आपातकाल के 51 साल: भारत के लोकतंत्र का सबसे विवादित दौर, जानें कैसे बदला था देश का राजनीतिक परिदृश्य
यह दौर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे विवादित समय माना जाता है, जिसे लेकर आज भी राजनीतिक बहस जारी रहती है। आपातकाल के मुद्दे को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने लगातार उठाया है, खासकर तब जब विपक्ष ने वर्तमान सरकार पर संविधान के खिलाफ काम करने के आरोप लगाए।
किन परिस्थितियों में लगा आपातकाल
मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया, जिसके बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बन गई और अंततः आपातकाल की घोषणा की गई।
आपातकाल के दौरान देश पर असर
आपातकाल लागू होने के बाद देश में कई बड़े बदलाव देखने को मिले—
– पूरे देश में चुनाव स्थगित कर दिए गए।
– नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अन्य अधिकार प्रभावित हुए।
– 25 जून की रात से ही विपक्षी नेताओं की массов गिरफ्तारियां शुरू हो गईं, जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जयप्रकाश नारायण जैसे नेता शामिल थे।
– जेलों में कैदियों की संख्या इतनी बढ़ गई कि स्थान की कमी हो गई।
– प्रेस पर सख्त सेंसरशिप लागू की गई, जिसके तहत किसी भी खबर के प्रकाशन से पहले अनुमति अनिवार्य थी।
– सरकार विरोधी खबरें प्रकाशित करने पर कार्रवाई और गिरफ्तारियों के मामले भी सामने आए।
इस दौर में प्रशासनिक और पुलिस कार्रवाई को लेकर कई तरह के आरोप और अनुभव भी सामने आए, जिन्हें बाद में व्यापक बहस का विषय बनाया गया।
आपातकाल से जुड़े दावे और चर्चाएं
यह भी दावा किया गया कि तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल की सिफारिश को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई थी और तुरंत सहमति दे दी थी।
कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि उस समय इंदिरा गांधी को अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर अनिश्चितता थी, जबकि बाद में 1977 के चुनाव में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा।
आपातकाल का राजनीतिक प्रभाव
