बशीर बद्र: शेरों से ज्यादा इंसानियत के लिए याद किए जाएंगे, दोस्तों ने सुनाए भावुक किस्से
मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी की पूर्व निदेशक नुसरत मेहंदी ने एक मुशायरे का जिक्र करते हुए बताया कि जब एक नई शायरा मंच पर घबराकर गजल पढ़ रही थीं और श्रोता हूटिंग करने लगे थे, तब बशीर बद्र खुद उठकर खड़े हो गए। उन्होंने माइक लेकर कहा कि अच्छी शायरी को समझने में वक्त लगता है और शायरा को पूरा मौका मिलना चाहिए। उनके इस हस्तक्षेप के बाद पूरा माहौल शांत हो गया और शायरा ने अपनी प्रस्तुति पूरी की, जिसे बाद में खूब सराहा गया।
शायर बद्र वास्ती ने भी उनके साथ बिताए पलों को याद करते हुए एक दिलचस्प किस्सा सुनाया। उन्होंने बताया कि एक बार बशीर बद्र अपने साथियों के साथ घर आए और चाय की बात हुई। जब कहा गया कि “हमें चूल्हा जलाना नहीं आता, आप बना लीजिए”, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया—“हमें किसी के घर में आग लगाना नहीं आता।” इस मजाक ने पूरे माहौल को हंसी से भर दिया और उनकी सहजता को और भी खास बना दिया।
वरिष्ठ साहित्यकारों के अनुसार, बशीर बद्र जब मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष थे, तब भी उनका दफ्तर किसी सरकारी कार्यालय जैसा नहीं बल्कि एक साहित्यिक घर की तरह लगता था। उनका कमरा हमेशा खुला रहता था, जहां नए-पुराने शायरों की महफिलें सजती थीं। वे फाइलों पर हस्ताक्षर करते हुए भी हल्के-फुल्के अंदाज में शेर सुनाने से नहीं चूकते थे।
कौसर सिद्दीकी ने भी उन्हें याद करते हुए बताया कि 1968 में शाहजहांपुर के एक ऑल इंडिया मुशायरे में उन्होंने पहली बार अपने शेर सुनाए थे, जहां बशीर बद्र ने उन्हें दाद दी थी। यह उनके जीवन का अविस्मरणीय क्षण था, जिसने उनके साहित्यिक सफर को नई दिशा दी।
पत्रकारों के अनुसार, बशीर बद्र की सबसे बड़ी ताकत उनकी सादगी थी। उनकी शायरी आम इंसान की जिंदगी से जुड़ी होती थी, जो सीधे दिल तक पहुंचती थी। उम्र के आखिरी दौर में भी उनकी याददाश्त भले कमजोर हो गई थी, लेकिन उनका अपनापन और सम्मान देने का अंदाज हमेशा कायम रहा।
उनके निधन के साथ उर्दू साहित्य ने एक बड़ा सितारा खो दिया है, लेकिन उनके साथ जुड़े ये किस्से और उनकी शायरी उन्हें हमेशा जिंदा रखेंगे।
