August 28, 2026

रक्षाबंधन क्यों मनाते हैं? जानिए राखी से जुड़ी पौराणिक कहानियां

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उज्जैन।
रक्षाबंधन भारत के उन त्योहारों में शामिल है, जिनका अर्थ केवल भाई की कलाई पर राखी बांधने तक सीमित नहीं है। सावन की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह पर्व भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है। समय के साथ राखी की परंपरा ने भी अलग-अलग रूप लिए और इसका अर्थ पारिवारिक रिश्ते से आगे बढ़कर सामाजिक एकता और भाईचारे तक पहुंचा।

रक्षाबंधन का मतलब क्या है?

‘रक्षाबंधन’ शब्द संस्कृत के ‘रक्षा’ और ‘बंधन’ से मिलकर बना है, जिसका सामान्य अर्थ रक्षा का बंधन माना जाता है। इस दिन बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं, तिलक करती हैं, आरती उतारती हैं और उसके सुख-स्वास्थ्य की कामना करती हैं। भाई भी बहन की रक्षा और हर परिस्थिति में उसका साथ देने का संकल्प लेता है।

हालांकि आज यह परंपरा सिर्फ सगे भाई-बहन तक सीमित नहीं है। कई जगह चचेरे-ममेरे भाई-बहन, मित्र और सामाजिक रूप से जुड़े लोग भी एक-दूसरे को राखी बांधते हैं।

कृष्ण और द्रौपदी की कहानी

रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे चर्चित पौराणिक कथाओं में भगवान कृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग शामिल है। महाभारत की प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार कृष्ण की उंगली में चोट लगने पर खून निकल आया। द्रौपदी ने अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया।

मान्यता है कि कृष्ण ने इस स्नेह और अपनत्व को याद रखा। इसी प्रसंग को बाद में रक्षा के भाव से जोड़कर देखा गया और इसे राखी की परंपरा से संबंधित लोकप्रिय कथाओं में जगह मिली।

राजा बलि और माता लक्ष्मी का प्रसंग

रक्षाबंधन से जुड़ी एक अन्य कथा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि की है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर उनके राज्य की रक्षा के लिए वहां रहने लगे थे।

माता लक्ष्मी विष्णु से अलग नहीं रहना चाहती थीं। कथा के अनुसार उन्होंने श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई माना। इसके बाद बलि ने भगवान विष्णु को उनके साथ वैकुंठ लौटने की अनुमति दे दी। इस कहानी को श्रावण पूर्णिमा पर रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा से जोड़ा जाता है।

यमराज और यमुना की कहानी

एक अन्य लोकप्रिय कथा मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार यमुना ने यमराज की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनकी लंबी उम्र की कामना की थी।

इसी प्रसंग के आधार पर रक्षाबंधन को भाई की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना से जोड़कर देखा जाता है।

इंद्र की कलाई पर शुचि ने बांधा रक्षा सूत्र

रक्षा सूत्र की शक्ति से जुड़ी एक और पौराणिक कथा देवताओं और असुरों के युद्ध की है। कहा जाता है कि युद्ध में इंद्र कमजोर पड़ रहे थे। तब उनकी पत्नी शुचि ने गुरु बृहस्पति की सलाह पर इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा।

इसके बाद इंद्र ने युद्ध में विजय हासिल की। इस कथा में रक्षा सूत्र को सुरक्षा, शक्ति और आत्मविश्वास के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है।

सिकंदर की पत्नी और राजा पुरु की कहानी कितनी प्रसिद्ध है?

राखी से जुड़ी एक लोकप्रिय ऐतिहासिक कथा सिकंदर और भारतीय शासक राजा पुरु से संबंधित है। कहा जाता है कि सिकंदर की पत्नी ने राजा पुरु को राखी भेजकर उन्हें अपना भाई बनाया था। बाद में सिकंदर और पुरु के बीच युद्ध हुआ और प्रचलित कथा के अनुसार पुरु ने राखी के रिश्ते का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया।

हालांकि इस प्रसंग को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं और इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना की बजाय लोकप्रिय कथा के रूप में देखना अधिक उचित माना जाता है।


रानी कर्णावती और हुमायूं की कहानी

रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे चर्चित ऐतिहासिक कहानियों में मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल शासक हुमायूं का प्रसंग भी है। लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, संकट के समय रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर मदद मांगी थी।

कहा जाता है कि हुमायूं ने इस रिश्ते का सम्मान किया और रानी की सहायता के लिए आगे बढ़ा। हालांकि इस कहानी के ऐतिहासिक प्रमाणों और घटनाक्रम को लेकर भी इतिहासकारों में बहस है।

जब राखी बनी हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक

रक्षाबंधन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बंगाल विभाजन के विरोध से जुड़ा है। 1905 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बंगाल विभाजन की घोषणा के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर ने राखी को सामाजिक एकता और भाईचारे के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया।

टैगोर ने लोगों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधकर एकता का संदेश देने की अपील की। इस तरह राखी का अर्थ केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक सद्भाव और एकजुटता का प्रतीक भी बनी।

रक्षाबंधन पर कैसे होती है पूजा और रस्म?

रक्षाबंधन के दिन बहनें पूजा की थाली तैयार करती हैं। इसमें आमतौर पर राखी, कुमकुम, अक्षत, दीपक और मिठाई रखी जाती है। भाई को तिलक लगाने और आरती करने के बाद उसकी कलाई पर राखी बांधी जाती है। इसके बाद मिठाई खिलाई जाती है और भाई बहन को उपहार देता है।

आजकल राखियों के स्वरूप में भी काफी बदलाव आया है। पारंपरिक धागे वाली राखियों के साथ चांदी, सोने, रुद्राक्ष, मोती और कई तरह की डिजाइन वाली राखियां बाजार में उपलब्ध होती हैं।

देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग परंपराएं

श्रावण पूर्णिमा का महत्व भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में दिखाई देता है।

  • नारली पूर्णिमा: महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में मछुआरा समुदाय समुद्र देवता वरुण की पूजा करता है और समुद्र में नारियल अर्पित करता है।
  • अवनि अवित्तम: दक्षिण भारत में कई ब्राह्मण समुदायों में इस दिन यज्ञोपवीत बदलने की परंपरा है। इसे उपाकर्म भी कहा जाता है।
  • कजरी पूर्णिमा: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों में कजरी गीत, पूजा और अच्छी फसल की कामना से जुड़ी परंपराएं हैं।
  • झूलन पूर्णिमा: पश्चिम बंगाल और ओडिशा में राधा-कृष्ण को झूले पर विराजमान कर इस पर्व को मनाने की परंपरा है।

समय के साथ बदल गया राखी का अर्थ

रक्षाबंधन की सबसे खास बात यह है कि इसका मूल भाव रिश्ते में सुरक्षा और विश्वास है, लेकिन समय के साथ इसकी व्याख्या बदलती रही है। कभी यह भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक रहा, तो कभी सामाजिक एकता और भाईचारे का माध्यम बना।

आज राखी को केवल भाई द्वारा बहन की रक्षा के वादे के रूप में देखने के बजाय एक-दूसरे के साथ खड़े रहने और रिश्ते की जिम्मेदारी निभाने के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। यही बदलता अर्थ रक्षाबंधन को हर दौर में प्रासंगिक बनाए रखता है।

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