April 24, 2026

महाराष्ट्र का 50 हजार साल पुराना लोनार झील, जहां रहस्यमयी ढंग से बदलता है पानी का रंग!

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नई दिल्ली। प्रकृति जितनी खूबसूरत है, उतनी ही रहस्यों से भरी भी है। महाराष्ट्र में बुलढाणा जिले के लोनार गांव के पास स्थित लोनार क्रेटर एक ऐसा ही अनोखा प्राकृतिक चमत्कार है। यह क्रेटर लगभग 35 से 50 हजार साल पहले किसी उल्कापिंड के टकराने से बना था। शुरू में इसे ज्वालामुखी क्रेटर समझा गया, लेकिन बाद में वैज्ञानिकों ने पुष्टि की कि यह उल्कापिंड की तेज टक्कर का परिणाम है।

लोनार क्रेटर का वैज्ञानिक महत्व

लोनार क्रेटर दुनिया में बेसाल्ट चट्टानों पर बने एकमात्र इम्पैक्ट क्रेटर के रूप में जाना जाता है। यह चंद्रमा और मंगल ग्रह के क्रेटरों के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण है। क्रेटर का व्यास लगभग 1,830 मीटर (1.8 किलोमीटर) और गहराई करीब 150 मीटर है। इसका किनारा आसपास की जमीन से 20 मीटर ऊंचा उठकर दिखता है।

क्रेटर के अंदर बनी झील नमकीन और क्षारीय है। यह वैज्ञानिकों और पर्यटकों दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने साल 2004 में उपग्रह से इसकी तस्वीर ली थी, जिसमें झील हरी-नीली दिखाई देती है और चारों ओर वनस्पति, खेत और बस्तियां स्पष्ट नजर आती हैं।

रंग बदलती झील का रहस्य

लोनार झील का सबसे रोचक पहलू इसकी पानी का बदलता रंग है। जून 2020 में झील का रंग अचानक हरे से गुलाबी या लाल हो गया। वैज्ञानिकों ने सैंपल लेने पर पता लगाया कि यह परिवर्तन हेलोआर्किया जैसे नमकीन पानी में रहने वाले सूक्ष्म जीवों के कारण हुआ। गर्म और सूखे मौसम में पानी का स्तर कम होने से खारापन बढ़ता है और ये जीव तेजी से बढ़कर झील को गुलाबी रंग दे देते हैं। ऐसा रंग परिवर्तन ऑस्ट्रेलिया की लेक हिलियर और ईरान की लेक उर्मिया में भी देखा गया है। झील का रंग हमेशा नहीं रहता, बल्कि मौसम और पानी की मात्रा के अनुसार बदलता रहता है।

क्रेटर की खोज और अध्ययन

1823 में ब्रिटिश अधिकारी सी.जे.ई. अलेक्जेंडर ने लोनार क्रेटर को पहचाना। 1970 के दशक में मास्केलिनाइट की मौजूदगी से पुष्टि हुई कि यह क्रेटर वास्तव में उल्कापिंड के टकराने से बना है। मास्केलिनाइट केवल तेज गति की टक्करों में बनती है। लोनार क्रेटर का बेसाल्ट प्लेटफॉर्म इसे चंद्रमा की सतह जैसी विशेषता देता है। इस कारण नासा और भारतीय वैज्ञानिक संस्थानों ने यहां कई अध्ययन किए हैं।

पर्यावरण और संरक्षण

हाल के वर्षों में झील का पानी बढ़ने की समस्या सामने आई है। इससे पास के प्राचीन मंदिरों पर असर पड़ा है और झील का रासायनिक संतुलन प्रभावित हो रहा है। वैज्ञानिक इस प्राकृतिक चमत्कार के संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने पर ध्यान दे रहे हैं।

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