रात में फोन चलाने की आदत पड़ सकती है भारी: रिसर्च में नींद से लेकर एकाग्रता तक पर असर के संकेत
हालिया शोधों में मोबाइल और स्क्रीन टाइम को लेकर कई महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं। एक बड़े व्यवस्थित विश्लेषण में 21 अध्ययनों और करीब 5.48 लाख लोगों के आंकड़ों को शामिल किया गया। इसमें ज्यादा स्क्रीन टाइम का संबंध कम नींद अनिद्रा के लक्षण देर से सोने और सोने में परेशानी से पाया गया। विश्लेषण के मुताबिक स्क्रीन टाइम के हर अतिरिक्त घंटे के साथ सोने का समय औसतन करीब 13 मिनट तक आगे खिसक सकता है।
रात में मोबाइल इस्तेमाल करने की समस्या केवल स्क्रीन की रोशनी तक सीमित नहीं है। फोन पर लगातार आने वाले नोटिफिकेशन सोशल मीडिया की पोस्ट वीडियो और मैसेज दिमाग को सक्रिय बनाए रखते हैं। ऐसे में व्यक्ति बिस्तर पर जाने के बाद भी मानसिक रूप से आराम की स्थिति में नहीं पहुंच पाता। नतीजा यह होता है कि सोने में देर लग सकती है और नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में विश्वविद्यालय के छात्रों पर मोबाइल के सोने से पहले इस्तेमाल का असर देखा गया। शोध में पाया गया कि सोने से पहले लंबे समय तक स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वालों में खराब नींद की संभावना अधिक थी। अध्ययन में मोबाइल के लंबे इस्तेमाल का संबंध एकाग्रता और कुछ प्रदर्शन संबंधी मापदंडों में कमी तथा प्रतिक्रिया समय बढ़ने से भी जोड़ा गया। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि इन निष्कर्षों को व्यापक आबादी पर लागू करने के लिए आगे बड़े अध्ययनों की जरूरत है।
यहां सबसे जरूरी बात यह समझना है कि मोबाइल सीधे हमारे ब्रेन को खराब कर रहा है ऐसा कहना वैज्ञानिक तौर पर सही नहीं होगा। असल समस्या अक्सर मोबाइल इस्तेमाल से बनने वाली आदतों की होती है। यदि कोई व्यक्ति रात में देर तक फोन चलाता है और इसके कारण पर्याप्त नींद नहीं ले पाता तो अगले दिन थकान चिड़चिड़ापन ध्यान लगाने में कठिनाई और काम करने की क्षमता में कमी महसूस हो सकती है। लंबे समय तक खराब नींद बनी रहे तो इसका असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।
एक अन्य 2026 के अध्ययन में वयस्कों के बीच सोशल मीडिया और सोने से पहले स्मार्टफोन इस्तेमाल का संबंध देखा गया। इसमें ज्यादा स्मार्टफोन निर्भरता और बिस्तर पर फोन इस्तेमाल का संबंध खराब नींद से पाया गया जबकि खराब नींद और कुछ कार्यकारी क्षमताओं जैसे वर्किंग मेमोरी तथा ध्यान नियंत्रित करने में आने वाली कठिनाइयों के बीच भी संबंध सामने आया। हालांकि यह अध्ययन भी कारण और परिणाम को पूरी तरह साबित नहीं करता।
ऐसे में मोबाइल छोड़ना समाधान नहीं है बल्कि इस्तेमाल का तरीका बदलना ज्यादा जरूरी है। खासकर सोने से पहले फोन से दूरी बनाना एक आसान कदम हो सकता है। रात में स्क्रीन टाइम कम करना नोटिफिकेशन बंद रखना और फोन को बिस्तर से दूर रखना मददगार आदतें हो सकती हैं। दिन में भी बिना जरूरत बार बार फोन देखने की आदत को कम किया जा सकता है।
मोबाइल हमारी जिंदगी को आसान बनाने वाली तकनीक है लेकिन जब यही तकनीक हमारी नींद और रोजमर्रा की एकाग्रता पर हावी होने लगे तो सावधान होने की जरूरत है। फिलहाल वैज्ञानिक प्रमाण यह नहीं कहते कि मोबाइल हमारे ब्रेन को सीधे स्थायी रूप से बदल रहा है लेकिन लगातार और खासकर रात में अत्यधिक इस्तेमाल नींद तथा उससे जुड़ी मानसिक कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सवाल मोबाइल छोड़ने का नहीं बल्कि यह तय करने का है कि मोबाइल हमें चला रहा है या हम मोबाइल को चला रहे हैं।
