शराब टेंडर में मिलीभगत की जांच जारी रख सकेगा CCI: हाईकोर्ट ने डिस्टिलरीज की याचिकाएं खारिज कर अंतरिम रोक हटाई
मामला वर्ष 2012-13 से 2016-17 के बीच हुए देशी शराब के सरकारी टेंडरों से जुड़ा है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की वर्ष 2016-17 की ऑडिट रिपोर्ट में अलग-अलग डिस्टिलरीज की बोलियों के बीच बेहद कम अंतर होने पर सवाल उठाए गए थे। इसके बाद CCI ने वर्ष 2020 में मामले की जांच शुरू की। जांच के दौरान आबकारी विभाग के अधिकारियों के बयान दर्ज किए गए और संबंधित डिस्टिलरीज के परिसरों की तलाशी भी ली गई।
जांच में एमपी डिस्टिलर्स एसोसिएशन नाम के WhatsApp ग्रुप से जुड़े रिकॉर्ड ईमेल और अन्य डिजिटल सामग्री मिलने की बात सामने आई। महानिदेशक स्तर पर की गई जांच के बाद 1200 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट CCI को सौंपी गई। इसके बाद एसोसिएटेड अल्कोहल्स ग्रेट गैलियन ओएसिस डिस्टिलरीज समेत कुछ कंपनियों ने CCI की कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
कंपनियों की ओर से दलील दी गई कि शराब का पूरा कारोबार राज्य सरकार और आबकारी विभाग के नियंत्रण में है। लाइसेंस उत्पादन आपूर्ति कीमत और कोटा जैसी व्यवस्थाएं सरकार निर्धारित करती है। ऐसे में प्रतिस्पर्धा कानून के तहत CCI को इस मामले की जांच करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। आबकारी विभाग की ओर से भी इसी तरह का पक्ष रखा गया और बताया गया कि डिस्टिलरीज का मुनाफा भी निर्धारित सीमा में रहता है।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि आबकारी कानून के तहत शराब कारोबार पर सरकारी नियंत्रण होने से CCI के अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। आबकारी विभाग की भूमिका नियामकीय व्यवस्था तक है जबकि कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा विरोधी गतिविधियों की जांच का सवाल अलग है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि CAG की रिपोर्ट को अंतिम सबूत नहीं माना गया है। रिपोर्ट केवल जांच शुरू करने का आधार बनी और इसके बाद CCI के महानिदेशक ने स्वतंत्र रूप से दस्तावेजों और अन्य सामग्री की जांच की।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि कंपनियों ने CCI के शुरुआती आदेश को उसी समय चुनौती नहीं दी थी और जांच प्रक्रिया में सहयोग करती रहीं। महानिदेशक की रिपोर्ट सामने आने के बाद हाईकोर्ट का रुख किया गया। अब CCI जांच रिपोर्ट और उपलब्ध दस्तावेजी व डिजिटल सामग्री के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगा। संबंधित कंपनियों को अपना पक्ष रखने का अवसर भी मिलेगा।
मामले में अंतिम निर्णय आने के बाद यदि कोई पक्ष CCI के आदेश से असहमत होता है तो उसके पास NCLAT में अपील करने का कानूनी विकल्प रहेगा। इस तरह हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब मध्य प्रदेश के देशी शराब टेंडरों में कथित मिलीभगत से जुड़े मामले की जांच का रास्ता साफ हो गया है।
