत और नए बाजार मिलने की संभावना है। यदि उत्पादकता, गुणवत्ता और प्रसंस्करण क्षमता में लगातार सुधार होता है, तो भारतीय मखाना वैश्विक प्रीमियम स्नैक बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।

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