कालाढूंगी ग्राउंड रिपोर्ट 2027: संगठन में पकड़ से लेकर जनता में पकड़ तक… जानिए किस दावेदार में कितना है दम!
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कालाढूंगी विधानसभा चुनाव 2027: बीजेपी दावेदार, ग्राउंड सर्वे और राजनीतिक समीकरण | पढ़ें पूरी खबर…
एक तरफ जहां जिम कॉर्बेट के पुराने बंगलों और घने जंगलों की ओट से सर्दी के दस्तक देते ही ठंडी हवाएं धीरे-धीरे शुरू हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ नैनीताल जिले की कालाढूंगी विधानसभा सीट का सियासी तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव भले ही दूर हों, लेकिन चाय की टपरियों से लेकर आम के बगीचों तक, अभी से ‘चुनावी शिकार’ की बिसात बिछाई जा चुकी है।
2027 का नया दंगल: भाजपा के दावेदार
1. सुरेश भट्ट
सुरेश भट्ट संगठन के कद्दावर नेता माने जाते हैं, ऐसे अचानक उनका टिकट कटता हुआ कम ही दिखता है, क्योंकि उन्हें संगठन का पूरा सपोर्ट हासिल है। हालांकि, लंबे समय तक संगठन के कार्यों के चलते क्षेत्र से बाहर रहने के कारण वे कालाढूंगी में ज्यादा समय नहीं बिता सके। इसी वजह से क्षेत्र में उनकी पकड़ सीमित है और कई लोग उन्हें चेहरे से तक नहीं जानते हैं। ऐसे में जहां अभी वे अपनी इसी ज़मीनी पकड़ को लेकर जूझ रहे हैं। वहीं अपनी मौजूदगी को मजबूत करने के लिए वे इन दिनों लगातार लोगों से मेल-जोल बढ़ा रहे हैं। वे क्षेत्र में पार्टी से जुड़े सभी लोगों से काफी हद तक जुड़े हुए हैं।
कालाढूंगी में जन्मे सुरेश भट्ट के बारे में क्षेत्र के लोग (जो उन्हें व उनके बारे मे जानते हैं) और उनके विरोधी भी यह स्वीकार करते हैं कि वे राज्य स्तर पर नहीं बल्कि संगठन की सेंट्रल कमेटी यानी दिल्ली तक जाने में पूरी तरह सक्षम हैं। उनको पहचानने वाले स्थानीय लोगों का तो यहां तक मानना है कि उन्हें संगठन में दिल्ली स्तर की जिम्मेदारी में होना चाहिए ताकि वे विधायकों से ऊपर बैठकर पूरी नीतियों और क्रियान्वयन को दिशा दे सकें।
2. गुंजन तिवारी
कालाढूंगी के युवाओं के बीच गुंजन तिवारी को लेकर जबरदस्त क्रेज देखने को मिल रहा है। युवा वर्ग एकजुट होकर उनके साथ ही आगे बढ़ना चाहता है। वहीं क्षेत्र की महिला आबादी में भी उनकी मजबूत पकड़ है, क्योंकि उनका आक्रामक नशा-विरोधी अभियान व स्कालरशिप अभियान परिवारों को सुरक्षित रख रहा है। इसके अलावा बुजुर्गों में भी उनकी लोकप्रियता बनी हुई है, क्योंकि युवाओं को उनके द्वारा दिए जाने वाले ब्याज-मुक्त ऋण के कारण बच्चों को रोजगार के लिए बाहर पलायन नहीं करना पड़ रहा है। इसके साथ ही इनकी एक खासियत ये भी है कि इनका किसी भी नेता से विरोध या खराब समीकरण नहीं है तभी ये क्षेत्र के अधिकांश नेताओं (बंसीधर भगत, गजराज बिष्ट, सुरेश भट्ट) के साथ कई बार मंच साझा करते दिख जाते हैं।
तमाम लोकप्रियता के बावजूद गुंजन तिवारी के साथ मुख्य समस्या यह है कि कॉरपोरेट जगत से आने के कारण वे अंद्रुनी खाने की राजनीति से ज्यादा परिचित नहीं हैं। ऐसे में राजनीति के कुछ जानकारों का मानना है कि संगठन के भीतर अपनी पकड़ मजबूत करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती मानी जा रही है।
3. मनोज पाठक
संगठन से जुड़े रहे मनोज पाठक की कुछ जगहों पर पकड़ सामान्य से अच्छी मानी जाती है और वे लंबे समय से क्षेत्र में खुद को बनाए हुए हैं। लेकिन वे वर्तमान विधायक बंशीधर भगत के धुर विरोधी के रूप में जाने जाते हैं और युवाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए क्षेत्र में कई लाइब्रेरीज भी संचालित करते हैं।
जानकारों के अनुसार भगत के विरोधी के रूप मे पहचाने जाने चलते एक निश्चित वर्ग का उनसे हाथ खींच लेना स्वाभाविक सा लगता है।
4. गजराज सिंह बिष्ट
हल्द्वानी के मेयर गजराज बिष्ट भी कालाढूंगी विधानसभा सीट से भाजपा के एक प्रत्याशी के रूप में देखे जा सकते हैं। संगठन में उनकी अच्छी पकड़ और बिठोरिया में भी जहां उनके पक्ष में अच्छा माहौल तो है, वहीं विधनसभा के कई क्षेत्रों में लोगों द्वारा उनकी पकड़ काफी कमजोर बताई जाती है। ऐसे में उनकी जीत को लेकर लोग आश्वस्थ नहीं हैं, जबकि कुछ लोग उनकी हार की गारंटी देने को तैयार हैं। हालांकि ये जरूर है कि वे एक अत्यंत कमजोर प्रत्याशी नहीं होंगे। लेकिन, इस पूरे समीकरण में भाजपा के लिए सबसे बड़ा पेच हल्द्वानी का मेयर पद है।
पार्टी किसी भी हाल में हल्द्वानी के मेयर की कुर्सी दांव पर लगाने का जोखिम नहीं लेना चाहेगी, क्योंकि गजराज सिंह बिष्ट को विधानसभा में उतारना यानी हल्द्वानी में दोबारा मेयर चुनाव कराना—जहां वर्तमान परिस्थितियों में यह मेयर की सीट दोबारा भाजपा के खाते में आती नहीं दिख रही है। राजनीति के विशेषज्ञों के अनुसार यही कारण है कि मजबूत सांगठनिक आधार के बावजूद भाजपा नेतृत्व उन्हें कालाढूंगी में उतारने से पहले अपने निकाय गढ़ को गंवाने के खतरे का खेल नहीं खेलना चाहेगा।
बंशीधर भगत: जनता का गुस्सा और टिकट पर संकट
वर्तमान विधायक बंशीधर भगत को लेकर क्षेत्र में कई जगह टिकट कटने / टिकट मिलने में संदेह- की जोर-शोर से चर्चा है, जिसका मुख्य कारण जनता द्वारा किया जा रहा तीखा विरोध बताया जा रहा है।
क्षेत्र में विज़न/इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी, जल जीवन मिशन में देरी और बजट की कमी बताकर मोदी सरकार पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाने के कारण लोग उनसे नाराज हैं। इसके अलावा, “मैं नहीं तो मेरा पुत्र” का रुख अपनाकर परिवारवाद को बढ़ावा देने की कोशिशों से भी आम जनता और समर्थक बेहद खफा हैं, जिससे उनके समर्थकों भी छिटकने की बात भी सामने आ रही हैं।
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वहीं लोगों का तो यहां तक कहना है कि पिता से नाराजगी के चलते ही कई लोग बेटे (विकास भगत) से भी नाराज है, इसके अलावा कई ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का कहना है कि हमने आज तक उन्हें देखा ही नहीं है।
कांग्रेस और बागी फैक्टर
नीरज तिवारी: जमीनी मुद्दों को आक्रामक तरीके से उठाने वाले विकास तिवारी कांग्रेस की तरफ से मुख्य दावेदार के रूप में डटे हुए हैं। लोगों के अनुसार क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी क्षेत्र में एक निश्चित पकड़ हैं। वहीं इनका प्रभाव अभी संगठनात्मक और विरोध-आंदोलनों तक अधिक सीमित दिखाई देता है।
विशाल सिंह भोजक: उत्तराखंड युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष विशाल सिंह भोजक पूरे उत्तराखंड में संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़े रहते हैं, इनकी पहचान एक सक्रिय नेता के रूप में है। साथ ही युवा चेहरा होने के चलते युवाओं में इन्हें लेकर कुछ हद तक दिलचस्पी भी है। क्षेत्र में इनको लेकर कोई लहर या लोगों में अत्यंत खुशी जैसा कोई माहौल नहीं दिखता। यहां तक तो कई लोग इनके नाम तक को पहले कभी सुने जाने से इनकार करते हैं।
बागी फैक्टर: वहीं ये भी चर्चा है कि कांग्रेस के भीतर अंदरूनी कलह और असंतोष के चलते बागी नेता गुप्त बैठकों के जरिए ऐन वक्त पर चुनाव का रुख बदलने की ताकत रखते हैं।
उत्तराखंड क्रांति दल: पुराने नेता लेकिन, भाजपा के गढ़ में
उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) से कालाढूंगी में तारा सिंह नेगी तालठोकते दिख रहे हैं। कांग्रेस से उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) में समर्थकों के साथ शामिल हुए नेगी क्षेत्र में सक्रिय हैं। पूर्व जिला पंचायत उपाध्यक्ष नेगी की मुख्य रूप से क्षेत्र के कुछ ग्रामीण इलाकों में अच्छी पकड़ है। वह लंबे समय से जमीनी राजनीति में सक्रिय रहे हैं।
चुकिं कालाढूंगी सीट पर मुख्य मुकाबला पारंपरिक रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच रहता है, ऐसे में तीसरे विकल्प के रूप में अपनी जगह बनाना उनके लिए बड़ी चुनौती है। क्षेत्र में कई लोग उन्हें दल बदल वाला नेता भी कहते हैं। इसके अलावा क्षेत्र मे कांग्रेस और भाजपा की स्थिति हमेशा ही अच्छी रहने के चलते यहां से चुनाव लड़ना तारा सिंह नेगी के लिए एक कठिन परीक्षा होगी।
