September 23, 2026

जुलाई में भारत के निजी क्षेत्र की रफ्तार धीमी, कंपोजिट पीएमआई 54.3 पर; निर्यात मांग ने मैन्युफैक्चरिंग को दिया मजबूत सहारा

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नई दिल्ली । जुलाई महीने में भारत के निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि का क्रम जारी रहा, हालांकि इसकी रफ्तार जून की तुलना में कुछ धीमी दर्ज की गई। ताजा आंकड़ों के अनुसार जुलाई में कंपोजिट परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) 54.3 रहा। यह स्तर इस बात का संकेत है कि देश की आर्थिक गतिविधियां अब भी विस्तार के चरण में हैं, क्योंकि पीएमआई का 50 से ऊपर रहना आर्थिक वृद्धि का संकेत माना जाता है। हालांकि जून में यह सूचकांक 57.1 था, जिससे स्पष्ट है कि जुलाई में विकास की गति कुछ कम हुई है।

जुलाई के दौरान निजी क्षेत्र के प्रदर्शन में सर्विस सेक्टर की सुस्ती प्रमुख कारण रही। कारोबार से जुड़े नए ऑर्डरों की रफ्तार कमजोर पड़ी और ग्राहकों की ओर से पूछताछ में कमी देखने को मिली। कई कंपनियों ने मांग में नरमी और कुछ ऑर्डर रद्द होने की वजह से सेवा गतिविधियों में अपेक्षाकृत धीमी बढ़ोतरी दर्ज की। इसके चलते सर्विस सेक्टर का बिजनेस एक्टिविटी इंडेक्स घटकर 53.1 पर पहुंच गया, जो पिछले 53 महीनों का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।

इसके विपरीत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। वैश्विक बाजारों से लगातार मिल रही मजबूत मांग और निर्यात ऑर्डरों में बढ़ोतरी के कारण उत्पादन गतिविधियां मजबूत बनी रहीं। मुख्य मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई में मामूली गिरावट के बावजूद फैक्ट्री उत्पादन सूचकांक में सुधार दर्ज किया गया। इससे संकेत मिलता है कि औद्योगिक उत्पादन की गति बनी हुई है और विनिर्माण क्षेत्र देश की आर्थिक गतिविधियों को सहारा देता रहा।

व्यापारिक संस्थानों ने भविष्य की संभावित चुनौतियों को देखते हुए अपनी तैयारियां भी तेज कर दी हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ने वाले संभावित असर को ध्यान में रखते हुए कंपनियों ने कच्चे माल की खरीद बढ़ाई है। इसके साथ ही तैयार माल और इनपुट इन्वेंट्री में भी वृद्धि दर्ज की गई है, ताकि किसी भी आपूर्ति व्यवधान की स्थिति में उत्पादन प्रभावित न हो।

सर्वेक्षण के अनुसार लागत का दबाव भी जुलाई में बढ़ा है। कच्चे माल और अन्य इनपुट की कीमतों में वृद्धि के कारण कंपनियों की लागत बढ़ी, जिसका असर उत्पादों और सेवाओं की कीमतों पर भी दिखाई दिया। कई कंपनियों ने बढ़ती लागत के बीच अपने लाभ मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए कीमतों में आवश्यक बदलाव किए। इसके बावजूद रोजगार के मोर्चे पर स्थिति सकारात्मक बनी रही और कंपनियों ने कर्मचारियों की नियुक्ति जारी रखी।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक परिस्थितियों में उतार-चढ़ाव और क्षेत्रीय तनाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था का निजी क्षेत्र अभी भी मजबूती का संकेत दे रहा है। निर्यात आधारित मांग, उत्पादन गतिविधियों की स्थिरता और रोजगार सृजन जैसे कारक आर्थिक विस्तार को समर्थन दे रहे हैं। हालांकि घरेलू मांग में सुधार और सर्विस सेक्टर की गति बढ़ाना आने वाले महीनों में आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।

कुल मिलाकर जुलाई के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था विस्तार के मार्ग पर बनी हुई है, लेकिन विकास की गति को बनाए रखने के लिए घरेलू मांग को मजबूत करना, निवेश बढ़ाना और वैश्विक अनिश्चितताओं के प्रभाव को सीमित करना आवश्यक होगा। यदि आने वाले महीनों में मांग और कारोबारी विश्वास में सुधार होता है तो निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां फिर से तेज रफ्तार पकड़ सकती हैं।

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