यूपी के विकास प्राधिकरणों में रिश्वतखोरी के आरोपों से मचा हड़कंप, गोरखपुर में कर्मचारी निलंबित, लखनऊ में 5 सदस्यीय जांच कमेटी गठित
गोरखपुर विकास प्राधिकरण में लिपिक निर्मल सिंह के खिलाफ कार्रवाई 20 अक्टूबर को दैनिक भास्कर में स्टिंग ऑपरेशन प्रकाशित होने के बाद की गई। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि नक्शा पास कराने और निर्माण संबंधी कामों के लिए लोगों से पैसे मांगे जाते थे। मामले का संज्ञान लेते हुए प्राधिकरण के उपाध्यक्ष अभिनव गोपाल ने निर्मल सिंह को निलंबित कर दिया और आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की। विशेष कार्याधिकारी संजीव कुमार दीक्षित को कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है। कमेटी को तीन दिन में अपनी रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। रिपोर्ट के आधार पर आरोपों की समीक्षा होगी और नियमानुसार विभागीय कार्रवाई की जाएगी। आरोपी लिपिक को लेकर अलग से आरोपपत्र जारी करने की भी तैयारी है।
निर्मल सिंह गोरखपुर विकास प्राधिकरण में मृतक आश्रित कोटे से नौकरी पर आया था और कर्मचारी संयुक्त परिषद का अध्यक्ष भी रह चुका है। उस पर आरोप है कि वह अधिकारियों से नजदीकी और संगठन में अपनी सक्रियता का इस्तेमाल कर नक्शा पास कराने अवैध निर्माण से जुड़े कामों और आवासीय योजनाओं में फ्लैट आवंटन के नाम पर लोगों से पैसे लेता था। इसके अलावा पत्रकारपुरम और वसुंधरा एन्क्लेव में करीबियों के नाम पर फ्लैट लेकर मुनाफे में बेचने के आरोप भी सामने आए हैं। इन आरोपों की वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
दूसरी ओर लखनऊ विकास प्राधिकरण ने भी अपने अधिकारी और कर्मचारी से जुड़े वायरल ऑडियो वीडियो की जांच शुरू कर दी है। प्राधिकरण के उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार ने 21 अक्टूबर को पांच सदस्यीय जांच कमेटी गठित की। अपर सचिव ज्ञानेंद्र वर्मा को इसका अध्यक्ष बनाया गया है। कमेटी में प्रभारी अधिकारी अधिष्ठान ओएसडी आईटी देवांश त्रिवेदी अधिशासी अभियंता मनोज सागर और लेखाधिकारी विनोद श्रीवास्तव को शामिल किया गया है। विनोद श्रीवास्तव को सदस्य संयोजक की जिम्मेदारी दी गई है। कमेटी को सात दिन के भीतर रिपोर्ट सौंपनी है। जांच में जूनियर इंजीनियर राहुल प्रताप विश्वकर्मा और जोनल अधिकारी मान सिंह से जुड़े वायरल ऑडियो वीडियो की पड़ताल की जाएगी।
दैनिक भास्कर की इन्वेस्टिगेशन टीम ने विकास प्राधिकरणों में कथित रिश्वतखोरी और निर्माण संबंधी अनियमितताओं की पड़ताल के लिए खुफिया कैमरे से बातचीत रिकॉर्ड की थी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि नक्शा और निर्माण संबंधी काम कराने के बदले पैसे मांगने की बातचीत सामने आई। इसके बाद यह सवाल उठा कि नियमों के तहत होने वाले सरकारी कामों के लिए आवेदकों से कथित तौर पर रकम क्यों मांगी जा रही है और ऐसी गतिविधियों पर विभागीय निगरानी कितनी प्रभावी है।
अब दोनों प्राधिकरणों की जांच कमेटियों के सामने वायरल रिकॉर्डिंग की सत्यता और बातचीत की परिस्थितियों की जांच करना महत्वपूर्ण होगा। साथ ही यह पता लगाना होगा कि क्या किसी सरकारी काम के बदले रिश्वत मांगी गई और क्या इस मामले में अन्य कर्मचारी या अधिकारी भी शामिल हैं। फिलहाल गोरखपुर में निलंबन और लखनऊ में जांच की कार्रवाई की गई है। अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट और संबंधित विभागों की आगे की कार्रवाई के बाद ही सामने आएंगे।
