September 9, 2026

पढ़ाई के लिए तरसते 190 दिव्यांग बच्चे, सिर्फ 3 शिक्षकों के भरोसे 12वीं तक की कक्षाएं: भोपाल में छात्रों ने खोली व्यवस्था की पोल

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भोपाल । भोपाल में दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और भविष्य से जुड़ी एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस स्कूल की जिम्मेदारी दृष्टि बाधित और श्रवण बाधित बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुविधाएं देकर उनका भविष्य संवारने की है वहीं बच्चे आज अपनी पढ़ाई और बुनियादी जरूरतों के लिए आवाज उठाने को मजबूर हैं। शासकीय दृष्टि बाधित उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भोपाल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने शिक्षकों की भारी कमी से लेकर नियमित कक्षाएं नहीं लगने और साइन लैंग्वेज जानने वाले शिक्षकों के अभाव तक कई गंभीर शिकायतें सामने रखी हैं। बच्चों का सबसे बड़ा सवाल है कि जब उनकी भाषा समझने वाला शिक्षक ही नहीं है तो उन्हें पढ़ाएगा कौन और उनकी समस्याओं को सुनेगा कौन।

पहली से 12वीं तक कक्षाएं संचालित करने वाले इस स्कूल में दृष्टि बाधित और श्रवण बाधित विद्यार्थियों को मिलाकर करीब 190 बच्चे पढ़ते हैं जबकि फिलहाल यहां केवल तीन शिक्षक उपलब्ध हैं। विद्यार्थियों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की पढ़ाई सिर्फ तीन शिक्षकों के भरोसे कैसे हो सकती है। खासतौर पर श्रवण बाधित विद्यार्थियों की स्थिति बेहद चिंताजनक बताई जा रही है क्योंकि बच्चों के अनुसार शिक्षकों को साइन लैंग्वेज तक नहीं आती और स्कूल में उनकी बात समझने के लिए कोई इंटरप्रेटर भी नहीं है। ऐसे में जो बच्चा सुन और बोल नहीं सकता उसकी पढ़ाई और संवाद की व्यवस्था आखिर कैसे होगी यह सवाल अब शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा हो गया है।

विद्यार्थियों ने सोमवार को अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किया और स्कूल प्रबंधन पर पढ़ाई की उपेक्षा के गंभीर आरोप लगाए। एक विद्यार्थी अंश राजपूत ने बताया कि वह वर्ष 2018 से स्कूल में पढ़ रहा है लेकिन 2026 तक पहुंचने के बाद भी उसे गणित और अंग्रेजी की बुनियादी जानकारी नहीं हो सकी है। बच्चों का कहना है कि वे नियमित कक्षाएं लगाने की मांग करते हैं लेकिन उनकी बातों को गंभीरता से नहीं सुना जाता। विद्यार्थियों ने यह भी आरोप लगाया कि कई बार शिक्षक पढ़ाने के बजाय मोबाइल फोन चलाते रहते हैं और कक्षाओं में पढ़ाई की जगह वीडियो दिखाए जाते हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच जरूरी है लेकिन बच्चों की शिकायतों ने स्कूल में शिक्षा की गुणवत्ता पर बड़ा प्रश्नचिह्न जरूर लगा दिया है।

समस्या केवल शिक्षकों की कमी तक सीमित नहीं है। स्कूल प्रबंधन ने भी भवन में कमरों की कमी स्वीकार की है जिसके कारण कई बार एक ही कमरे में दो से तीन कक्षाएं संचालित करनी पड़ती हैं। विद्यार्थियों ने कंप्यूटर लैब के पर्याप्त उपयोग नहीं होने परिवहन सुविधा की कमी छात्राओं के लिए अलग हॉस्टल नहीं होने हॉस्टल में साफ सफाई की समस्या और खेल गतिविधियों के लिए पर्याप्त अवसर नहीं मिलने जैसी शिकायतें भी रखी हैं। बच्चों का आरोप है कि दूरदराज से आने वाले विद्यार्थियों को इन व्यवस्थाओं की कमी का सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है।

प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों ने सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के सामने 15 प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें सभी शिकायतों की स्वतंत्र जांच भारतीय सांकेतिक भाषा में विद्यार्थियों से सीधे संवाद साइन लैंग्वेज प्रशिक्षित और मूक बधिर शिक्षकों की नियुक्ति इंटरप्रेटर की व्यवस्था हॉस्टल और परिवहन सुविधा कंप्यूटर लैब तक बेहतर पहुंच खेल गतिविधियां भोजन और साफ सफाई में सुधार शामिल हैं।

स्कूल के प्रभारी अधीक्षक एवं प्राचार्य मोहम्मद इरफान का कहना है कि उन्होंने मार्च 2026 में कार्यभार संभाला है और उनके अनुसार बच्चों या अभिभावकों ने उनके पास पहले कोई लिखित या मौखिक शिकायत नहीं की। उन्होंने शिक्षकों की कमी स्वीकार करते हुए कहा कि रिक्त पदों के विरुद्ध अतिथि शिक्षकों को रखने की प्रक्रिया चल रही है और जल्द चार और शिक्षक मिलने की उम्मीद है। लेकिन बच्चों का सवाल भी उतना ही अहम है कि यदि समस्याएं लंबे समय से बनी हुई थीं और समाधान नहीं हुआ तो फिर अपनी बात सुनाने के लिए आंदोलन के अलावा उनके पास क्या रास्ता बचता।

अब यह मामला सिर्फ तीन शिक्षकों और 190 विद्यार्थियों के अनुपात का नहीं बल्कि दिव्यांग बच्चों के शिक्षा के अधिकार समान अवसर और समावेशी व्यवस्था का है। जब श्रवण बाधित बच्चों को पढ़ाने के लिए उनकी भाषा समझने वाला शिक्षक नहीं हो और एक कमरे में कई कक्षाएं चलानी पड़ें तो फिर यह तय करना जरूरी हो जाता है कि इन बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा।

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