हेडलाइन विकल्प 3: MP में मुफ्त रजिस्ट्री की तैयारी के बीच पटवारियों ने उठाए सवाल ड्रोन सर्वे से लेकर कब्जे तक विवाद हुआ तो फंसेंगे कर्मचारी
पटवारी संवर्ग का तर्क है कि आबादी भूमि का मामला केवल खसरा और नक्शे तक सीमित नहीं है। कई मामलों में वास्तविक कब्जे के साथ वारिसों का दावा सह स्वामित्व चतुर्सीमा पुराने दस्तावेज और न्यायालय में चल रहे विवाद जैसे पहलू भी सामने आ सकते हैं। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति ने भविष्य में जारी किए गए स्वामित्व अभिलेख को चुनौती दी तो दस्तावेज में निष्पादक के तौर पर दर्ज पटवारी भी कानूनी प्रक्रिया में उलझ सकता है। यही वजह है कि पटवारी इस भूमिका को लेकर स्पष्ट व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।
स्वामित्व योजना में ड्रोन सर्वे की भी अहम भूमिका रही है। गांवों के आबादी क्षेत्रों का ड्रोन सर्वे कर नक्शे और आकृतियां तैयार की गईं। इसके बाद इन अभिलेखों को जमीन की वास्तविक स्थिति से मिलाने का काम स्थानीय स्तर पर किया गया। पटवारियों का कहना है कि उन्होंने गांवों में जाकर चूना डालने से लेकर मकानों और कब्जे की स्थिति दर्ज करने तक कई स्तर पर काम किया। पड़ोसियों के बीच सीमा विवाद होने पर मौके की रिपोर्ट तैयार करना और पुराने राजस्व रिकॉर्ड से नए ड्रोन नक्शे का मिलान करना भी प्रक्रिया का हिस्सा रहा।
पटवारियों के मुताबिक ड्रोन सर्वे के बाद तैयार नक्शों में कई जगह विसंगतियां सामने आईं। इन्हें सुधारने और अधिकार अभिलेख तैयार कराने में भी पटवारियों ने भूमिका निभाई। अब उनका सवाल है कि यदि मूल सर्वे में कोई गलती रह गई और उसी आधार पर भविष्य में किसी परिवार के स्वामित्व पर विवाद खड़ा हुआ तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी। उनका कहना है कि सहायक और सत्यापनकर्ता की भूमिका निभाने वाले कर्मचारी को रजिस्ट्री का निष्पादक बनाना अलग तरह की कानूनी जिम्मेदारी पैदा कर सकता है।
पटवारी संवर्ग ने पंजीयन से पहले गांवों में अधिकार अभिलेखों का सार्वजनिक सत्यापन कराने की मांग रखी है। इसके लिए मुनादी कराने के साथ सार्वजनिक सूचना जारी करने और शिविर लगाने का सुझाव दिया गया है। पटवारियों का कहना है कि ग्रामीणों को उनके नाम और संपत्ति से जुड़े अभिलेख देखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को आपत्ति है तो उसे सुधार या दावा पेश करने का समय दिया जाए। आपत्तियों के निराकरण के बाद ही अंतिम रजिस्ट्री की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जानी चाहिए।
पटवारियों का यह भी कहना है कि दस्तावेज में निष्पादक के रूप में मध्य प्रदेश शासन की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। उनका सुझाव है कि जरूरत के अनुसार ग्राम पंचायत को भी प्रक्रिया में अधिकृत किया जा सकता है जबकि पटवारी को राजस्व रिकॉर्ड और मौके के सत्यापन तक सीमित रखा जाए। उनके अनुसार योजना को जमीन पर उतारने में वे पूरा सहयोग करेंगे लेकिन ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं की जा सकती जिसमें सरकारी प्रक्रिया की भविष्य की व्यक्तिगत कानूनी जिम्मेदारी कर्मचारी पर आ जाए।
योजना से जुड़े प्रावधानों के मुताबिक निष्पादक या अधिकृत अधिकारी के रूप में तहसीलदार और राजस्व अनुविभागीय अधिकारी की भूमिका तय है। अधिकार अभिलेख पर अंतिम हस्ताक्षर भी तहसीलदार द्वारा किए जाते हैं। वहीं ड्रोन सर्वे और नक्शे तैयार करने की प्रक्रिया में सर्वे ऑफ इंडिया और पंचायत विभाग की भूमिका बताई गई है। पटवारी मौके की स्थिति कब्जे सीमाओं और पुराने राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर रिपोर्ट उपलब्ध करा सकता है।
पटवारी संवर्ग का कहना है कि उनके पास न्यायिक शक्तियां नहीं हैं। इसलिए स्वामित्व विवादों पर अंतिम निर्णय लेने वाली भूमिका उन्हें देना नियमों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। अब सरकार के सामने चुनौती यह है कि योजना का लाभ लाखों परिवारों तक पहुंचाने के साथ कर्मचारियों की कानूनी जवाबदेही को लेकर उठ रही चिंताओं का भी समाधान किया जाए।
