उत्तराखंड की रहस्यमयी पाताल भुवनेश्वर गुफा, जहां कलयुग के अंत से जुड़ी है अनोखी मान्यता
करीब 90 फीट गहराई में स्थित इस गुफा तक पहुंचने के लिए संकरी और फिसलन भरी लगभग 80 सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए लगभग 160 किलोमीटर की यात्रा के बाद गंगोलीहाट पहुंचकर इस गुफा के दर्शन किए जा सकते हैं।
गुफा में दिखती हैं कई पौराणिक आकृतियां
गुफा के भीतर प्राकृतिक चट्टानों से बनी कई आकृतियां दिखाई देती हैं, जिन्हें श्रद्धालु शेषनाग, विभिन्न देवी-देवताओं और धार्मिक प्रतीकों के रूप में देखते हैं। प्रवेश द्वार के पास शेषनाग के फन जैसी आकृति भी मौजूद है, जिसके बारे में धार्मिक मान्यता है कि पृथ्वी उसी पर टिकी हुई है।
कलयुग के स्तंभ से जुड़ी मान्यता
गुफा में मौजूद छह प्राकृतिक स्तंभों को चारों युगों का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इनमें से एक स्तंभ कलयुग का प्रतिनिधित्व करता है, जो धीरे-धीरे बढ़ रहा है। इसके ठीक ऊपर छत से लटकी एक प्राकृतिक शिला (पिंड) भी समय के साथ बढ़ती मानी जाती है। धार्मिक विश्वास है कि जिस दिन यह शिला कलयुग के स्तंभ से मिल जाएगी, उसी दिन कलयुग का अंत और महाप्रलय होगी। यह एक पौराणिक मान्यता है, जिसका वैज्ञानिक आधार नहीं है।
पौराणिक कथाओं में विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेतायुग में राजा ऋतुपर्ण ने सबसे पहले इस गुफा के दर्शन किए थे। द्वापर युग में पांडव यहां पहुंचे थे, जबकि कलयुग में लगभग 833 ईस्वी में आदि शंकराचार्य ने इस स्थान का पुनः दर्शन कर यहां तांबे का शिवलिंग स्थापित किया था।
चार धाम के दर्शन का भी है विश्वास
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस गुफा में चारों धामों का प्रतीकात्मक दर्शन होता है। यहां भगवान शिव की जटाओं से बहती गंगा जैसी प्राकृतिक आकृति, अमृत कुंड और कई अन्य धार्मिक प्रतीक दिखाई देते हैं। कुछ पौराणिक मान्यताओं में इसे स्वर्ग के मार्ग का प्रवेश द्वार भी माना गया है।
आज पाताल भुवनेश्वर गुफा अपनी प्राकृतिक बनावट, आध्यात्मिक महत्व और रहस्यमयी वातावरण के कारण देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण बनी हुई है।
