450 साल पुराने नक्शे को बदलने की तैयारी, नए मैप में अफ्रीका दिखेगा बड़ा, यूरोप-अमेरिका होंगे छोटे
इस बदलाव की जड़ करीब 450 साल पुराने मर्केटर प्रोजेक्शन में है। 1569 में कार्टोग्राफर गेरार्डस मर्केटर ने ऐसा नक्शा तैयार किया था, जिसका सबसे बड़ा फायदा समुद्र में यात्रा करने वाले नाविकों को मिला। लेकिन दिशा और रास्तों को सीधी रेखाओं में दिखाने की इस तकनीक ने धरती के अलग-अलग हिस्सों के वास्तविक आकार में बड़ा अंतर पैदा कर दिया।
धरती गोल, कागज सपाट… यहीं से शुरू हुई दिक्कत
पृथ्वी गोल है, जबकि नक्शा सपाट कागज पर बनाया जाता है। इसे समझने के लिए संतरे का उदाहरण लिया जा सकता है। संतरे के छिलके को निकालकर पूरी तरह सपाट फैलाने की कोशिश करेंगे तो वह कहीं न कहीं खिंचेगा, फटेगा या उसका आकार बिगड़ेगा। पृथ्वी के साथ भी नक्शा बनाते समय यही समस्या आती है।
मर्केटर ने उस समय इस समस्या का ऐसा समाधान निकाला, जिससे समुद्र में दिशा तय करना आसान हो गया। उस दौर में जहाज महीनों समुद्र में चलते थे। नक्शे पर सीधी रेखाओं में रास्ते और दिशाएं मिलने से नाविकों को अपना मार्ग तय करने में मदद मिलती थी।
लेकिन इसका दूसरा असर यह हुआ कि जैसे-जैसे नक्शे पर भूमध्य रेखा से दूर जाते हैं, जमीन का आकार जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है।
ग्रीनलैंड और अफ्रीका का उदाहरण समझिए
मर्केटर प्रोजेक्शन में यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ग्रीनलैंड अपने वास्तविक आकार से काफी बड़े दिखाई देते हैं। दूसरी ओर भूमध्य रेखा के आसपास मौजूद अफ्रीका और भारत जैसे बड़े भूभाग अपेक्षाकृत छोटे नजर आते हैं।
सबसे बड़ा अंतर अफ्रीका और ग्रीनलैंड को देखकर समझ आता है। वास्तविकता में अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना ज्यादा है, लेकिन पारंपरिक मर्केटर नक्शे में दोनों लगभग समान आकार के नजर आते हैं।
यानी यह नक्शा समुद्री नेविगेशन के लिहाज से उपयोगी था, लेकिन दुनिया के अलग-अलग भूभागों के वास्तविक आकार की तस्वीर सही नहीं देता था।
‘इक्वल अर्थ’ में क्या अलग होगा?
‘इक्वल अर्थ’ प्रोजेक्शन 2018 में कार्टोग्राफरों ने तैयार किया था। इसका उद्देश्य महाद्वीपों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाना है। इसमें अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया और ओशिनिया पहले के मुकाबले बड़े दिखाई देंगे। इसके उलट यूरोप और उत्तरी अमेरिका का आकार छोटा नजर आएगा।
इसका मकसद केवल नक्शे की शक्ल बदलना नहीं है। इसके जरिए लोगों, खासकर बच्चों को दुनिया के भूगोल और देशों के वास्तविक आकार की ज्यादा सटीक तस्वीर दिखाने की कोशिश की जा रही है।
The United Nations General Assembly voted Friday to adopt a new world map that makes the African continent bigger while shrinking North America and Europe, drawing ire from Washington.https://t.co/3tc21TRRQK pic.twitter.com/FfiTcA7lDW
— AFP News Agency (@AFP) September 4, 2026
164 देशों का समर्थन, अमेरिका अकेला विरोध में
संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव को 164 देशों का समर्थन मिला। छह देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया, जबकि अमेरिका ने इसके खिलाफ मतदान किया। प्रस्ताव को टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसी ने आगे बढ़ाया था।
डुसी का कहना था कि नक्शे केवल भौगोलिक जानकारी देने का माध्यम नहीं होते। उनका असर बच्चों की शिक्षा, लोगों की कल्पना और दुनिया को देखने के नजरिए पर भी पड़ता है। उनके मुताबिक किसी क्षेत्र को वास्तविक आकार से अलग दिखाने वाली तस्वीर लंबे समय तक लोगों की धारणा को प्रभावित कर सकती है।
अमेरिका ने कहा- UN असली मुद्दों से भटक रहा
अमेरिका ने प्रस्ताव पर नाराजगी जताई। अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेंसविच ने कहा कि ऐसे कदमों की वजह से ही संयुक्त राष्ट्र अपनी साख खो रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब दुनिया कई गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है, तब संगठन 16वीं सदी के नक्शों पर चर्चा करने में समय क्यों लगा रहा है।
हालांकि, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब सदस्य देशों से पारंपरिक मर्केटर प्रोजेक्शन के बजाय ‘इक्वल अर्थ’ को अपनाने की अपील की गई है। इसका उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को दुनिया का भूगोल उसके वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाना है।
