दिल की धड़कनों का बिगड़ा संतुलन पड़ सकता है भारी जानिए Atrial Fibrillation के लक्षण कारण और बचाव के आसान उपाय
Atrial Fibrillation में दिल के ऊपरी कक्ष यानी एट्रिया सामान्य तरीके से सिकुड़ने की बजाय बहुत तेजी और अनियमित रूप से कंपन करने लगते हैं। इसके कारण दिल पूरे शरीर में रक्त को प्रभावी ढंग से पंप नहीं कर पाता। जब रक्त का प्रवाह धीमा होता है तो दिल के भीतर थक्का बनने की आशंका बढ़ जाती है। यही थक्का मस्तिष्क तक पहुंचकर स्ट्रोक का कारण बन सकता है जो कई बार जानलेवा भी साबित होता है।
इस बीमारी के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य थकान या कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। मरीज को दिल की धड़कन तेज महसूस होना सीने में घबराहट सांस फूलना चक्कर आना कमजोरी जल्दी थक जाना या सीने में असहजता महसूस हो सकती है। कुछ लोगों में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते और बीमारी का पता नियमित स्वास्थ्य जांच के दौरान चलता है। यही कारण है कि इसे खामोश बीमारी भी कहा जाता है।
बढ़ती उम्र उच्च रक्तचाप मधुमेह मोटापा थायरॉयड की समस्या धूम्रपान अत्यधिक शराब का सेवन तनाव और पहले से मौजूद हृदय रोग Atrial Fibrillation के प्रमुख जोखिम कारक माने जाते हैं। इसके अलावा शारीरिक गतिविधि की कमी और असंतुलित खानपान भी इस बीमारी की संभावना बढ़ा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर जांच और सही इलाज से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। डॉक्टर ईसीजी इकोकार्डियोग्राफी या अन्य जांचों के माध्यम से इसकी पुष्टि करते हैं। उपचार के दौरान मरीज की स्थिति के अनुसार दवाएं दी जाती हैं ताकि दिल की धड़कन नियंत्रित रहे और रक्त का थक्का बनने का खतरा कम हो सके। कुछ मामलों में विशेष चिकित्सीय प्रक्रियाओं की भी आवश्यकता पड़ सकती है।
स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नियमित व्यायाम करें संतुलित और पौष्टिक भोजन लें नमक और तैलीय भोजन का सेवन सीमित रखें धूम्रपान और शराब से दूरी बनाए रखें पर्याप्त नींद लें और तनाव को नियंत्रित करने के लिए योग या ध्यान का सहारा लें। यदि पहले से ब्लड प्रेशर या डायबिटीज जैसी समस्या है तो उसका नियमित उपचार कराना भी बेहद जरूरी है।
यदि आपको बार बार दिल की धड़कन अनियमित महसूस होती है सांस लेने में परेशानी होती है या अचानक कमजोरी और चक्कर आने जैसी समस्या होती है तो इसे सामान्य मानकर अनदेखा न करें। समय पर हृदय रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेकर जांच कराना भविष्य में होने वाली गंभीर जटिलताओं से बचा सकता है। जागरूकता और समय पर उपचार ही इस खामोश लेकिन गंभीर बीमारी से सुरक्षित रहने का सबसे प्रभावी उपाय है।
