कहीं नेता के लिए रुकी जनसुनवाई, कहीं फरियादी खुद विधायक को घर ले गई: अधूरे ब्रिज पर नारे और पंडितजी का बंगला भी चर्चा में
शिवपुरी में कलेक्टर जनसुनवाई कर रहे थे और आम लोग अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे हुए थे। इसी दौरान भाजपा जिला अध्यक्ष वहां पहुंचे। बताया गया कि कलेक्टर ने उनसे मुलाकात की और फिर जनसुनवाई के बीच ही उन्हें अपने केबिन में लेकर चले गए। कुछ देर बाद कलेक्टर वापस लौटे और लोगों की समस्याएं सुनने का सिलसिला फिर शुरू हुआ लेकिन तब तक यह दृश्य चर्चा में आ चुका था। सवाल यह उठने लगा कि यदि कोई आम व्यक्ति अपनी समस्या लेकर जनसुनवाई में पहुंचता है तो उसे अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है लेकिन किसी राजनीतिक पदाधिकारी के आने पर प्राथमिकता बदल क्यों जाती है। यह घटना भले कुछ मिनटों की रही हो लेकिन आम और खास के बीच व्यवहार के अंतर को लेकर बहस जरूर छेड़ गई।
इसके विपरीत गुना जिले में राघौगढ़ विधानसभा क्षेत्र के दौरे पर पहुंचे कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह के सामने एक बुजुर्ग महिला ने अपनी परेशानी सीधे रखी। महिला विधायक का हाथ पकड़कर उन्हें अपने घर तक ले गई और अपना अधूरा मकान दिखाया। उसने बताया कि घर में प्लास्टर और पुताई का काम अब तक पूरा नहीं हो पाया है। विधायक ने महिला को मदद और घर का काम पूरा कराने का भरोसा दिया। यह दृश्य राजनीति की तस्वीर के रूप में चर्चा में रहा लेकिन इसके पीछे एक बड़ा संदेश भी छिपा है कि जनता को अपने प्रतिनिधियों तक बिना डर और संकोच पहुंचने का अधिकार होना चाहिए। लोकतंत्र की असली खूबसूरती तभी है जब कोई आम नागरिक बेझिझक अपने जनप्रतिनिधि का हाथ पकड़कर अपनी परेशानी बता सके।
उधर इंदौर जिले के महू में अधूरे रेलवे ओवरब्रिज को लेकर राजनीतिक विरोध का अलग तरीका देखने को मिला। ब्रिज निर्माण में हो रही देरी से नाराज कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उसकी बाउंड्री पर सरकार नेता और ठेकेदार को निशाने पर लेते हुए नारे लिखवा दिए। काम की धीमी रफ्तार और विकास के नाम पर सवाल उठाते इन स्लोगन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गईं। इसके बाद प्रशासन ने बाउंड्री पर लिखे नारों को सफेद रंग से पुतवा दिया। कांग्रेस ने इसी मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन और कीर्तन भी किया। विपक्ष का तर्क है कि यदि निर्माण कार्य पूरा करने में भी उतनी ही तेजी दिखाई जाती जितनी नारों को मिटाने में दिखाई गई तो शायद विरोध की जरूरत ही नहीं पड़ती।
राजनीति के इन खुले दृश्यों के बीच भोपाल की अंदरूनी सियासत से जुड़ी चर्चा भी सुर्खियों में रही। खबर में एक ऐसे भाजपा नेता का जिक्र है जिन्हें पंडितजी के नाम से संबोधित किया गया है और जो विधायक या मंत्री न होने के बावजूद अपना सरकारी बंगला 2028 तक बचाने में सफल रहे हैं। चर्चा है कि बंगले को लेकर बदलाव की तैयारी थी लेकिन दिल्ली स्तर पर हस्तक्षेप के बाद मामला बदल गया। बंगला समाज सेवा के नाम पर आवंटित बताया जा रहा है जबकि राजनीतिक गलियारों में इसे भविष्य की सियासत के केंद्र के रूप में भी देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर मध्य प्रदेश की इन घटनाओं ने सत्ता राजनीति और प्रशासन की कई परतें खोल दी हैं। कहीं आम आदमी इंतजार करता दिखाई देता है और खास व्यक्ति को प्राथमिकता मिलती नजर आती है तो कहीं एक बुजुर्ग महिला सीधे अपने विधायक तक पहुंचकर अपनी समस्या बताती है। अधूरे विकास कार्यों पर विपक्ष नारे लिखकर सरकार को घेरता है और दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में बंगले बचाने की सियासत चलती है। यही राजनीति और व्यवस्था की वह तस्वीर है जिसमें सवाल भी हैं और उम्मीदें भी।
