April 23, 2026

वैश्विक आपूर्ति बाधाओं से भारत में महंगाई का खतरा, दूसरे दौर के प्रभावों पर गहरी नजर

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नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वैश्विक अनिश्चितताओं और भू राजनीतिक तनावों के बीच देश की मौद्रिक नीति को लेकर बेहद सतर्क और संतुलित रुख अपनाने की बात कही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में केंद्रीय बैंक किसी भी प्रकार के जल्दबाजी वाले निर्णय से बच रहा है और आगे की दिशा आर्थिक आंकड़ों और जोखिमों के विस्तृत आकलन के आधार पर तय की जाएगी। उन्होंने इसे वेट एंड वॉच की स्थिति बताया और कहा कि मौजूदा समय में स्थिरता बनाए रखना प्राथमिकता है।

अपने एक अंतरराष्ट्रीय संबोधन में उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था पर बाहरी दबावों और वैश्विक घटनाक्रमों के संभावित प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व में जारी तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा और अप्रत्यक्ष प्रभाव भारत की आर्थिक संरचना पर भी पड़ सकता है क्योंकि इस क्षेत्र की भूमिका भारत के व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और विदेशी आय के प्रवाह में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने आंकड़ों के माध्यम से बताया कि पश्चिम एशिया भारत के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार क्षेत्र है, जो देश के निर्यात का बड़ा हिस्सा, आयात का महत्वपूर्ण भाग और कच्चे तेल की आपूर्ति का लगभग आधा हिस्सा उपलब्ध कराता है। इसके साथ ही उर्वरक आयात और विदेशी रेमिटेंस में भी इस क्षेत्र का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने संकेत दिया कि इस तरह की गहरी आर्थिक निर्भरता के कारण किसी भी प्रकार की आपूर्ति बाधा का प्रभाव व्यापक स्तर पर देखने को मिल सकता है।

आरबीआई गवर्नर ने विशेष रूप से दूसरे दौर के प्रभावों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक आपूर्ति व्यवधान यदि लंबे समय तक बने रहते हैं तो उनका असर धीरे धीरे कीमतों और उत्पादन लागत पर फैल सकता है, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ने की संभावना रहती है। इस प्रकार की स्थिति केवल अस्थायी नहीं होती बल्कि आर्थिक संतुलन को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती है।

मौद्रिक नीति को लेकर उन्होंने दोहराया कि केंद्रीय बैंक वर्तमान में तटस्थ रुख बनाए हुए है और हाल के महीनों में की गई ब्याज दरों में कटौती के बाद अब स्थिति का गहन मूल्यांकन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मौद्रिक नीति समिति पूरी तरह डेटा आधारित दृष्टिकोण अपनाती है और बदलते आर्थिक संकेतकों के अनुसार लगातार जोखिमों का पुनर्मूल्यांकन करती रहती है ताकि नीति निर्णय संतुलित और प्रभावी बने रहें।

डिजिटल अर्थव्यवस्था के संदर्भ में उन्होंने देश में बढ़ते डिजिटल लेनदेन की सराहना की और बताया कि यूनिफाइड पेमेंट सिस्टम के माध्यम से लेनदेन में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है, जो भारत की डिजिटल प्रगति को दर्शाता है। उन्होंने यह भी बताया कि एक नए डिजिटल लोन सिस्टम पर काम चल रहा है जिसका उद्देश्य छोटे किसानों और छोटे व्यवसायों को त्वरित और आसान ऋण उपलब्ध कराना है।

वित्तीय अनुशासन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि देश का राजकोषीय घाटा पिछले वर्षों की तुलना में लगातार कम हुआ है, जो आर्थिक प्रबंधन में सुधार का संकेत है। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि सरकारी ऋण अनुपात में भी धीरे धीरे सुधार देखा जा रहा है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को मजबूती मिलती है।

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