चुनाव आयोग विवाद पर भाजपा का पलटवार, संबित पात्रा ने विपक्ष के आरोपों पर उठाए सवाल
विवाद की पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग के तीनों आयुक्तों के बीच पिछले करीब 10 महीनों में 14 मौकों पर आधिकारिक आपत्तियों और पत्राचार की बात सामने आई है। इन मामलों में SIR, नए मतदाताओं के लिए फॉर्म-6, मतदाता सूची से जुड़े तकनीकी प्रबंधन और पश्चिम बंगाल में नाम हटाने से संबंधित विषय शामिल बताए गए हैं। आयोग की ओर से स्पष्ट किया गया है कि उसके फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे।
संबित पात्रा ने कहा कि तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच संवाद और अलग-अलग विचार सामने आना अपने आप में किसी संस्थागत संकट का प्रमाण नहीं है। उनके मुताबिक, किसी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले चर्चा, विचार-विमर्श और असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वाभाविक प्रक्रिया है। भाजपा ने विपक्ष के उस तर्क को भी खारिज किया जिसमें आयोग के भीतर मतभेदों को उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल के तौर पर पेश किया जा रहा है।
भाजपा नेता ने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि चुनावी राजनीति में अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के बाद विपक्षी दल लगातार संवैधानिक संस्थाओं को विवाद में खींच रहे हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव हारने के बाद संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाना कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक शैली रही है। भाजपा का कहना है कि चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोप मतदाताओं के जनादेश पर भी सवाल खड़ा करते हैं।
विवाद के बीच पश्चिम बंगाल की विधानसभा सीटों के आंकड़ों का भी भाजपा ने उल्लेख किया। संबित पात्रा ने कहा कि विपक्ष भाजपा पर मतदाता सूची में नाम हटाकर चुनावी लाभ लेने का आरोप लगाता है, लेकिन जिन 20 विधानसभा सीटों पर सबसे अधिक मतदाता नाम हटाए जाने की बात सामने आई, उनमें 13 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस ने जीत दर्ज की, जबकि भाजपा छह सीटों पर विजयी रही। इन 20 सीटों में एक सीट कांग्रेस के खाते में भी गई।
भाजपा ने इन आंकड़ों के जरिए विपक्ष के उन आरोपों पर सवाल उठाया जिनमें मतदाता सूची में बदलाव को सीधे भाजपा के चुनावी लाभ से जोड़ने की बात कही जा रही है। पार्टी का तर्क है कि यदि मतदाता नाम हटाए जाने की प्रक्रिया से भाजपा को सीधा लाभ हुआ होता, तो सबसे अधिक नाम हटने वाली सभी सीटों पर चुनावी परिणाम एक ही दिशा में नहीं होते।
दूसरी ओर, विपक्षी दल चुनाव आयोग की पारदर्शिता, मतदाता सूची में बदलाव और निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं। आयोग के भीतर आयुक्तों के बीच हुई आपत्तियों और संवाद को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज है। आयोग की ओर से अपने फैसलों को सामूहिक मंजूरी से लिया गया बताया गया है।
फिलहाल SIR, मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव आयोग के भीतर हुई चर्चाओं को लेकर राजनीतिक टकराव जारी है। भाजपा इन घटनाओं को संस्थागत संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बता रही है, जबकि विपक्ष इन्हीं घटनाक्रमों के आधार पर आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है।
