November 3, 2026

‘खतरे में बहुसंख्यक नहीं, सत्ता की भूख है’, मेवात में मदनी ने अमित शाह पर साधा निशाना

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मेवात। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने बहुसंख्यक समुदाय के खतरे में होने के राजनीतिक दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि खतरे में बहुसंख्यक समुदाय नहीं, बल्कि सत्ता और राजनीतिक पदों की भूख है। हरियाणा के मेवात में संगठन की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर भी निशाना साधा और अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग की।

30 और 31 अक्टूबर को हुई बैठक में देशभर से आए 3,000 से अधिक उलमा ने हिस्सा लिया। इसमें देश के मौजूदा हालात, संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई। कार्यकारिणी ने जनसंख्या वृद्धि, जनसांख्यिकीय बदलाव और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) सहित विभिन्न विषयों पर प्रस्ताव पारित किए।

मुस्लिम आबादी बढ़ने के दावों को किया खारिज

कार्यकारिणी ने भारत में जनसंख्या और जनसांख्यिकीय बदलावों को लेकर फैलाए जा रहे कथित भ्रामक नैरेटिव तथा ‘डेमोग्राफिक जिहाद’ के आरोपों को खारिज किया। प्रस्ताव में कहा गया कि मुसलमान जनसंख्या वृद्धि या अवैध घुसपैठ के जरिए देश का जनसांख्यिकीय संतुलन बदलने की कोशिश कर रहे हैं, इस दावे का कोई आधार नहीं है।

जनगणना और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों का हवाला देते हुए जमीयत ने कहा कि 1981-1991 के दौरान मुस्लिम आबादी की दशकीय वृद्धि दर 32.9 प्रतिशत थी, जो 2001-2011 में घटकर 24.7 प्रतिशत रह गई। संगठन ने मांग की कि जनसंख्या में बदलाव का अध्ययन सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर किया जाए, न कि इसे अवैध घुसपैठ से जोड़कर सांप्रदायिक सुरक्षा का मुद्दा बनाया जाए।

कार्यकारिणी ने गृह मंत्रालय की ओर से 26 मई 2026 को गठित उच्चस्तरीय जनसांख्यिकी समिति की संरचना पर भी सवाल उठाए। प्रस्ताव में दावा किया गया कि समिति में कोई जनसांख्यिकी विशेषज्ञ शामिल नहीं है और इसका गठन इस पूर्वधारणा के आधार पर किया गया है कि जनसांख्यिकीय बदलावों का प्रमुख कारण अवैध घुसपैठ है। जमीयत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों को शामिल कर स्वतंत्र और निष्पक्ष आयोग गठित करने की मांग की, जो प्रवासन, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का वैज्ञानिक अध्ययन करे।

यूसीसी के खिलाफ कानूनी लड़ाई तेज करने का फैसला

कार्यकारिणी ने गुजरात, उत्तराखंड, असम और अन्य राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू किए जाने के विरोध में भी प्रस्ताव पारित किया। जमीयत ने इसे मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता, पारिवारिक मामलों में स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों के लिए चुनौती बताया।

प्रस्ताव में कहा गया कि विरासत, विवाह और तलाक से जुड़े इस्लामी सिद्धांत कुरआन और हदीस में निर्धारित हैं तथा उनका पालन मुसलमानों के लिए धार्मिक दायित्व है। संगठन के अनुसार, यूसीसी के जरिए इन सिद्धांतों में हस्तक्षेप शरीयत के मामलों में दखल है, जिसे मुसलमान स्वीकार नहीं कर सकते।

जमीयत ने उत्तराखंड और गुजरात में अनुसूचित जनजातियों को उनके रीति-रिवाजों और परंपराओं के आधार पर यूसीसी से छूट दिए जाने, जबकि मुसलमानों को कानून के दायरे में रखे जाने पर भी आपत्ति जताई। प्रस्ताव में इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14, 25 और 26 के संदर्भ में गंभीर सवाल उठाए गए।

सिख, ईसाई, दलित और आदिवासी संगठनों से समन्वय

कार्यकारिणी ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य मुस्लिम संगठनों के साथ-साथ सिख, ईसाई, दलित, आदिवासी तथा दूसरे अल्पसंख्यक संगठनों से समन्वय बढ़ाने का निर्णय लिया। संगठन का कहना है कि संविधान की रक्षा के लिए व्यापक राष्ट्रीय और लोकतांत्रिक आवाज उठाई जाएगी।

बैठक में उत्तराखंड, गुजरात और असम के यूसीसी कानूनों को उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की कानूनी कार्रवाई को समन्वित ढंग से आगे बढ़ाने का फैसला भी हुआ। इसके लिए संविधान पीठ के समक्ष कानूनों को निरस्त करने की मांग रखी जाएगी। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय कानून मंत्री और संबंधित राज्यों के राज्यपालों तथा मुख्यमंत्रियों को भी ज्ञापन सौंपे जाएंगे।

कार्यकारिणी ने मुस्लिम परिवारों में महिलाओं के साथ न्याय सुनिश्चित करने पर जोर दिया। प्रस्ताव में कहा गया कि तलाक, भरण-पोषण और मेहर से जुड़े मामलों का निपटारा शरीयत के सिद्धांतों के अनुरूप और पूरी ईमानदारी से किया जाना चाहिए।

मदनी बोले- आजादी के बाद शुरू हुआ खतरे का नैरेटिव

मौलाना मदनी ने कहा कि आजादी से पहले, जब देश औपनिवेशिक शासन के अधीन था, तब बहुसंख्यक समुदाय के खतरे में होने का दावा नहीं किया जाता था। उनके मुताबिक, धर्मनिरपेक्ष संविधान अपनाए जाने के बाद अचानक यह नैरेटिव शुरू हुआ कि बहुसंख्यक समुदाय खतरे में है। उन्होंने कहा, “खतरे में बहुसंख्यक समुदाय नहीं, बल्कि सत्ता और राजनीतिक पदों की भूख है।”

मदनी ने अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इसे रोकने की जिम्मेदारी जिस मंत्रालय की है, उसकी जवाबदेही तय करने के बजाय मुसलमानों को राजनीतिक रूप से निशाना क्यों बनाया जा रहा है।

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