March 20, 2026

उत्तराखंड में संगठन बनाने में पिछडी भाजपा: कारण हार का डर या कुछ और…

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UK Bjp-Sagthan (2)
  • “उत्तराखंड में भाजपा संगठनात्मक मजबूती बनाने में पिछड़ रही है। 2027 चुनाव से पहले पार्टी की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं। क्या केवल मोदी फैक्टर से भाजपा जीत पाएगी? विपक्ष संगठन की कमजोरी को चुनावी हथियार बना रहा है, जबकि जनता बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय मुद्दों पर नाराज़ है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।”

  • लंगड़ी कार्यसमिति: कौन सा डर या दबाव कर रहा है बीजेपी को कमजोर

उत्तराखंड में पिछले कुछ सालों में हुई विभिन्न अप्रिय घटनाओं के चलते भाजपा कमजोर होती दिख रही है। वहीं यह भी माना जा रहा है कि कुछ पूराने व मजबूत नेताओं का दबाव पार्टी को असहज महसूस करा रहा है।

भाजपा के उत्तराखंड संगठन की बात करें तो इसके पदाधिकारियों की तो काफी समय पहले ही घोषणा हो चुकी है, लेकिन प्रदेश के विधानसभा चुनाव में ज्यादा समय न होने के बावजूद पार्टी अब तक प्रदेश कार्यसमिति के सदस्यों की घोषणा नहीं कर सकी है।

जानकारों का भी मानना है कि पार्टी की ये स्थिति कहीं न कहीं उसकी कमजोरी की ओर इशारा कर रही है। ज्ञात हो कि संगठन में पदाधिकारी व सदस्य ही पूर्ण कार्यसमिति का निर्माण करते हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि अब तक केवल पदाधिकारियों की घोषणा के चलते एक लंगड़ी कार्यसमिति क्या कुछ ही कर पाएगी। ऐसे में यह भी सवाल उठता है कि क्या भाजपा का यह आधा अधूरा संगठन पार्टी को 2027 के उत्तराखंड चुनाव में जीत दिला पाएगा।

वहीं अंदरखाने से ये बातें भी सुनने का आ रही हैं कि कुछ पुराने खांटी नेता अपनी सीट पर खतरा भांपते हुए, जानबुझकर संगठन के निर्माण में अडंगा अड़ा रहे हैं। ताकि कोई अन्य मजबूत उनके विरुद्ध ताल न ठोक दे।

Will BJP's half-baked organization be able to secure a victory for the party in the 2027 Uttarakhand elections?

दरअसल पार्टी के कुछ पुराने नेताओं को इस बार अपनी सीट कटती हुई महसूस हो रही है। ऐसे में किसी कार्यकर्ता के सदस्य के रूप में आना उसके कद में वृद्धि करेगा, जिससे वह पुराने नेता के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। और कद में वृद्धि के बाद उसका बेहतरीन कार्य करना उनके लिए बड़ी परेशानी वाला हो सकता है। इसी को देखते हुए वे किसी को आगे आने से ही रोक रहे हैं।

ऐसे में जहां इस बार पार्टी पहले की भांति जीत के प्रति पूरी तरह से संतुष्ट नहीं है, वहीं ये नेता यह अच्छी तरह जानते हैं कि जब पार्टी के लिए हर सीट अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाएगी और एक एक सीट से सरकार बनने और गिरने की बात हो जाएगी तो मजबूरन एक बार फिर इन्हें की टिकट देने की मजबूरी पार्टी के सामने होगी और उनका टिकट बच जाएगा। इसके अलावा चर्चा यह भी है कि इस बार यदि पार्टी हरती भी है तो एक पर ही इसका ठिकरा फोड़ा जाए, जिससे अन्य नेता बच जाएं। और जिस पर ठिकरा फोड़ा जाए उसे संतुष्ट किया जा सके कि चिंता मत करना हम हर हाल में तुम्हारा हार के बाद भी साथ देंगे।

कुल मिलाकर पार्टी की हार की चिंता के बीच खुद को बचाने के लिए ही संगठन की घोषणा करने से बचा जा रहा है। जानकारों के अनुसार इसका कारण यह भी है कि शायद पार्टी यह भी मान रही है कि सदस्यों के चयन में यदि कोई ऐसा व्यक्ति छूट जाता है जो सदस्य बनना चाहता है तो वहं नाराज होकर पार्टी को ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है।

ऐसे में अभी लंबे समय तक सदस्य बनने की आशा का लालीपॉप दिखा कर कार्यकर्ताओं को लटकाए रखो। ताकि बाद में जिनका चयन न हो वे ज्यादा डेमेज न कर सके। जबकि स्थिति ये है कि पार्टी को लोगों से जोड़ने का कार्य सबसे ज्यादा यही सदस्य करते हैं, ऐसे में चुनाव के इतने पास आ जाने तक उनका चयन नहीं होना कहीं न कहीं पार्टी के लिए ही नुकसान दायक होगा।

यहां तक कुछ सूचनाएं आ रही हैं कि कुछ कार्यकर्ता अब तक कार्यसमिति के सदस्यों की घोषणा न होने से नाराज होकर पार्टी का समर्थन करना ही बंद कर चुके हैं। यहां तक की वे अपने क्षेत्र के नेता की पोल व कुछ कारगुजारियां भी क्षेत्र के लोगों के साथ साझा कर रहे हैं।

Uttarakhand: भाजपा में दबाव का खेल शुरु, चुनाव से पहले ही परिवारवाद का चेहरा आया सामने

जानकारों के अनुसार कार्यकर्ताओं में पार्टी के विरुद्ध गहराता अविश्वास पार्टी के लिए आगामी चुनाव में बड़ी परेशानी का कारण बन सकता है।

कुल मिलाकर पार्टी के संगठन की यह स्थिति साफ तौर से संगठन संभाल रहे पदाधिकारियों की कमजोरी को प्रदर्शित करती है। तभी तो शायद दबाव या किसी लालच में आकर अथवा ऐसे ही कुछ कारणों के चलते चुनाव इतने पास आने के बावजूद अब तक पूरी सूची तक जारी नहीं की जा सकी है।

साजिश तो नहीं…

वहीं दूसरा पक्ष यह भी है कि जैसा माना जाता रहा है कि अंतत: जनता वोट तो मोदी के नाम पर ही देती है। ऐसे में ये भी संभावना दर्शाई जा रही है कि जैसे पूर्व में कुछ नेताओं के विदेशी आकाओं के हाथों बिकने की बात आई थी, मुमकिन है ऐसे में वे, यदि भाजपा को उत्तराखंड में हार का सामना करना पड़ा तो- इसका ठीकरा मोदी पर फोड़ने की कोशिश करेंगे और कहेंगे कि अब मोदी का जादू काम नहीं कर रहा है। शंका जताई जा रही है कि यही नेता कार्यसमिति के सदस्यों की सूची जारी न किए जाने का दबाव बना रहे हैं। जिससे कार्यकर्ताओ में असंतुष्टी पैदा हो और जब चुनाव की बात आए तो उनका टिकट पुन: उन्हीं देने के लिए पार्टी को विवश होना पड़े।

 

“उत्तराखंड में भाजपा की संगठनात्मक कमजोरी: 2027 चुनाव में मोदी फैक्टर पर निर्भरता”

BJP lagging in building organization in Uttarakhand: Fear of defeat or something else…

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