सरकारी फाइलों पर नहीं चलेगी लेटलतीफी, MP में नए कानून से अफसरों की जवाबदेही होगी तय
अब तक कारोबार या उद्योग शुरू करने के लिए अलग अलग विभागों से एनओसी और मंजूरियां लेने में लोगों को काफी समय लग जाता था। कई बार फाइल एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय और एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमती रहती थी। नए कानून के तहत इस प्रक्रिया को डिजिटल सिंगल विंडो सिस्टम से जोड़ने की कोशिश की गई है ताकि आवेदन और मंजूरी की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन तरीके से आगे बढ़े और आवेदक को बार बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें।
इस व्यवस्था में समय सीमा को सबसे महत्वपूर्ण बनाया गया है। उदाहरण के लिए यदि किसी अधिकारी को किसी आवेदन पर 15 दिन के भीतर निर्णय लेना है और वह तय अवधि में कोई कार्रवाई नहीं करता है तो अगले दिन यानी 16वें दिन आवेदन स्वतः उसके वरिष्ठ अधिकारी के डिजिटल डेस्क पर पहुंच सकता है। इससे फाइल रोकने वाले अधिकारी के हाथ से उस आवेदन पर निर्णय लेने का अधिकार हट जाएगा और मामला उच्च स्तर पर चला जाएगा। साथ ही देरी का रिकॉर्ड भी डिजिटल सिस्टम में दर्ज रहेगा।
नए कानून की धारा 13 में ऑटो एस्कलेशन का प्रावधान किया गया है। इसके तहत निर्धारित समय सीमा के भीतर आवेदन का निपटारा नहीं होने पर मामला विभाग के अगले उच्चतर प्राधिकारी के पास स्वतः भेजे जाने की व्यवस्था है। इसका सीधा उद्देश्य सरकारी कामकाज में देरी को कम करना और अधिकारियों को समय पर फैसला लेने के लिए जवाबदेह बनाना है।
नए प्रावधानों में आवेदक को बार बार आपत्ति या नई जानकारी के नाम पर परेशान करने पर भी रोक लगाने की कोशिश की गई है। धारा 12 के अनुसार अधिकारी आवेदन मिलने के बाद निर्धारित अवधि में अतिरिक्त जानकारी मांग सकता है और प्रक्रिया में बार बार नए सवाल खड़े करने की गुंजाइश सीमित की गई है। इसका मकसद यह है कि यदि किसी आवेदन में कमी है तो उसे स्पष्ट रूप से बताया जाए और आवेदक के कमी दूर करने के बाद फाइल अनावश्यक रूप से दोबारा न रोकी जाए।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा असर अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही पर पड़ सकता है। कानून के तहत यदि कोई सक्षम अधिकारी या कर्मचारी निर्धारित समय सीमा में मंजूरी या आवेदन का निपटारा करने में विफल रहता है तो उस पर मध्यप्रदेश लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम 2010 के प्रावधानों के अनुसार जुर्माना लगाया जा सकता है। खास बात यह है कि जिम्मेदारी संबंधित अधिकारी या कर्मचारी की व्यक्तिगत होगी। यानी देरी के लिए विभाग को जिम्मेदार मानकर मामला खत्म नहीं होगा बल्कि संबंधित अधिकारी पर भी कार्रवाई हो सकती है।
लोक सेवा गारंटी व्यवस्था में तय समय सीमा में सेवा नहीं देने पर अधिकारी या कर्मचारी पर प्रतिदिन के आधार पर जुर्माने का प्रावधान है। इससे सरकारी कामकाज में लापरवाही करने वाले अधिकारियों पर आर्थिक जवाबदेही भी तय हो सकती है। हालांकि किसी मामले में जुर्माना लगेगा या नहीं और उसकी प्रक्रिया क्या होगी यह संबंधित कानून और निर्धारित नियमों के अनुसार तय किया जाएगा।
अधिनियम में सरकारी विभागों से मिलने वाली मंजूरियों को अधिक व्यवस्थित तरीके से एकीकृत करने की दिशा में भी प्रावधान किए गए हैं। इसके तहत राज्य स्तर पर नोडल एजेंसी के माध्यम से मंजूरी प्रक्रिया को संचालित करने की व्यवस्था बनाई जा रही है। इसका उद्देश्य उद्योग और व्यापार से जुड़े आवेदनों को अलग अलग विभागों की जटिल प्रक्रिया में उलझने से बचाना है।
कुल मिलाकर सरकार की नई व्यवस्था का मकसद यही है कि कारोबारियों और निवेशकों की फाइलें अनिश्चित समय तक सरकारी टेबल पर न पड़ी रहें। डिजिटल ट्रैकिंग ऑटो एस्कलेशन और व्यक्तिगत जवाबदेही के जरिए अधिकारियों पर समय पर निर्णय लेने का दबाव बढ़ेगा। यदि व्यवस्था प्रभावी तरीके से लागू होती है तो उद्योग और व्यापार से जुड़े लोगों के लिए मंजूरी की प्रक्रिया तेज हो सकती है और सरकारी दफ्तरों में फाइल रोककर रखने की पुरानी शिकायतों पर भी काफी हद तक अंकुश लग सकता है।
