#कालाढूंगी का ‘सियासी भूकंप’: एक पुराने नेता के प्रति आलाकमान का बदलता रुख और खत्म होता प्रभाव?
कालाढूंगी। उत्तराखंड की राजनीति के एक पुराने नेता का सियासी कद इन दिनों एक बड़े मोड़ पर खड़ा है। पार्टी सूत्र कुछ इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व और इन पुराने मजबूत नेता के बीच अब पहले जैसी बात नहीं रही। चर्चा है कि इन पुराने नेता द्वारा अपने ही सहयोगियों और पार्टी के नए दावेदारों के सहयोगियों को अपनी ओर (येन-केन-प्रकारेण) खीचने का प्रयास किया जा रहा है, जिसने आलाकमान को भी सकते में डाल दिया है।
क्या यह स्थिति बनेगी पतन का कारण?
राजनीतिक के जानकारों के अनुसार जैसे की क्षेत्र में चर्चा है कि एक मजबूत नेता एक पुराने भाजपा संगठन से जुड़े कार्यकर्ता जो उनके पुराने विरोधी भी हैं, के समर्थकों को तोड़ने और नए उभरते हुए चेहरों को अपने प्रभाव में लेने व उनके सहयोगियों को भी अपनी तरफ करने के लिए स्वयं को ही क्षेत्र की भाजपा बताने का प्रयास कर रहे हैं— तो उनकी ये चाल पार्टी नेतृत्व को रास नहीं आएगी। पार्टी के भीतर इसे ‘अनुशासनहीनता’ और ‘व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए गुटबाजी’ के रूप में देखा जाएगा।
दिल्ली-देहरादून के गलियारों में चर्चा
सूत्रों के अनुसार सामने आई इन चर्चाओं के बाद आलाकमान इस बात से बेहद नाराज लगते हैं कि एक वरिष्ठ नेता होने के बावजूद एक पुराना कद्दावर नेता पार्टी को एकजुट करने के बजाय अपनी अलग ‘समानांतर सत्ता’ खड़ा करने में लगा हुआ हैं।
भरोसे का संकट: बताया जाता है कि ये बातें सामने आने के बाद से शीर्ष नेतृत्व अब उन्हें ‘पार्टी का रक्षक’ नहीं, बल्कि ‘संगठनात्मक कमजोरी का कारण’ मानने लगेगा।
संगठनात्मक कार्रवाई की सुगबुगाहट: यह सूचनाएं सामने आने के बाद ऐसी चर्चाएं तेज हैं कि पार्टी ने भविष्य की रणनीति में इन पुराने कद्दावर नेता की भूमिका को सीमित करने का मन बना लिया है। ऐसे में उन्हें दरकिनार करने के संकेत पार्टी के आगामी कार्यक्रमों में भी मिल सकते हैं।
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इसका क्या असर होगा?
माना जा रहा है कि भाजपा संगठन से जुड़े एक पुराने कार्यकर्ता जो इस पुराने कद्दावर नेता के विरोधी भी हैं के समर्थकों को तोड़ने की कवायद ने पार्टी की वरिष्ठ इकाई के बीच यह संदेश दिया है कि ये पुराने कद्दावर नेता अब पार्टी की लक्ष्मण रेखा पार कर चुके हैं। जानकारों के अनुसार यदि पार्टी का कोई वरिष्ठ नेता अपने ही साथियों को ‘तोड़कर’ अपनी ताकत दिखाने का प्रयास करता है, तो इसे ‘पार्टी विरोधी गतिविधि’ माना जाता है। बताया जाता हे कि क्षेत्र में इस तरह की चर्चाओं ने इन पुराने कद्दावर नेता और आलाकमान के बीच के दूरी पैदा कर दी है, जो उन्हें परेशानी में डाल सकती है।
भविष्य पर सवाल
क्षेत्र में इस बात को लेकर भी चर्चा तेज बनी हुई है कि जिस तरह से इस पुराने मतबूत नेता के करीबी समर्थक उनसे दूर हो रहे हैं और नेतृत्व उनसे दूरी बना रहा है, यह स्पष्ट है कि कालाढूंगी की राजनीति अब एक नए युग की ओर बढ़ रही है।
पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि आने वाले समय में इन पुराने मजबूत नेता को अपनी ही पार्टी में अलग-थलग करने की तैयारी पूरी हो चुकी है। अब देखने वाली बात यह है कि क्या वे अपने पुराने संबंधों को बचा पाते हैं, या उनका यह दांव (अपनी ही पार्टी के दूसरे दावेदारों के समर्थको को अपनी ओर खीचने का) उन्हीं पर भारी पड़ जाएगा।
वहीं जब इस संबंध में क्षेत्र के उन मजबूत नेता/जनप्रतिनिधि से बातचीत करने की कोशिश की गई तो उनसे संपर्क नहीं हो सका।
